इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

आधुनिक गद्य का विकास और प्रथम हिन्‍दी कहानी

यशवंत 

      कहानी प्राचीन से अर्वाचीन क्षण तक लोकप्रिय विधा है। प्राचीन में कथा, बोधकथा एवं मिथक ( अंर्तकथा ) स्वरूप प्रयुक्त हुई। जैसे पंचतंत्र तथा हितोपदेश की कहानियाँ। कहानी मनोरंजन के साथ - साथ, सोचने - समझने हेतु बाध्य संग अपेक्षित उद्देश्य स्थापित करती है। आधुनिक गद्य की प्रथम हिन्दी कहानियाँ निम्नलिखित हैं -
क्र. कहानी का नाम                    कहानीकार                                    वर्ष
1. रानी केतकी की कहानी           इशा अल्ला खाँ                          1798 से 1806
2. इंदुमति                                 किशोरी लाल गोस्वामी               1900
3. गुलबहार                               किशोरी लाल गोस्वामी               1902
4. प्लेग की चुड़ैल                       मास्टर भगवान दास (मिरजापुर)1902
5. ग्यारह वर्ष का समय              रामचन्द्र शुक्ल                          1903
6. पंडित पंडितानी                      गिरिजा दत्त बाजपेयी                 1903
7. दुलाई वाला1                          बंग महिला  (राजेन्द्र बाला घोष) 1907
        ’इंदुमति’ को हिन्दी की प्रथम कहानी माना जाता है, रामचन्द्र शुक्ल के मत से परवर्ती इतिहासकार भी सहमत हैं । ( 2 ) यह सत्य भी है ? इसे ज्ञात करने के पूर्व खड़ी बोली के आधुनिक गद्य विकास को समझना होगा. ’’ खड़ी बोली के बाद प्रारंभिक उन्नायकों में मुंशी सदासुख लाल ' नियाज़ ’ के बाद इंशा अल्ला खाँ का स्थान है। ’रानी केतकी की कहानी’ प्रसिद्ध रचना है। उन्होंने इस रचना का निर्माण अरबी, फारसी, तुर्की शब्दों; ब्रज भाषा और अवधी के शब्दों और संस्कृत के शब्दों से विहिन ठेठ खड़ी बोली में किया है - उन्होंने उद्देश्य की पूर्ति में वे पूर्ण सफल नहीं हो सके। वैसे उनकी भाषा चलती हुई और मुहावरेदार है और चुलबुलापन हल हुए है। ठेठ खड़ी बोली में रचना करने के अतिरिक्त उनका एक और दृष्टि से महत्व है। प्रणामी संप्रदाय, दौलत राम, सदा सुख लाल, लल्लूलाल और सदल मिश्र की रचनाएँ धार्मिक और पौराणिक और एक प्रकार से पुराने ग्रंथों के आधार पर लिखी गई थी। इंशा ने एक भिन्न विषय प्रस्तुत किया. इस प्रकार आधुनिक खड़ी बोली गद्य के विकास में उनका वही स्थान है, जो आदि कालीन साहित्य में अमीर खुसरो का है। ( 3 ) इंशा की मनोहर भाषा-शैली का एक उदाहरण इस प्रकार है - ’’कोई क्या कह सके, जितने घाट दोनों घाट की नदियों में थे, पक्के चांदी के थक्के से होकर हक्का बक्का कर रहे थे। निवाड़ी, फूलनी, बजरी चलकी, मोरपंख, श्याम सुदर, रामसुन्दर और जितनी ढब की नावें थी - सुनहरी, रूपहरी, किसी-किसी में, सौ-सौ लचके खातियाँ, आतियाँ, जातियाँ, फिरतियाँ थी। उन सब पर खचाखच कुजनियाँ, रामजनियाँ, डोमनियाँ भरी हुई अपने-अपने करतबों में नाचती - गाती, बजाती, कूदती, फांदती, धूमें मचातियाँ, अंगड़ातियाँ, जम्हातियाँ, उंगलियाँ नचातियाँ और ढली पड़तियाँ थी.’’( 4)
