इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

सुमन खिला रही है

  • रामकुमार भूआर्य ' आकुल '
नयनों से अश्रु की धार बहती जा रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        दिल ने तुम से नाता जोड़ा, मन का मेरे मीत हुए तुम
        मेरे भाव शब्द हैं मेरे, गीत मेरे संगीत हुए तुम
        धड़कन मेरी सरगम छेड़ें, धुन सुना रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

कभी चुभन है, कभी घुटन है, तनहा हूं तनहाई है
तुझमें मैं हूं मुझमें तुम हो, तू मेरी परछाई है
विरहिन यह जिंदगी, हर दिन जला रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        मिला नहीं क्यों अपना जबकि, जनम - जनम का नाता है
        ये तन तो माटी है ,तनहा आता है फिर जाता है
        स्मृतियों की इस झील में तू ही सुमन खिला रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

पता  
दल्ली रोड, बालोद (छग)
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग
पेट्रोल पम्प के आगे
मोबाईल : 08305381289

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