इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 29 नवंबर 2014

डां. संजीत कुमार की तीन कविताएं

गैरजरूरी

जरूरी से गैरजरूरी हो जान
बहुत सालता है
मैं घर की सबसे गैरजरूरी चीज हूं
अन्य कबाड़ा सामान की तरह
मैं भी अखरने लगा हूं

किसी को फुरसत नहीं
कि मुझसे बात करे
पहले महीने की आखिरी तारीख को
सबको रहता था इंतजार मेरा
हर शाम को चाकलेटी
स्नेह की आश होती थी

सब दूर है आज
क्योंकि सब जानते है
सूखे पेड़ छाया नहीं देते
बल्कि एक डर देते है
असमय गिरने का....

तकलीफ
बहुत तकलीफ  होती है
जब शब्द जुबान पर
दहीं से जम जाते है।

बहुत काले अक्षर
जब पढ़ाई में नहीं आते
या उनके अर्थ बदल दिए जाए
अपनी सहुलियत के अनुसार

आसमान जब साफ  होता है
और अचानक से काले बादल
आ धमकते है
और मेरी छत
किसी मार खाई औरत की
तरह टूटी हुई होती है

उदास शाम को
ड्योढ़ी चढ़ते ही
बेटी का तकाजा
और मेरी जेब
बूढ़ी औरत के मुँह जैसी खाली

बहुत छोटा बच्चा
जब कुत्तो से होड़ करता हुआ
रंगीन पत्तो से
वक्त काटने की मोहलत खोजता है

बहुत तकलीफ  होती है।

चट्टान

शहर जब बढ़ रहा होता है
कोई न कोई मर रहा होता है
नर्मायी सिर्फ  जमीन से ही नहीं
दिलो से भी साफ  हो जाती है
रह जाती हे केवल चट्टान ....

- पता -
5/ 345, त्रिलोकपुरी
दिल्ली - 110091
मो. 0882999518

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