इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

श्‍वान-निद्रा

मनीष कुमार सिंह

लेखक परिचय

भारत सरकार,सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में अवर सचिव।विभिन्‍न पत्र - पत्रिकाओं यथा - हंस,कथादेश,समकालीन भारतीय साहित्‍य,साक्षात्‍कार,पाखी,दैनिक भास्‍कर, नई दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका,लमही, कथाक्रम, परिकथा, जनपथ, नवनीत इत्‍यादि में कहानियॉ प्रकाशित। पॉच कहानी-संग्रह-'आखिरकार','धर्मसंकट','अतीतजीवी', ‘वामन अवतार’ और ‘आत्‍मविश्‍वास’ प्रकाशित। 
कहानी

         लिफ्ट में मुझे मिसेज सचदेवा मिल गयी। मैंने कहा - हाय आशा पड़ोस में रहकर भी तुम हफ्तों नजर नहीं आती । भई कभी हम जैसों से भी बात कर लिया करो। तुम्‍हारे  पड़ोस में रहकर हम भी सलीकेदार हो गए हैं।''
- अरे मैडम हमें क्‍यों शर्मिंदा करती हैं। '' मैं उनकी विनम्रता पर मुग्‍ध हो गयी। '' यह हमारा सौभाग्‍य है कि आपका साथ मिला।''
- अच्‍छा यह झूठी तारीफ छोड़ो। चलो बताओ, मुझे चाय कब पिला रही हो। 
-  जब जी चाहे आ जाइए। आपका घर है।'' वह अपनेपन से मेरा हाथ थामकर बोली।
- ऐसे नहीं चलेगा। डेट बताओ फिर आती हॅू। घंटे भर बैठकर आराम से गप्‍प हॉकेगें। वरना कहीं ऐसा न हो कि तुम्‍हारे पतिदेव घर में मौजूद मिले और मैं खामखाह कबाब में हड्डी बनॅू।'' 
मेरी मंजिल आ गयी और मैं बाहर निकल गयी। 
- कल शाम को पधारिए बड़ा अच्‍छा लगेगा।'' मैंने चलते - चलते जल्‍दी में कहा।
         भला ऐसे जिंदादिल लोग शहर में कितने मिलते हैं। कोई यू.पी.से आया है तो कोई बंगाल से। दक्षिण भारतीय परिवार भी मिल जाएगें। कुछेक एन.आर.आई. का तमगा धारण किए लोग भी कभी - कभार प्रवासी पक्षी की भॉति आते हैं और बिना कोई चिन्‍ह  छोड़े कब चले जाते हैं किसी को पता भी नहीं चलता । इस माहौल में आत्‍मीयता वास्‍तव में सुखद है।
       मिसेज सचदेवा  पढ़ी - लिखी व समझदार महिला थीं। खाली समय में ट्यूशन पढ़ाती थीं। पति - पत्‍नी दोनो बेहद सुस्‍कृत प्रतीत होते थे। पति एक बहुराष्‍ट्रीय कंपनी में उच्‍च पद पर थे। जाहिर था कि वे ट्यूशन पढ़ाने के पीछे अर्थ अर्जित करने की लालसा नहीं अपितु अपना शौक रहा होगा। मैंने अपने बेटे हैप्‍पी को उनके पास पढ़ने के लिए भेजना शुरु कर दिया। उसे वे बिल्‍कुल अपने बेटे की तरह मानने लगी। मोबाइल पर फोन करके कहती कि कल उसकी साइंस की किताब भेजना। नए चैप्‍टर समझाने हैं। जब हैप्‍पी घर पर किसी बात पर नखरे दिखाता तो मैं फोन करके उन्‍हें बताती कि देखिए आपका बेटा मुझे तंग कर रहा है। मुझे भरोसा हो गया था कि उनके मार्गदर्शन में हैप्‍पी अपनी चंचलता का परित्‍याग करके एक विद्यानुरागी छात्र बनेगा। कलियुग में और वह भी महानगर में ऐसी हस्‍ती के मिलने से मैं स्वयं को धन्य समझ रही थी। हैप्पी ने मुझे बताया कि सचदेवा आंटी के यहॉ गॉव से एक लड़का आया है। करीब दस साल का यानि उससे दो साल बड़ा। घर के कामकाज के लिए उन्होंने उसे रखा था। मैंने भी उसे देखा। शक्ल.सूरत से अपनी उम्र की तरह मासूम और खिलन्दा। हैप्पी के आते ही खुश होकर उसका स्वागत करता। बीच में कभी - कभी उस पर नजर पड़ने पर मिसेज सचदेवा गंभीर स्वर में घर का कोई काम करने का आदेश देती। बच्चों के ट्यूशन खत्म होने पर जाते समय वह दौड़कर दरवाजे पर आता। हैप्पी ने ही मुझे उसका नाम बताया.कन्हैया। अच्छी तरह पहना - ओढ़ा कर एक मोर पंख सर पर खोंस दो तो वास्तव में कन्हैया लगेगा। '' गॉव में भूखों मरता होगा। यहॉ आकर देह पर रवानी आ गयी है।'' मिसेज सचदेवा ने सुनाया।
