इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

शोक संवेदना या बधाई संदेश

प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव 
अम्माजी के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। शहर के बाहर था इसलिये आ नहीं पाया मैं श्याम भाई के निवास पर उनकी माताजी की मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करने पहुंचा था किंतु उन्हें बहुत कष्ट था। आठ माह से पलंग पर पड़ी थीं। उन्होंने जबाब दिया।
हमेशा चहकती रहतीं थीं कितनी अच्छी बातें, सारगर्भित, कितना अपनापन? होता था उनकी बातों में कितना स्नेह । मैंने आगे कहना चाहा। परंतु बहुत हल्ला करतीं थीं दिन भर चाँव चाँव। वे बात काट कर बोले उस कमरे की तो बात ही और थी जिसमें वे पूजा करती थीं कितना पवित्र था वह कमरा अगरबत्ती की भीनी खुशबू घंटा आरती कितना मन भावन था वह दृश्य जब वह ? जय जगदीश हरे की  आरती गाती थीं। मैंने भावुक होकर कहा। वह तो ठीक है पर उस कमरे का उपयोग नहीं हो पा रहा था। अब पत्नी ने वहां ब्यूटी पार्लर खोल लिया है। वह बोले मैं अवाक था और शायद गलती पर भी शोक संवेदना के बदले बधाई संदेश देना था उनकी मां की मृत्यु पर।
12, शिवम सुन्दरम नगर,
छिंदवाड़ा ( म.प्र.)

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