इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

छत्‍तीसगढ़ी '' कथा - कंथली '' में लोक - प्रतिरोध के स्‍वर


- सुरेश सर्वेद

उसके पास तो प्रकृति के कार्यकलापों का,परम्पराओं और अनुभवों के द्वारा अर्जित ज्ञान का विपुल भंडार है। यह लौकिक और व्यवहारिक ज्ञान है और लौकिक और व्यावहारिक संकटों, व्याधियों का हल इसी में निहित है। लोक का यह ज्ञान किसी भी किताबी ज्ञान से श्रेष्ठ होता है।

अालेख

’’छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली’’ छत्तीसगढ़ी लोककथाओं का संकलन है। इसके लेखक और संकलनकर्ता साहित्यकार श्री कुबेर हैं। श्री कुबेर की भाषा और शैली औरों से हटकर है। आप इन्हें पढ़ना शुरू करते हैं, तो समाप्त किए बिना आप संतुष्ट नहीं हो पायेंगे। श्री कुबेर की रचनाओं में उनके विचार और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भी स्पष्ट नजर आती है। लोककथाओं केे प्रस्तुतिकरण में लेखक की वैचारिक स्वतंत्रता सिमट जाती है। किसी भी लोककथा के कथानक में लेखक द्वारा अपने विचारों का मिश्रण करने का अर्थ होगा उस लोककथा के नैसर्गिक स्वरूप को नष्ट करना, उसकी आत्मा को आहत करना। ’’छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली’’ यद्यपि लोककथाओं का संकलन है फिर भी अपनी शिल्पगत विशेषताओं के कारण इसमें संकलित कथाओं का पठन करते हुए किसी शिष्ट या समकालीन कथा साहित्य का आनंद प्राप्त होता है। इस दृष्टि से यहाँ, इस संकलन में संकलित लोककथाओं के कथानक में लेखक अपने विचारों का सम्मिश्रण कर सकता था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया है। कह सकते हैं कि इन लोककथाओं की भाषा और शैली तो श्री कुबेर की है परन्तु उनकी आत्माएँ वही हैं, जो लोक में हैं। लोककथाओं का सृजन केवल मनोरंजन अथवा उपदेश के लिए ही नहीं हुआ होगा। लोककथाएँ लोक की परम्पराओं, आकांक्षाओं, अभिलाषाओं,  सहमतियों-असहमतियों तथा उसके हृदय के हर्ष और विशाद् की सामूहिक अभिव्यक्ति भी है। किसी भी लोककथा की आंतरिक बुनावट में इन तत्वों को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। ’’छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली’’ में संकलित लोककथाओं में भी ये सारे तत्व विद्यमान हैं। श्री कुबेर ने इन तत्वों को रेखांकित करने में पर्याप्त सहजता, सजगता और कुशलता का परिचय दिया है।
असहमतियाँ ही प्रतिकारों-प्रतिरोधों को जन्म देती हैं। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और धार्मिक रूप से शोषित लोक के पास अपनी असहमतियों को व्यक्त करने के लिए न तो पर्याप्त क्षमता रही होगी और न ही स्वतंत्रता। लोक साहित्य लोक की नैसर्गिक अभिव्यक्ति है। निसर्ग पर प्रतिबंध कैसा? तब भी, चाहे लोक साहित्य के माध्यम से ही सही, अपनी असहमतियों और प्रतिरोधों को मुखर रूप से अभिव्यक्त करने के खतरे तो थे ही। शायद इसीलिए लोकसाहित्य में लोक के प्रतिरोध हमें संकेतों, मिथकों और कलात्मक बिंबों के रूप में प्राप्त होते हैं।
’’छत्तीसगढ़ी कथा-कंथली’’ के सोलह पैरों (अध्यायों) में सोलह से अधिक लोककथाओं और लोकप्रचलित किंवदंतियों को लोककथा के रूप में संकलित किया गया है। प्रस्तुत लेख में इनमें से कुछ लोककथाओं में निहित लोक प्रतिरोधों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।
