इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

भाव और भाषा के साधक : गजानंद प्रसाद देवांगन ' दिशाबोध '

पुण्‍य तिथि - 9 दिसम्‍बर 
वीरेन्‍द्र ' सरल ' 
छत्तीसगढ़ के मानचित्र पर, छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम के दक्षिण एवं श्रृंगीऋषि की तपोस्थली सिहावा के उत्तर में, चित्रोत्पला महानदी और पावन पैरी नदी के बीच के भू-भाग को विकासखंड मगरलोड़ के नाम से जाना-पहचाना जाता है। इसी भू-भाग में पैरी नदी के पावन तट पर अवस्थित है ग्राम धौराभाठा, जहाँ गूँजती रही है, स्व श्री गजानंद प्रसाद देवांगन 'दिशाबोध' की बचपन की किलकारियाँ और जहाँ की आबो - हवा में घुली हुई है उनकी वाणी की मिठास। यह गाँव दिशाबोध जैसे विरल व्यक्तित्व को अपनी गोद में खिलाकर धन्य हुआ है और गौरवान्वित हुई है यहाँ की माटी। इसी गाँव की सोंधी माटी की महक लेकर चल पड़े थे दिशाबोध, भटके हुये लोगों को दिशाबोध कराने। सम्पर्क में आने वाले हर आदमी  के सामने है उनका आकर्षक व्यक्तित्व और आँखों में समायी है, उनकी छवि। वैसे तो शुभ्रधवल वस्त्रो से अपने आप को सुसज्जित करके समाज में स्वयं को महिमामंडित करने वाले लोगों की कमी नहीं है , मगर वस्त्रों की उज्जवलता के समान ही मन की पवित्रता और चरित्र की शुचिता पर ध्यान देने वाला कोई विरला ही होता है, ऐसे ही विरल व्यक्तित्व में से एक थे - गजानंद प्रसाद देवांगन 'दिशाबोध'। आज जब लोग मेरे कपड़े की सफेदी से तुम्हारे कपड़े की सफेदी ज्यादा कैसे के चक्कर में एक - दूसरे के प्रतिद्वंदी बने हुये हैं। ऐसे माहौल में मेरे चरित्र की उज्जवलता से ज्यादा तुम अपना चरित्र बनाओ का संदेश देने वाले विभूतियों मे से एक थे दिशाबोध जी।
गौर वर्ण, उन्नत ललाट, सौम्य-मधुर मुस्कान, बड़ों के प्रति सदैव आदर का भाव और छोटों के प्रति आंखों से झरती हुई स्नेह की निर्झरणी। वाणी में इतनी मिठास कि दुश्मन को भी दोस्त बना दे और रामचरित मानस पाठ करने का ऐसा अनूठा अंदाज जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर झूमने पर मजबूर कर दे। प्रवचन में भावों का ऐसा अतिरेक जो पत्थर को भी पिघला दे और मुर्दो में भी प्राण फूंक दे। कुल मिलाकर यही कहना ज्यादा उचित होगा कि गजानंद प्रसाद देवांगन जी एक चुंबकीय व्यक्तित्व थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी अक्षुण्ण स्मृतियां हमें आज भी सम्पूर्ण वैचारिक प्रखरता के साथ दिशाबोध करा रही है।
संत कबीर की तरह एके साधै सब सधै के मूलमंत्र को आत्मसात करके उन्होंनें मन की साधना की थी। मन के सधते ही बाकी साध्य तो स्वमेव उनके व्यक्तित्व मे समाहित हो गये। शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म, योग, साहित्य इत्यादि। उनका मन सदैव समृद्ध राष्ट्र ,स्वच्छ समाज के लिए संकल्पित रहा। सही मायने में वे भाव, और भाषा के साधक थे। उनका संवेदनशील कवि मन जीवन के विविध रंगों को बहुत निकट से जाना-पहचाना था। वे आम आदमी की पीड़ा को अपनी लेखनी के माध्यम से जीवन भर कोरे कागज पर उतारते रहे। इस उम्मीद के साथ कि कभी - न - कभी, कहीं - न - कहीं उनकी कविता पत्थर में तब्दील होते हुये मानव हृदय में संवेदना की अन्तर्धारा प्रवाहित करने में जरूर समर्थ होगी। भ्रष्टाचार के असुर का वध करने के लिए जरूर अवतरित होगी कोई दुर्गा। मंहगाई के रावण को मारने के लिये आयेगा कोई राम। समतामूलक समाज की स्थापना के लिये पैदा होगा कोई गाँधी। अपनी लेखनी के माध्यम से हमारे चिन्तन को झकझोर कर सही दिशा में चलने के लिये प्रेरित करने वाले लेखनी के समर्थ सिपाही, भाव और भाषा के साधक स्व श्री गजानंद प्रसाद देवांगन को मेरा नमन और विन्रम श्रद्धांजली।
बोडरा ( मगरलोड)
जिला - धमतरी ( छ.ग.)

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