इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

झन फूटंय घर

तेजनाथ 
खाये पीये के मामला म माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति ददा ह घर के जम्मों कामकाज ल हम दूनों भाई म बांट देये हे, अउ तीज तिहार म परब म रोटी, पीठा खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे। सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर। झन होवय मनमुटाव, दरार।
तिलक आत - जात राहय संतू के घर। अइसे तो संतू के कुछ रिस्तेदार नई लगे तिलक, फेर जिहां परेम, तिहां का नेम, का जरूरत कोनो रिस्ता के। परेम तो खुद सबले बड़े अउ पबरित रिस्ता ये। अइसे भी जरूरी नइहे के जेखर संग नता हे, ओखर संग परेम होय। सही परेम होय सहि कहिबे त नता तो अउपचारिकता अउ मरयादा म छंदा जाथे।
खैर, गरमी म दही के लबोद्दा सरबत अउ सरदी म बटुरा - मरीज, तुलसी के चाय पियाय बिना कभू नई निकलन धकय धर ले संतू अउ ओखर घरवाले। तिलक परब म पेज पसईया खाय - पीयय घलो, अउ कोचई पाना के कड़ही के तो सुवादे अड़बड़, अंगरी चांट -चांट के खाय।
एक दिन सांझ के तिलक ल रोक लिस संतू के बाबू। परब कुसलाये राहय गाय। रात होही कहिके घर जाये के बात करिस तिलक। संतू के बाबू कहि दिस - हम ल अभी तक पराया समझथस का धन इहां कोनों भांठा म बइठे हस जेन घर जाहू कहिके। रूकगे तिलक। तइयारी करत - करत आठ नौ बजगे रात। बड़ सुग्घर चटई - पिढ़वा। बइठ गे सब। फेर ये का ? संतू के बबा पोरसत हे पेउस। पैंसठ सत्तर बरिस के सियान। अटपटा लगिस तिलक ल। माली भर पेउस अउ थारी भर दार - भात साग। तिलक के ससन बूतागे। फेर सियनहा के परोसना, समझ नई आईस तिलक ल। अतेक माई लोग, मावा लोग रहिके।
हाथ पोंछत गली पार निकल के पूछि परिस तिलक संतू के बाबू ल - अतेक मनखे रहे के बाद घलो कका! बबा ल परसान करथव। बिचारा सियान सामरत आदमी। विचित्र हे तुहरों घर के नियम ह ग कका। बताइस संतू के बाबू - बाबू! हमर ददा ह अपन सउक ले अइसन करय न पोगरी खाये बर। बल्कि घर चलाये बर करथे अइसन।
- घर चलाये बर ? तिलक समझ नई पाइस।
- हां घर चलाये बर! तैं तो जानथस, हमन दुनों भाई अभी तक के एके म हन। हमर मन के नाती नतुरा होगे हे तभो ले। फेर खाये पीये के मामला म माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति ददा ह घर के जम्मों काम काज ल हम दुनों भाई म बांट देये हे। अउ तीज - तिहार म, परब म, रोटी, पीठा, खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे। सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर, झन होवय मनमुटाव, दरार। अपन जीयत - जीयत अपन बेटा मन ल लड़त बंटत देखे के बात सोंचके घलो थर्रा जाथे ददा। ओखर हिसाब से एकता म बल हे। अउ मिलके खाये से चिबरी चाउर घलो महापरसाद लगथे।
बड़ बिचित्र अउ गजब तरीका हे कका सियान के घर ल बांधे के बनाये राखे के। तिलक खुश हो जाथे।
बरदुली, पिपरिया
जिला - कबीरधाम[छ.ग.] 
www.gurturgoth.com से साभार

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