        आचार्य शुक्ल जी अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में लिखते हैं - ’’संवत् 1860 के लगभग हिन्दी गद्य का प्रवर्तन तो हुआ पर उसके साहित्य की अखण्ड परम्परा उस समय से नहीं चली। इधर-उधर दो-चार पुस्तकें अनपढ़ भाषा में लिखी गई हो पर साहित्य के योग्य स्वच्छ, सुव्यवस्थित कोई पुस्तक संवत् 1941 के पूर्व की नहीं मिलती। संवत् 1860 (सन् 1803) और संवत् 1915 (सन् 1858) के बीच का काल गद्य रचना की दृष्टि से प्रायः शून्य ही मिलता है.’’(5) फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना (सन् 1800) के साथ ही आगरा कॉलेज तथा दूसरी शैक्षणिक संस्थाओं ने देशी भाषाओं की पदस्थापना कर, देशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया। छाप खाने का भी सराहनीय योगदान रहा। जहाँ से महत्वपूर्ण विषयों पर खड़ी बोली गद्य में बहुतायत पुस्तकें प्रकाशित हुई। इनके विषय राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, ज्योतिष, कला-दस्तकारी, स्त्री शिक्षा, इतिहास, भूगोल इत्यादि है। इसाई पादरियों ने सन् 1801 ई. में न्यू टेस्टामेंट ( New Testament ) का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया। सन् 1801 ई. से सन् 1823 ई. के बीच पश्चिमी हिन्दी सहित अवधी, ब्रज, बघेली, मारवाड़ी और कन्नौजी में लाखों पुस्तकें छापी गई। सन् 1822 ई. में कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी ने ’नीतिकथा’ शिक्षा पुस्तक खड़ी बोली गद्य में लिखा। एक उदाहरण है - ’’कई दिन एक गाँव होकर जाते हमने देखा जो एक बूढ़ा अपने कई पड़ोसियों के साथ इकट्ठे हो एक पेड़ की छाँह में बैठा था, उस प्राचीन मनुष्य के हाथ में कुछ लिखा हुआ था, उसके पड़ोसियों में से कोई वह कागज पढ़ने लगा - ’’6 20 मई सन् 1826 ई. को पं. युगल किशोर शुक्ल ने ’उदन्त मार्तण्ड’ साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया। 9 मई सन् 1829 ई. को ’बंग दूत’ निकाला। सन् 1831 ई. में चैम्बरलैन द्वारा न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद इस प्रकार है - ’’हे तुम सब जो परिश्रम करते हो और बोझ वाले होते हो मेरे पास आवो और मैं तुम्हें सुस्तावूँगा। अपनेयों पर मेरा जुलालेवो और मुझसे सीखो जिससे मैं नरम और मन में लघु हूँ और तुम अपने जीवों से विश्राम पावोगे। क्योंकि मेरा जुवा सहज और मेरा भार हल्का है.’’7 जून 8844 ई में ’बनारस अखबार’ तारामोहन मिश्र के संपादकीय में प्रसिद्ध हुआ। यह अखबार राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद का था। सन् 1854 ई में ’समाचार सुधा-तर्शण’ प्रकाशित हुआ. इसके एक अंक (सन् 1855 ई) की खड़ी बोली गद्य है - ’’ यह सत्य हम लोग अपनी आँखों से प्रत्यक्ष महाजनों की कोठियों में देखते हैं कि एक की लिखि इुई चिट्ठी दूसरा जल्दी बांच सकता नहीं। पाँच-पाँच आदमी इकट्ठा बैठ के ममा, टटा, घघा, डडा कहिके फेर ’मिट्टी का घड़ा’ बोल के निश्चित करते हैं. क्या दुःख की बात है.’’8 सन् 1864 ई. में ’प्रजामित्र’ सामने आया.
