इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मुकुंद कौशल के छत्‍तीसगढ़ी गजल

चुनई के हांका परगे भईया बेरा हे तय्यारी के।
अटक मटक के नाचै बेंदरा देखौ खेल मदारी के ।।
गॉंव गँवई के पैडगरी हर सड़क ले जुर गेहे तब ले।
गँवई -गाँव माँ चलन बाढ़गै मधुरस मिले लबारी के।।
बोट के भुखमर्रा मन अपन गरब गुमान गॅवा डारिन।
इन्खर मन के नइये जतका इज्जत हवै भिखारी के।।
गाँव के छेंव म भ_ी खुलगे, धारो धार बोहा लौ रे।
पानी भलुक मिलै झन तुँहला, अपन - अपन निस्तारी के।
निरमल रहिस सियानी तेमां, राजनीति के हबरे ले।
घर - घर मा करखाना खुलगे, निच्चट गिल्ला - गारी के।।
ये हाँसी के मड़ई मा संगी, कोन बिसाही पीरा ला,
चारों मुढ़ा हाट लगे हे, आरूग चुगली - चारी के।।
मंदिर मा मुँह देख के पूजा, खीसा तउल मिले परसाद।
खुद भगवान बेंचावत हे तो का हे दोस पुजारी के।।
ये पहरो के खेल मा संगी, पारी आ गै जे मन के।
का गोठियाबे खेल - खेल दिन बोमन हमरो पारी के।।
2
मया पिरित संग हाँसै - बोलै, ओखर दिल दरिया हो थे।
जे हर मुँह फुलाए रहिथे, मन ओखर करिया हो थे।।
सिधवा मनखे सुख अउ दुख ला, फरिया के गोठिया देथे।
लेवना चुपरे कस गोठियावै, ते हर मिठलबरा होथे।।
पहिली घर के नेत मढ़ा ले, तेखर पीछू मिलकी मार,
मछरी उंखरे हाथ म आथे, जेखर तिर चुरवा होथे।।
करिया कपड़ा पहिरेकर अउ, झुलुप घलो छरिया के राख,
दारू पी के झूपै जे हर, वो पक्का बइगा होथे।।
एक्कड़ - डिसमिल के मतलब, इन डेरा के मन का समझैं,
का जानै इन बसुंदरा मन, का रकबा खसरा होथे।।
कुरसी पा के नेता मन अउ, साहेब बाबू भईया मन
अपन ददा ला तक नई चीन्हें, तौ हमला पीरा होथे।
कटहल के पसरा म कौशल मोल लिमउ के का करबे,
सबले चुरपुर होथे तेहर, नानेकुन मिरचा होथे।। 

पदनाभपुर, दुर्ग ( छ.ग.)

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