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सियार स्वभाव से ही धूर्त और शातिर होता है। ’’महादेव के भाई सहादेव’’ छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक प्रचलित लोककथा है। इस लोककथा में समाज के धूर्त और शातिर शोषकों की मक्कारी और धूर्तता को सियार की इसी प्रवृत्तिगत धूर्तता का रूपकत्व प्रदान करते हुए बड़ी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। सियार अपने मित्र हाथी से छल करता है। वह उसके पेट में जाकर उनकी आँतों को खाने लगता है। हाथी के मरने के बाद उसके पेट से बाहर आने के लिए वह भगवान महादेव से भी छल करता है। इस छल के लिए महादेव उसे दंडित करना चाहते हैं परन्तु सियार द्वारा वे हर बार छले जाते हैं। भगवान महादेव संहार के देवता हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं। परन्तु इस लोककथा में लोक द्वारा उनका पूर्णतः मानवीयकरण किया गया है। शायद इसीलिए सियार को पकड़ने के लिए वे मानवीयशक्ति की सीमाओं-मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीे कर पाते और मानवीयशक्ति की सीमाओं में रहकर ही वे सारे  प्र्रयास करते हैं। महादेव को मानवीयशक्ति की सीमाओं-मर्यादाओं का अतिक्रमण करने और दिव्य शक्तियों का उपयोग करने की अनुमति लोक भला कैसे दे दे? लोक तो मानवीय शक्तियों पर विश्वास करता है। मनुष्य की सहायता मनुष्य को ही करना होगा, उन्हें किसी ईश्वरीय चमत्कार की आस नहीं करना चाहिए। सारे अवतार और ईश्वर तो गौ और ब्राह्मणों के लिए अवतरित होते हैं। लोक की यह अवधारण अद्भुत है। कई प्रयासों के बाद अंततः सियार पकड़ा जाता है। समाज के अपराधी को समाज ही दण्डित करेगा। यही नैसर्गिक न्याय है। रास्ते से गुजरने वाला हर व्यक्ति इस सियार को पाँच कोटेला मारे, इस हिदायत के साथ उस धूर्त सियार को गाँव के चौराहे पर एक खूँटे से बांध दिया जाता है। अपनी जान बचाने के लिए वह धूर्त सियार अब अपने ही सजातीय से छल करता है।
वर्तमान संदर्भ में देखें तो मनुष्य के अंदर सियारों की स्वभावगत धूर्तता की प्रवृत्ति आज अपने चरम पर है। अपनी धूर्तता और चालाकी के द्वारा समाज ही नहीं भगवान को भी छलने वाले लोगों की आज बाढ़-सी आई हुई है। परन्तु विडंबना ही है कि आज का समाज ऐसे धूर्त और शातिर लोगों को पकड़ने और दण्डित करने के लिए अपनी शक्ति पर विश्वास करने की स्थिति में नहीं है; और आज वह किसी ईश्वरीय शक्ति की, किसी चमत्कार की आस लगाए बैठा है।
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संग्रह में एक दूसरी लोककथा है - ’’जानपांड़े’’। यह कथा भी हास्य और व्यंग्य ले लबरेज है। हास्य इतना कि हँस-हँसकर आपके पेट दुखने लगे और व्यंग्य कलात्मकता से आवृत्त इतना सूक्ष्म और प्रतीकात्मक कि सुनने वालों को इसके प्रहार का अहसास ही नहीं होता। लेड़गा इसका नायक है। कथा-नायक लेड़गा, बुद्धि अथवा स्वभाव से लेड़गा नहीं है। उसके पास व्यावहारिक जीवन में लोक व्यवहारों का ही नहीं अपितु प्रकृति के क्रियाकलापों का भी विशद् ज्ञान है। परन्तु उसे वेदों, पुराणों और शास्त्रों का ज्ञान नहीं है क्योंकि वह नैसर्गिक अधिकारों से वंचित कर दिये गये, समाज के उस वर्ग-वर्ण में पैदा हुआ है; जिसके लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सारे द्वार बंद कर दिये गये हैं। समाज को वर्ण व्यवस्था के सींखचों में जकड़ने वालों ने विभिन्न वर्ण के जातकों के नामकरण के लिए भी कठोर नियमों का विधान किया हुआ है। मनु स्मृति में कहा गया है -
’मंगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्।
वैश्यसय धनसंयुक्तं  शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्।।’
अर्थात् ’ब्रह्मण का मंगल सूचक शब्द से, क्षत्रिय का बल सूचक शब्द से, वैश्य का धन सूचक शब्द से तथा शूद्र का घृणा सूचक शब्द से नामकरण करना चाहिए।’ लेड़गा, हगरू, पदरू, चमरू, कचरू, छेरकू, टेटकू, मेचकू तथा घसनिन, चमारिन, देवारिन, भुखिया, दुखिया आदि नाम इसी व्यवस्था की देन है।
कथा-नायक लेड़गा अपने लौकिक ज्ञान तथा बुद्धिचातुर्य के बल पर भूत में घटित घटनाओं और भविष्य में संभाव्य घटनाओं की सटीक जानकारी देने में माहिर है और इसीलिए वह जानपाड़े के नाम से प्रसिद्ध है।
कालान्तर में राजभवन में महारानी का नौलखा हार चोरी चला जाता है। दरबार के सारे गुप्तचर, सिपाही और ज्योतिष आदि नौरत्न, लाख कोशिशों के बाद भी उस हार को बरामद नहीं कर पाते। परन्तु जानपाड़े उसे बड़ी सहजता से बरामद कर लेता है। फिर उसी राजा के राज में भयानक सूखा पड़ता है। पानी के बिना प्रजा पर प्राणों का संकट छाया हुआ है। बरसात के बारे में राजज्योतिष की सारी भविष्यवाणियाँ गलत साबित होती हैं लेकिन जानपाड़े की भविष्यवाणी सफल होती है।
इस लोककथा का निहितार्थ एकदम स्पष्ट है। लोक निरक्षर हो सकता है परन्तु अज्ञानी नहीं। उसके पास तो प्रकृति के कार्यकलापों का, परम्पराओं और अनुभवों के द्वारा अर्जित ज्ञान का विपुल भंडार है। यह लौकिक और व्यावहारिक ज्ञान है और लौकिक और व्यावहारिक संकटों, व्याधियों का हल इसी में निहित है। लोक का यह ज्ञान किसी भी किताबी ज्ञान से श्रेष्ठ होता है।
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संग्रह में एक और लोककथा है - ’’अपन-अपन करम-कमाई, अपन-अपन भाग’’। मनुष्य अपना भाग्य अपने कर्मों, प्रयासों और उपायों से गढ़ता है। किसी राजा की दो बंटियाँ हैं। राजा अपनी बेटियों से पूछते हैं कि वे किसके भाग्य से सुख और ऐश्वर्य का उपभोग कर रही हैं? बड़ी बेटी कहती हैं कि पिताजी! यह सब तो आप ही का दिया हुआ है। राजा अपने इस बेटी का विवाह किसी राजकुमार के साथ कर देता है। छोटी बेटी न सिर्फ विचारवान है बल्कि उसे कर्म की महत्ता का भी ज्ञान है। वह कहती है कि पिताजी! सुख और दुख तो व्यक्ति के कर्मों का फल है, वह तो अपने कर्मों का ही फल भोगता है। राजा अपनी इस बेटी के इस जवाब से कुपित हो जाता है। उसका विवाह वह मुत्यु शैया पर पड़े किसी अनाथ से कर देता है। 
कालान्तर में परिस्थितियाँ बदलती हैं। दुश्मनों से पराजित होकर वह राजा अब भिक्षावृत्ति पर जीने के लिए विवश हो गया है। यही हालत उसकी बड़ी बेटी की भी है। छोटी बेटी अपने अर्जित ज्ञान और बुद्धिचातुर्य से सभी कठिनाइयों और विकट परिस्थितियों का मुकाबला करती है। अब वह किसी राज्य की सम्राज्ञी है।
लोक को कर्म की महत्ता का ज्ञान है। कर्म की महत्ता को प्रतिपादित करने वाली यह लोककथा अत्यन्त मार्मिक है। लोक में आज भी, ’अपन हाथ जगन्नाथ’, ’बाँह भरोसा तीन परोसा’, जैसी अनेक कहावतें हैं जो कर्म की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं।
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