इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

पांच मुक्‍तक



श्‍याम ' अंकुर '
(1)
कोयलिया का गान गया।
हंसों का बलिदान गया।।
झूठों को अब मान मिला ।
सच्‍चों का सम्‍मान गया।।

 (2)
चाहे शबरी नाम मिले।
या केवट का काम मिले।।
जिसके मन में मैल भरा।
उसको कैसे राम मिले ।।
(3)
घर ' ऑगन यूं सून किया है।
जख्‍मी यह कानून किया है।।
जिसके सिर पे ताज उसी ने।
अरमानों का खून किया है।।
(4)
' अंकुर ' धाब छिपाये कैसे।
मन की पीर बताये कैसे ।।
बैरी जब मधुमास हुआ।
खुशियॉं भी मुस्‍काये कैसे।।

(5)
रूठा वह मधुमास गया।
दूर बहुत उल्‍लास गया।।
कुछ भी ' अंकुर ' शेष नहीं।
मन का जब विश्‍वास गया।।

पता -
हठीला भैरूजी का टेक 
मण्‍डोला वार्ड,  बारां - 325205 
मोबाईल : 09461295238

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