इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 29 नवंबर 2014

वो बात

नरेश टॉक 'अनय'

वे तमाम ख़त
जो कभी अपने पते पर नही पहुंच पाए
उनका एक मुस्तकबिल तुम हो
न जाने
क्या - क्या कहा मैंने तुम्हें
न जाने क्या - क्या कहे से तुम
क्या - क्या समझी।

मैं अब कुछ नहीं कहता
न कहने से भी
तुम क्या समझती हो
कहूं तो
कहती हो कि -
तुम तो कहते हो,
चुप न सहते हो।
खामोश जो रह हूं तो कहती हो-
क्या मैंने कह दिया तुम्हें,
सुन रहे हो
मैं क्या कह रही हूं
तुमने जो कहा
वो सुना मैंने और वो भी ...
जो कहने - सुनने में
लफ़्ज तक आते - आते
आ न सका
उस बात
उस चाह
उस कहने का मैं तलबगार हूं

न जाने तुम कब कहोगी
और जब कहोगी
तब सुनुंगा मैं
पर तुम कुछ न भी कहो
कुछ - कुछ तो सुना हैं
मैंने तुम्हें
सम्‍पर्क
मो. 9871576455

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