इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

सुमन खिला रही है

  • रामकुमार भूआर्य ' आकुल '
नयनों से अश्रु की धार बहती जा रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        दिल ने तुम से नाता जोड़ा, मन का मेरे मीत हुए तुम
        मेरे भाव शब्द हैं मेरे, गीत मेरे संगीत हुए तुम
        धड़कन मेरी सरगम छेड़ें, धुन सुना रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

कभी चुभन है, कभी घुटन है, तनहा हूं तनहाई है
तुझमें मैं हूं मुझमें तुम हो, तू मेरी परछाई है
विरहिन यह जिंदगी, हर दिन जला रही है।
आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

        मिला नहीं क्यों अपना जबकि, जनम - जनम का नाता है
        ये तन तो माटी है ,तनहा आता है फिर जाता है
        स्मृतियों की इस झील में तू ही सुमन खिला रही है।
        आ जा ये सिसकियाँ, तुम्हें बुला रही है।।

पता  
दल्ली रोड, बालोद (छग)
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग
पेट्रोल पम्प के आगे
मोबाईल : 08305381289

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