इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

मनोज शुक्‍ल ' मनोज ' काव्‍यकृति विमोचित

जबलपुर। वरिष्ठ कहानीकार एवं कवि श्री मनोज कुमार शुक्ल ''मनोज'' की काव्यकृति '' संवेदनाओं के स्वर '' का विमोचन गुंजन कला सदन जबलपुर में किया गया। स्व.डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के जन्मोत्सव एवं 25 वां बुंदेली दिवस रजत जयंती समारोह के इस अवसर पर शहीद स्मारक जबलपुर के सभागार में कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी थे अध्‍यक्षता पूर्व अध्यक्ष संस्कृत पाली प्राकृत विभाग रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय एवं पूर्व निदेशक कालीदास अकादमी उज्जैन म.प्र., ने की। विशिष्‍ट अतिथि के रूप में  आचार्य सनातन  बाजपेयी ''सनातन '' ,डॉ. गार्गीशरण मिश्र ''मराल '', आचार्य डा. हरिशंकर दुबे , डॉ राजकुमार ''सुमित्र'', डॉ. विजय तिवारी '' किसलय'' उपस्थित थे।
यह गरिमामयी कार्यक्रम  नगर के  सभी साहित्यकारों के करतल ध्वनि के  बीच प्रारंभ हुआ। कृतिकार मनोज ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस कृति में उन्होंने अपनी मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं को  प्रस्तुत किया है। सामाजिक , राजनैतिक विसंगतियों को अपने ढंग से रखा है। अपने पिता श्री रामनाथ 'श्री नाथ '' की साहित्यिक विरासत को संजाऐं रखने में हम कहॉं तक सफल हुए हैं, यह हमारे पाठक ही  बता सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन श्री राजेश पाठक 'प्रवीण' ने एवं  आभार व्‍यक्‍त संस्था संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव ने किया।

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