इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

अनुभव

शांतिदीप श्रीवास्‍तव

उस सुबह अनुभव
करके स्पर्श
तुम्हारे कोमल हाथों का
अपने माथे पर
मुझे लगा कि
लौट आया है मेरा बचपन।

मैंने फेंका अपने हाथों और पैरों को
निरुद्देश्य सा
किन्तु खोली नहीं
अपनी आँखें
किसी लाड प्यार में बिगड़े बच्चे की तरह
ताकि
पा सकूँ कुछ और अधिक
ममता भरे हाथों का स्पर्श।

सोचता हूँ .... शायद
बचपन .... जवानी ....और बुढ़ापा
हैं विभिन्न सोपान
कम महत्वपूर्ण शरीर के ...
विकास यात्रा के
और बांधा नहीं जा सकता है
मन को
इन दृश्यमान सोपानों की सीमा में
तभी तो
मेरे बृद्ध होते शरीर में
लौट आते है बचपन और जवानी।

क्षण - क्षण
तुम्हारे वैविध्यपूर्ण
स्पर्श के साथ।
जब तुम छूते हो मुझे
मेरा बचपन
जब मै छूता हूँ तुम्हे
मेरा बुढ़ापा
और .... और
जब छूते है दोनों
एक दूसरे को साथ
लौट आती है मेरी जवानी।

शायद इसलिए
न मैं रह पाता हूँ बूढ़ा
न जवान
न ही एक बच्चा
सदा के लिए।

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