इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

सुमन खिला रही है

  • रामकुमार भूआर्य ' आकुल '
नयनों से अश्रु की धार बहती जा रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        दिल ने तुम से नाता जोड़ा, मन का मेरे मीत हुए तुम
        मेरे भाव शब्द हैं मेरे, गीत मेरे संगीत हुए तुम
        धड़कन मेरी सरगम छेड़ें, धुन सुना रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

कभी चुभन है, कभी घुटन है, तनहा हूं तनहाई है
तुझमें मैं हूं मुझमें तुम हो, तू मेरी परछाई है
विरहिन यह जिंदगी, हर दिन जला रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        मिला नहीं क्यों अपना जबकि, जनम - जनम का नाता है
        ये तन तो माटी है ,तनहा आता है फिर जाता है
        स्मृतियों की इस झील में तू ही सुमन खिला रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

पता  
दल्ली रोड, बालोद (छग)
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग
पेट्रोल पम्प के आगे
मोबाईल : 08305381289

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