       उपर्युक्त अद्य उदाहरणों सहित राजा लक्ष्मण सिंह (सन् 1826 ई, से सन् 1896 ई.) ने हिन्दी का जो स्वरूप पेश किया। वाह राजा शिवप्रसाद की भाषा में नहीं है। परन्तु राजा लक्ष्मण सिह की भाषा भाषाविज्ञान सम्मत नहीं है। राजा के ’रघुवंश’ की पंक्तियाँ है - ’’जब फूल भी देह के संग से आयु का नाश करने को समर्थ हुए तो हाय मरने वाले दई का साधन और कौन सी वस्तु न होगी.’’9 - अथवा - ’’यम कोमल वस्तु को कोमल ही से मारता है. इससे पहले दृष्टांत पाला लगने से नाश होने वाली कमलिनी मैंने मानी है.’’10
       सन् 1801 ई से सन् 1858 ई. के बीच पादरियों से लेकर गैरपादरियों तक खड़ी बोली गद्य की अखण्ड परंपरा मिलती है। जहाँ आधुनिक गद्य का महासागर मिलता है। हमें जड़बुद्धि होकर नहीं सोचना चाहिए। सकारात्मक पक्षीयता अपनाना चाहिए। आजकल ’’इण्डियन कौंसिल फार हिस्टारिकल रिसर्च के मुखिया भी अपने साक्षात्कारों में मिथकों को इतिहास का स्थानापन्न बनाते दिख रहे हैं.’’11 आ. रामचन्द्र ने ऐसा नहीं किया। सीधे कहा - 1803 से 1858 ई. में हिन्दी साहित्य की अखण्ड परम्परा नहीं चली। जाहिर है, स्वस्थ  हिन्दी खड़ी बोली की गद्य परम्परा उपर्युक्त काल खंड में भी प्रवाह मन थी. यही कहा जा सकता है कि  - आचार्य जी की अपनी सीमा, जिज्ञासा रही होगी. ध्यान नहीं गया होगा! स्पष्ट होता है - ’’श्रीलाल, बंशीधर, कुंजबिहारी चौबे, जवाहर लाल, शिवप्रसाद आदि अनेक लेखकों ने विभिन्न विषयों से संबंधित रचनाओं प्रस्तुत कर खड़ी बोली गद्य का अभूतपूर्व विकास उपस्थित किया। अस्तु, 1803 से 1858 के बीच खड़ी बोली गद्य की परम्परा अखण्ड रूप से मिलती है.’’12
        पुनः आते हैं हिन्दी की मौलिक कहानी पर कि ’इंदुमती’ हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी है या नहीं. ’रानी केतकी की कहानी’ की कमी का उल्लेख पहले हो चुका है। आ. शुक्ल जी लिखते हैं - ’’यदि ’इंदुमती’ किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिन्दी की यही मौलिक कहानी ठहरती है.’’13 शुक्ल जी को ’इंदुमती’ पर बंगला कहानी की छाया है, आशंका है (थी). सावधान नहीं हुआ। ’ग्यारह वर्ष का समय’ (सन् 1903) को ’इंदुमती’ के बाद, तत्पश्चात् ’दुलाईवाली’ (सन् 1907 ई.) को स्थान देते हैं। अपने ’हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में ’एक टोकरी भर मिट्टी’ का उल्लेख नहीं कर पाते। आचार्य जी लिखते हैं - ’’भारतेन्दु के समय में ही देश के कोने-कोने में हिन्दी लेखक तैयार हुए जो उनके निधन के बाद भी बराबर साहित्य सेवा में लगे रहे। अपने-अपने विषय क्षेत्र के अनुकूल रूप हिन्दी को देने में सबका हाथ रहा.’’14 परन्तु आचार्य जी माधव राव सप्रे (जन्म 19 जून 1 871) की सूचना प्राप्त नहीं कर सके। उपयुक्त उद्धरण में ’देश के कोने-कोने में हिन्दी लेखक तैयार हुए’, पर चिंतन किया जाय। क्या कारण थे ? उत्तर भारतीय हिन्दी साहित्य परम्परा दक्षिण भारत हेतु साहित्य परम्परा में दक्षिणपंथी थी ? या ’’देश के कोने-कोने में’ का अर्थ केवल उत्तर भारत ही होता है?
