इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

अनुभव

शांतिदीप श्रीवास्‍तव

उस सुबह अनुभव
करके स्पर्श
तुम्हारे कोमल हाथों का
अपने माथे पर
मुझे लगा कि
लौट आया है मेरा बचपन।

मैंने फेंका अपने हाथों और पैरों को
निरुद्देश्य सा
किन्तु खोली नहीं
अपनी आँखें
किसी लाड प्यार में बिगड़े बच्चे की तरह
ताकि
पा सकूँ कुछ और अधिक
ममता भरे हाथों का स्पर्श।

सोचता हूँ .... शायद
बचपन .... जवानी ....और बुढ़ापा
हैं विभिन्न सोपान
कम महत्वपूर्ण शरीर के ...
विकास यात्रा के
और बांधा नहीं जा सकता है
मन को
इन दृश्यमान सोपानों की सीमा में
तभी तो
मेरे बृद्ध होते शरीर में
लौट आते है बचपन और जवानी।

क्षण - क्षण
तुम्हारे वैविध्यपूर्ण
स्पर्श के साथ।
जब तुम छूते हो मुझे
मेरा बचपन
जब मै छूता हूँ तुम्हे
मेरा बुढ़ापा
और .... और
जब छूते है दोनों
एक दूसरे को साथ
लौट आती है मेरी जवानी।

शायद इसलिए
न मैं रह पाता हूँ बूढ़ा
न जवान
न ही एक बच्चा
सदा के लिए।

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