इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 22 नवंबर 2014

शोक संवेदना या बधाई संदेश

प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव 
अम्माजी के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। शहर के बाहर था इसलिये आ नहीं पाया मैं श्याम भाई के निवास पर उनकी माताजी की मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करने पहुंचा था किंतु उन्हें बहुत कष्ट था। आठ माह से पलंग पर पड़ी थीं। उन्होंने जबाब दिया।
हमेशा चहकती रहतीं थीं कितनी अच्छी बातें, सारगर्भित, कितना अपनापन? होता था उनकी बातों में कितना स्नेह । मैंने आगे कहना चाहा। परंतु बहुत हल्ला करतीं थीं दिन भर चाँव चाँव। वे बात काट कर बोले उस कमरे की तो बात ही और थी जिसमें वे पूजा करती थीं कितना पवित्र था वह कमरा अगरबत्ती की भीनी खुशबू घंटा आरती कितना मन भावन था वह दृश्य जब वह ? जय जगदीश हरे की  आरती गाती थीं। मैंने भावुक होकर कहा। वह तो ठीक है पर उस कमरे का उपयोग नहीं हो पा रहा था। अब पत्नी ने वहां ब्यूटी पार्लर खोल लिया है। वह बोले मैं अवाक था और शायद गलती पर भी शोक संवेदना के बदले बधाई संदेश देना था उनकी मां की मृत्यु पर।
12, शिवम सुन्दरम नगर,
छिंदवाड़ा ( म.प्र.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें