इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

के.के.सिंह ' मयंक ' की दो रचनाएं

चोरों पर कब अपना रौब जमाते हैं
अब कुत्ते वर्दी पर ही चिल्लाते हैं
बेगम बोलीं चल के डिनर तैयार करें
कल की चोट अभी तक क्यों सहलाते हैं
इश्$क में शरमाना कैसा हैं साठ के बाद
नौजवान ही उल्$फत में घबराते हैं
प्यार किया है आएं उसके घर के लोग
सारे मोहल्ले वाले क्यों लतियाते हैं
ए.सी.रुम में सास - ससुर का कब्जा है
हम दालान में बैठे सर्दी खाते हैं
मन करता है डेनिम जींस पहननने का
बच्चे मुझको धोती ही पहनाते हैं
किटी पार्टी में सखियां हैं पत्नी की
और मयंक जी दूर खड़े ललचाते हैं
2

फ़लक पर एक धुंधला सा सितारा देख लेना था
उसी की रोशनी में फिर किनारा देख लेना था
ज़रा सी देर में बस्ती उजड़ कर ख़ाक हो जाती
गुलामों को तो आक़ा का इशारा देख लेना था
बताओ किस सबब से अपनी आँखें मूंद ली तुमने
हमारी मौत का तुमको नज़ारा देख लेना था
वही मैं था जिसे तुम देखते ही चौंक उट्ठे थे
अगर शक था, पलट कर फिर दुबारा देख लेना था
स$फर के बीच रोने से तो बेहतर था तुम्हें पहले
नदी है, झील है, पर्वत की सहरा, देख लेना था
गले में हार सबके डाल आए यह बताओ तुम
यहां पर कौन जीता, कौन हारा देख लेना था
बिना सोचे विचारे क्यों मयंक अशहार पढ़ आए
किसी की शायरी भी है गवारा, देख लेना था

गज़ल 5/597,
विकास खण्ड गोमती नगर,
लखनऊ (उ.प्र.) 226010
मोबा. 09415418569
mayankkrishnkumar@gmail.com

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