इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

कइसे होथे संत

रमेश कुमार सिंह चौहान 
काला कहि संत रे, आसा गे सब  टूट ।
ढोंगी ढ़ोंगी साधु हे, धरम करम के लूट ।।

धरम करम के लूट, लूट गे राम कबीरा ।
ढोंगी मन के खेल, देख होवत हे पीरा ।।

जानी कइसे संत, लगे अक्कल मा ताला ।
चाल ढाल हे एक, संत कहि हम काला।।

होथे कइसे संत हा, हमला कोन बताय।
रूखवा डारा नाच के, संत ला जिबराय।।

संत ला जिबराय, फूल फर डारा लहसे।
दीया के अंजोर, भेद खोलय गा बिहसे ।।

कह रमेश समझाय, जेन सुख शांति बोथे ।
पर बर जिथे ग जेन, संत ओही हा होथे ।
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