इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 29 नवंबर 2014

प्रो. श्‍योराज सिंह ' बेचैन ' की दो कविताएं

प्रो.श्‍योराज सिंह ' बेचैन '

(डॉ. बी. आर . अम्बेडकर को 14 अप्रैल 1990 में भारत रत्न दिये जाने के मौके पर लिखी गयी कविता )
बयालीस बरस बीते
आज़ादी - ए - भारत को
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया।
आया यह गनीमत है
जम्हूरी हुकूमत में
जातों के झमेलों में
धर्मों के बखेड़ों में
वोटो के लिए चाहे
वाजिब यह इनाम आया।
अब आ के हमें
अपने बाबा का ख्याल आया।
भीष्म की तरह जिनके
गिन - गिन के तीर झेले
धृतराष्ट्र के बेटे थे
कुछ थे मनु के चेले
अफसोस कि जुल्मत पर
अब तक न विराम आया।
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया।
वर्णों के विभाजन में
गृहयुद्ध जातियों का
फल मिल नहीं रहा था
इंसान को मेहनत का
शोषण के सपोलों ने
था जाल - सा फैलाया
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया
तालीम से पाबन्दी,
रोटी के भी लाले थे
गोरों से कहीं ज्यादा
जालिम ये काले थे
महिलाओं के सिर पर भी
गर्दिश ही का था साया
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया।
सौ साल हो रहे हैं
बाबा के जन्मदिन को
आसार - ए - मुक्ति अब
दीखे किसी निर्धन को
ये कौन जिन्हें देखो
इस पर भी मलाल आया।
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया।
मजहूम को इज़्जत दी
अच्छा ही लगा हमको
पर दलितों पे सितम जारी
बाबा पे करम क्यों हैं?
बयालीस बरस बीते
आज़ादी - ए - भारत को
अब आ के हमें अपने
बाबा का ख्याल आया।


शिखर पर
साहित्य में घाघ
कला में कपटी सियासत में शातिर
मीडिया में मठाधीश
सिनेमा में शिखर पर हैं
संसद में मनोनीत
लोकतन्त्र के
माई - बाप
सर्वेसर्वा
अपने आप
देश के सपने
देश की सुविधाएं
देश के साधन
सब के सब
उनके घर पर हैं
वे शिखर पर हैं।
पता -

1/122,वसुन्‍धरा, गाजियाबाद ( उत्‍तरप्रदेश )201012

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