     भारतेन्दु (1850 -1885) युग (1850 -1900) में बिलासपुर, पेण्ड्रा (छ.ग.) से माधव प्रसाद सप्रे ने ’छत्तीसगढ़ मित्र’ मासिक पत्र 1900 ई. से प्रकाशित किया. तीन वर्ष प्रसिद्धि पाकर बंद हो गया. ’सरस्‍वती’ और ’छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन लगभग एक समय और एक समान परिस्थितियों में हुआ। दोनों पत्रिकाओं के उद्देश्य भी एक समान थे। जहाँ ’सरस्वती’ के पीछे नागरी प्रचारणी की संगठनात्मक और आर्थिक शक्ति उपलब्ध थी, वहीं ’छत्तीसगढ़ मित्र’ के पीछे केवल सप्रे जी की समर्पित सामाजिक चेतना और उत्कृष्ट साहित्य सेवा भावना थी.’’15 इसी समय महावीर प्रसाद और सप्रे जी का निकट संबंध भी हुआ। तब तो ’छत्तीसगढ़ मित्र’ का भान आचार्य जी को नहीं रहा होगा? सरस्वती में सप्रे जी के निबंध भी छपे। ’छत्तीसगढ़ मित्र’ में 1901 के ’टोकरी भर मिट्टी’ (एक टोकरी मिट्टी) प्रकाशित हुई, जो ’’कथा साहित्य के क्षेत्र में 1901 ई. में ’छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित माधव राव सप्रे की कहानी ’टोकरी भर मिट्टी’ मील के पत्थर के रूप में माना जाता है। कथ्य, तथ्य और भाषा-शैली की दृष्टि से कई समीक्षकों ने इसे ही हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी माना है।’’16 आचार्य जी ने भारतेंदु जीवनकाल की 27 पत्रिकाओं का उल्लेख अपने ग्रन्थ में करते हैं।17. परन्तु 1885 ई. से 1900 ई. तक की पत्रिकाओं की सूचना नहीं प्राप्त करते, पर द्विवेदी की संपादित पत्रिका का पूरा ध्यान रखते हैं और देश के कोने-कोने की लेखनी का हवाला देने वाले आचार्य ’छत्तीसगढ़ मित्र’ को गैर हाजिर कर देते हैं।18 हिन्दी साहित्य का इतिहास का पहला संस्करण संवत् 1996 (सन् 1939 ई.) और संशोधित संस्करण संवत् 1997 (सन् 1940 ई.) को प्रकाशित हुआ।
     कहानी के तत्वों के आधार पर ’टोकरी भर मिट्टी’ सटीक बैठती है और जिसे हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी होने का गौरव प्राप्त हो जाता है। परन्तु डॉ. रामनिरंजन परिमलेन्दु जी ने अपनी खोज से सिद्ध किया कि ’आरलेन्स की कुमारी की कहानी’ जिसके कहानीकार बिहारी लाल चौबे है, हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी है। उपर्युक्त कहानी भारतेन्दु द्वारा संपादित ’बाल-बोधनी’ मासिक पत्रिका में सन् 1876 ई. में प्रकाशित हुई। 19. इस तरह हिन्दी गद्य साहित्य में हिन्दी की आधुनिक मौलिक कहानी उन्नीसवीं शताब्दी के साढ़े सात दशक बाद ठहरती है। भारतेन्दु काल का अल्प ज्ञात गद्य साहित्य एक नवीन शोधात्मक दृष्टि के समीक्षाकार डॉ. किशोरी लाल जी को ’आरलेंस की कुमारी की कहानी’ को शीघ्रता से राष्ट्रीय स्तर की हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाना चाहिए। जिससे बहस निर्मित हो। विमर्श द्वारा जो निष्कर्ष आयेगा सर्वसम्मति से स्वीकार्य होगा। नहीं तो ’टोकरी भर मिट्टी ’ अपनी मौलिकता के साथ गौरवान्वित हो रही है। नहीं तो डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय भी ’टोकरी भर मिट्टी का उल्लेख अपने हिन्दी साहित्य का इतिहास ग्रंथ में अवश्य करते। 