इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मानव जीवन के साथ जंगली जानवरों का संघर्ष ?

अशोक चौधरी 

मानव समृद्धि - वन प्राणियों के लिए अभिशाप है।
छत्तीसगढ़ में दक्षिण सरगुजा, कटघोरा, कोरबा, और धर्म जयगढ़ में मानव और हाथियों के संघर्ष के संबंध में आये दिन समाचार पत्रों में समाचार छपते रहता है। क्या आपने इस समस्या पर कभी विचार किया है कि जंगली जानवरों को मानव से संघर्ष करने की क्या मजबूरी है। वास्तव में इसके लिये हम (मानव) स्वयं जिम्मेदार हैं हमने अपने स्वार्थ के लिये जंगल क्षेत्र को अपने रिहायशी एवं कृषि के लिये काटकर समतल मैदान बना रहे हैं जिससे जंगली प्राणियों को खाना बदोश होना पड़ रहा है और अब वही जंगली जानवर अपने हक के लिये आपको मारनें एवं स्वयं मरने के लिये तैयार है।
आचार्य चाणक्य ने मानव आचार संहिता में जो सू़त्र लिखे है उसके अनुसार पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग में जंगल 30 प्रतिशत भाग में जलाशय एवं 30 प्रतिशत के हिस्से में मानव जीवन के लिये खेती रिहायशी एवं इसी में से 02 प्रतिशत में शुद्ध पेय जल के लिये कुऑ, बावड़ी, तालाब आदि के लिये सुरक्षित रखने की सलाह दी है एवं शासक को इस पर कड़ी नजर रखने के लिये कहा है। उन्होंने आशंका व्यक्त किया है कि जब कभी यह नियम टूटेगा तब मानव के साथ जंगली जानवरों का संघर्ष संभव है। हमारे ऋषि मुनियों ने प्रकृति संरक्षण के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस प्रकृति के संरक्षण के लिये बहुत से तीज त्यौहार के माध्यम से वृक्षों एवं जंगलों को समृद्ध करने का संदेश दिया है। सभ्य मानव समाज तीज त्यौहार तो उत्साह पुर्वक मनाते है लेकिन उसमें निहित सर्वोदय सुख की भावना को त्याग कर स्वसुख को महत्व देता है। जिसके कारण अब जंगली हाथी और मानव आमने सामने है। हस्तक्षेप कॉम के हवाले से छत्तीसगढ़ समाचार पत्र में छपे एक रिर्पोट पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि 2005 से 2013 तक के समय में हाथी और मानव संघर्ष कई गुना बढ़ गया है जिसके कारण वर्ष में 25 लोगो की मौत छत्तीसगढ़ प्रांत में होता है। इस मानव मौत के मुवावजे के रूप में शासन ने 2140 लाख (इक्कीस करोड़ चालीस लाख)रूपये प्रदान किया है। इस संघर्ष में कुल 198 लोग मरे है वहीं 14 हाथी विद्युत करंट से मरे एक लाख से अधिक घटना फसल नुकसान का दर्ज हुआ है आठ हजार से ज्यादा मकान खेत संपत्ती के नुकसानी का केस दर्ज हुआ है। इस विडंबना के लिये पर्यावरण पुरस्कार के अन्तर्राष्ट्रीय विजेता श्री रमेश अग्रवाल ने चिन्ता जताया है और शासन से इस ओर कार्य करने एवं स्पष्ट नीति बनाने का आग्रह किया है।
संघर्ष का कारण
हमें हाथियों की जीवनशैली पर वन जन्तु विशेषज्ञों के शोध पर चर्चा करना आवश्यक है। उनके अनुसार हाथी समूह में रहने वाला शांत प्राणी है इसके मुखिया अपने सदस्यों को कड़े अनुशासन में रखता है और सभी सदस्य मुखिया के आदेशों का पालन करते हैं। हाथी दल गर्मी बरसात और ठंड के मौसम में जंगल के अलग अलग हिस्सों में निवास करते हैं। वह स्थान जंगल में कई मील दूर -दूर पर स्थित है हाथी दल का मुखिया वर्षों से अपने बुुजुर्गों द्वारा दिखाये गये रास्ते पर परंपरा गत स्थानों पर जाने के लिये निकलते है। तब मानव विकास के कारण अपने आने जाने वाले रास्तों पर खेत खलिहान मकान तार के घेरे से अवरूध रास्ते को अपनी ताकत से तोड़ने का प्रयास करते हैं जिससे मानव और हाथियों का संघर्ष होता है। पिछले वर्षों शासन ने जो जंगल क्षेत्र मे जमीनों पर मालिकाना हक देने का निर्णय लिया है वह जंगली जानवर एवं पर्यावरण पर विपरीत असर डाल रहा है। बाद में वह मानव जीवन पर संकट का कारण बनेगा। संघर्ष के लिये हाथी नहीं मानव जिम्मेदार है।
ध्यानाकर्षण:- मानव क्रूरता के कारण देश से बाध शेर चीता भालू सभी प्राणी समाप्ति के कगार पर चले गये। उसका ही परिणाम है कि बस्तर और सरगुजा के जंगलों में नक्सलीवाद बेखौफ  रहते हैं। यहॉ ध्यान देने वाली बात है कि बस्तर में एक भी जंगली जानवर और शेर भालू तेन्दुआ के दर्शन नही होते। यहॉ तक कि बंदर सांप भी मुश्किल से मिलते है इसलिये नक्सलवादियों के लिये बस्तर का जंगल स्वर्ग जैसा है। यदि पूरे बस्तर में पच्चीस पचास शेर होते तो क्या नक्सली बेखौफ रह पाते। उन्हें भी अपनी जान प्यारी है। वे भी डर के मारे बचने का प्रयास करते। आप स्वंय निर्णय करें। बस्तर के मुकाबले सरगुजा क्षेत्र में नक्सली गतिविधियॉ कम है, क्योकि हाथियो के झुंड से बचने के लिये उन्हे प्रयास करना पड़ता है। मानव अपने विकास के लिये जल जंगल एवं वन जीव जंतु को समाप्त कर रहा है। एक दिन ऐसा आयेगा जब मानव हवा पानी और भूख के कारण तड़पेगा। आज हम शुद्ध पानी खरीद रहे है। कल शुद्ध हवा आक्सीजन भी लेना पड़ेगा। बड़े शहरों में अमीरों के क्लबों में आक्सीजन की मशीने लगाई जाने लगी है। जहॉ दिन भर में दो बार शुद्ध वायु कृत्रिम रूप में लोग लेने के आदि हो रहे है। पेड़ पौधे की कमी और गाड़ियों ए. सी. कल कारखानों के प्रदूषण लोगों को बीमार बना रही है। मानव समाज एवं शासन इस पर स्वनियंत्रण करें। हमारे पूर्वजों के संदेशों पर ध्यान देकर पालन करें तभी वेद वाक्य जिसके कारण भारत की पहचान है। वह साबित होगा। तभी हम कह सकेंगे।
सर्वे भवन्तु सुखिन:।
सर्वे सन्तु निरामया:।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मॉ कश्चित दुख भाव भवेत।।

पता 
मेन रोड, ममता नगर 
राजनांदगांव ( छ.ग.) 
मोबा. 09425240030

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