इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मुकुंद कौशल के छत्‍तीसगढ़ी गजल

चुनई के हांका परगे भईया बेरा हे तय्यारी के।
अटक मटक के नाचै बेंदरा देखौ खेल मदारी के ।।
गॉंव गँवई के पैडगरी हर सड़क ले जुर गेहे तब ले।
गँवई -गाँव माँ चलन बाढ़गै मधुरस मिले लबारी के।।
बोट के भुखमर्रा मन अपन गरब गुमान गॅवा डारिन।
इन्खर मन के नइये जतका इज्जत हवै भिखारी के।।
गाँव के छेंव म भ_ी खुलगे, धारो धार बोहा लौ रे।
पानी भलुक मिलै झन तुँहला, अपन - अपन निस्तारी के।
निरमल रहिस सियानी तेमां, राजनीति के हबरे ले।
घर - घर मा करखाना खुलगे, निच्चट गिल्ला - गारी के।।
ये हाँसी के मड़ई मा संगी, कोन बिसाही पीरा ला,
चारों मुढ़ा हाट लगे हे, आरूग चुगली - चारी के।।
मंदिर मा मुँह देख के पूजा, खीसा तउल मिले परसाद।
खुद भगवान बेंचावत हे तो का हे दोस पुजारी के।।
ये पहरो के खेल मा संगी, पारी आ गै जे मन के।
का गोठियाबे खेल - खेल दिन बोमन हमरो पारी के।।
2
मया पिरित संग हाँसै - बोलै, ओखर दिल दरिया हो थे।
जे हर मुँह फुलाए रहिथे, मन ओखर करिया हो थे।।
सिधवा मनखे सुख अउ दुख ला, फरिया के गोठिया देथे।
लेवना चुपरे कस गोठियावै, ते हर मिठलबरा होथे।।
पहिली घर के नेत मढ़ा ले, तेखर पीछू मिलकी मार,
मछरी उंखरे हाथ म आथे, जेखर तिर चुरवा होथे।।
करिया कपड़ा पहिरेकर अउ, झुलुप घलो छरिया के राख,
दारू पी के झूपै जे हर, वो पक्का बइगा होथे।।
एक्कड़ - डिसमिल के मतलब, इन डेरा के मन का समझैं,
का जानै इन बसुंदरा मन, का रकबा खसरा होथे।।
कुरसी पा के नेता मन अउ, साहेब बाबू भईया मन
अपन ददा ला तक नई चीन्हें, तौ हमला पीरा होथे।
कटहल के पसरा म कौशल मोल लिमउ के का करबे,
सबले चुरपुर होथे तेहर, नानेकुन मिरचा होथे।। 

पदनाभपुर, दुर्ग ( छ.ग.)

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