20 साहित्य इतिहास ही क्या साहित्य लेखन में सनातनी भेदभाव रहा ही है। प्रेमचंद ने कहा है - ’’कहानी का अाधार अनुभूति है.’’21 आ. रामचंद्र शुक्ल और डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय को हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन में प्रमुख गद्य विधा कहानी ’टोकरी भर मिट्टी के लिए सहानुभूति तक नहीं आई। स्वानुभूति का क्या होगा? वंचितों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य के प्रति क्या व्यवहार हो रहा होगा, समझा जा सकता है। संज्ञान लिया जा सकता है।
      ’’नव जागरण के भीतर राज भक्ति और देश भक्ति की परंपरा साथ-साथ समानांतर चलती है?’’22 क्या व्यक्ति भक्ति की परंपरा भी साथ-साथ समानांतर नहीं चली? हिंदी प्रदीप मई 1889 अंक के प्रकाशित गुमनाम कवि परसन के गद्य की पंक्तियाँ उपयुक्त है - ’’हमारी निद्रा कुंभकरण की निद्रा से बहुत बढ़ी-चढ़ी है, आप हमें कितनी ही बार-बार गुदगुदाइये, हम कभी न जागेंगे. ’’23 क्यों जागना मनुष्य के फितरत में है, आदमी के नहीं. इंसान और अादमी में काव्यगत अंतर है तो कथा - गाथागत भिन्नता रहेगी क्या ? हाँ, तो कोई बात जरूर है, नहीं तो सवाल कहाँ उठता. अन्वेषण जरूरी है।

- संदर्भ -
1. हिंदी साहित्य का इतिहास - आ. रामचंद्र शुक्ल, पृ. 337
2. भारतेंदु काल का हिंदी गद्य साहित्य: एक नवीन शोधात्मक दृष्टि, डॉ. किशोरी लाल, सम्मेलन पत्रिका, अक्टूबर-दिसंबर 2011, पृ.94
3.  हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2009, पृ. 240-241
4. वही पृ. 241
5. हिंदी साहित्य का इतिहास - आ. रामचंद्र शुक्ल, पृ. 287
6. हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, पृ. 242
7. वही पृ. 243
8. वही पृ. 244
9. वही पृ. 245
10. वही
11. हममें से जड़बुद्धि कौन नहीं है - सुभाष तागाड़े, दैनिक देश बंधु रायपुर संस्करण दिनांक 19.12.14 पृ. 04
12. हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, पृ. 242
13. हिंदी साहित्य का इतिहास - आ. रामचंद्र शुक्ल, पृ. 337
14. वही पृ. 244
15. हमारे प्राचीन गौरव पर टिका है साहित्य का वर्तमान - डॉ. सुशील त्रिवेदी, छत्तीसगढ़ साक्षात्कार, सितंबर-दिसंबर 2014, पृ. 8
16.छत्तीसगढ़ सृजनशीलता के विविध आयाम, डॉ. गोरेलाल चंदेल, इतवारी अखबार, संपादक सुनील कुमार, रायपुर संस्करण दिनांक 14.12.14 से 20.12.14, पृ. 42
17. हिंदी साहित्य का इतिहास - आ. रामचंद्र शुक्ल, पृ. 308
18. वही पृ. 305
19. भारतेंदु काल का अल्पज्ञात हिंदी गद्य साहित्य: एक नवीन शोधात्मक दृष्टि, डॉ. किशोरी लाल, सम्मेलन पत्रिका, भाग 96 संख्या 4 सन् 2011 सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद पृ.95
 20. हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, संस्करण 2009
21. आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना डॉ. वासुदेव नंदन प्रसाद, भारती भवन पटना, 23 वाँ संस्करण चतुर्थ पुनः मुद्रण पृ. 297
22. जन कवि परसन: हिंदी नवजागरण का लोकपक्ष - समीर कुमार पाठक, तद्भव - अक्टूबर 2014, अंक 30 पृ. 77
23. वही पृ. 78.
पता - 
शंकरपुर वार्ड न. 10 
राजनांदगांव पिन 491441( छ.ग.)
मो: 07746846926

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