इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

जबां पर ताला

जितेन्‍द्र ' सुकुमार ' 
जबाँ पर ताला लगाकर रखना
सन्नाटे में खुद को बचाकर रखना
हर तर$फ घूम रहें ख़्वाबों के
ख्वाहिशे मत आगे उठाकर रखना
एक चेहरे के पीछे न जाने कितने चेहरे हैं
तुम भी अपनी सूरत छुपा कर रखना
पत्थरों को कह दो धड़कना छोड़ दे
तुम दिल को पत्थर बनाकर रखना
काँटे तो काँटे हैं सि$र्फ दर्द देने वाले
इसे सदा रास्ते से हटाकर रखना
भीड़ में खो न जाये वो भी कहीं
उसे दिल की तन्हाई में बसा कर रखना
पता -
उदय आशियाना,
चौबेबाँधा राजिम
जिला - गरियाबंद [छ.ग.] - 493885

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