इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 29 नवंबर 2014

वो बात

नरेश टॉक 'अनय'

वे तमाम ख़त
जो कभी अपने पते पर नही पहुंच पाए
उनका एक मुस्तकबिल तुम हो
न जाने
क्या - क्या कहा मैंने तुम्हें
न जाने क्या - क्या कहे से तुम
क्या - क्या समझी।

मैं अब कुछ नहीं कहता
न कहने से भी
तुम क्या समझती हो
कहूं तो
कहती हो कि -
तुम तो कहते हो,
चुप न सहते हो।
खामोश जो रह हूं तो कहती हो-
क्या मैंने कह दिया तुम्हें,
सुन रहे हो
मैं क्या कह रही हूं
तुमने जो कहा
वो सुना मैंने और वो भी ...
जो कहने - सुनने में
लफ़्ज तक आते - आते
आ न सका
उस बात
उस चाह
उस कहने का मैं तलबगार हूं

न जाने तुम कब कहोगी
और जब कहोगी
तब सुनुंगा मैं
पर तुम कुछ न भी कहो
कुछ - कुछ तो सुना हैं
मैंने तुम्हें
सम्‍पर्क
मो. 9871576455

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