इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

वो बात

नरेश टॉक 'अनय'

वे तमाम ख़त
जो कभी अपने पते पर नही पहुंच पाए
उनका एक मुस्तकबिल तुम हो
न जाने
क्या - क्या कहा मैंने तुम्हें
न जाने क्या - क्या कहे से तुम
क्या - क्या समझी।

मैं अब कुछ नहीं कहता
न कहने से भी
तुम क्या समझती हो
कहूं तो
कहती हो कि -
तुम तो कहते हो,
चुप न सहते हो।
खामोश जो रह हूं तो कहती हो-
क्या मैंने कह दिया तुम्हें,
सुन रहे हो
मैं क्या कह रही हूं
तुमने जो कहा
वो सुना मैंने और वो भी ...
जो कहने - सुनने में
लफ़्ज तक आते - आते
आ न सका
उस बात
उस चाह
उस कहने का मैं तलबगार हूं

न जाने तुम कब कहोगी
और जब कहोगी
तब सुनुंगा मैं
पर तुम कुछ न भी कहो
कुछ - कुछ तो सुना हैं
मैंने तुम्हें
सम्‍पर्क
मो. 9871576455

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