          मुझे लगता था कि कन्हैया सही जगह पर है। बाल श्रम संबंधी कानून चाहे जो भी कहे लेकिन वह ढ़ाबे - होटलों में काम करने वालों बच्चों, खदान और फैक्ट्ररियों में पीसते और यहॉ तक कि अपने झारखण्डी और छत्तीसगढ़ी गॉवों से बेहतर स्थिति में है। आखिर गर्मी में पंखे की हवा में कमरे में रहता है। फ्रिज का पानी और घर का बढ़िया खाना नसीब होता है। जिन मॉ.बाप के चार - छह औलाद हो वे ऐसा ही करते हैं। एकाध को शहर में कारखाने में खटने भेज देगें। किसी को कहीं घर में घरेलू नौकर बनाकर रखवा देगें और बाकियों के थोड़ा बड़ा होने का इंतजार करेगें ताकि उन्हें भी इसी भॉति निपटाया जाए।
          मैं हैप्पी को एक बार डॉक्टर के पास ले गयी थी। पार्क में खेलते वक्त किसी आवारा कुत्ते ने उसकी टॉग में दांत गड़ा दिया था। डॉक्टर ने कुत्ते पर निगरानी रखने को कहा। अगर वह मर जाता है तो और इंजेक्शन लगेंगे वरना दो से काम चल जाएगा। फिर जरा हॅसते हुए बोला - '' आप लोग पढ़े - लिखे हैं। कभी - कभार झुग्गी वाले भी कुत्ते के काटने का केस लेकर अपने बच्चों को लाते हैं। तब मैं उन्हें सारे इंजेक्शन लगाता हॅू। उनकी बात का पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता। आप लोग अपने बच्चों को इतना प्यार करते हैं, केयर करते हैं कि बिल्कुल सही रिपोर्ट देगें।''  मैं सामाजिक - आर्थिक यथार्थ सुन रही थी। मिसेज सचदेवा को यह बात किसी पड़ोसी से मालूम हुई। वे फोन पर बड़ी आत्मीयता से मुझसे लड़ने लगीं-  '' मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी आशा कि तुम मुझे पराया समझोगी। बताओ हैप्पी के साथ ऐसा हो गया और मुझे खबर किसी और से मिल रही है।'' फिर उन्होंने काफी विस्तार से कुत्तों की बेहिसाब बढ़ती संख्या के कारणों व निदान पर प्रकाश डाला। - इन्हें हूमेनली कंट्रोल करना चाहिए। स्ट्रलाइजेशन से इनकी ग्रोथ रोकनी चाहिए। यॅू नो आशा आई एम नॉट एगेंस्ट एनिमल्स्। बट हूमन बिईंग शुड गेट प्रिफेरेन्स ओवर देम।''
         विषय को परिवर्तित करते हुए उन्होंने आगे कहा - आशा मेरे बेटे को उसके स्कूल वाले सिंगापुर भेज रहे थे। स्टूडेन्टस् का ग्रुप जा रहा है। थर्टी फाइव थाउजेन्‍ट  का खर्च है और स्कूल वाले फॉरटी फाइव थाउजेन्ट वसूल रहे हैं। शायद इसी में साथ जाने वाली टीचर का एअर फेयर भी होगा। बाकी पैसे स्कूल चलाने वालों की जेब में जाएगा। इसलिए मैंने मना किया।''
           मैं कुछ नहीं बोली। तुम्हे पता है आशा, एक पब्लिक स्कूल ने क्लास थ्री के बच्चों को यू.एस.ए. में नासा विजिट कराने भेजा। अरे भेजना है तो इंडिया में भाभा एटोमिक सेन्टर दिखाना था। फिर क्लास थ्री के बच्चे आखिर कितना समझ पाएगें। जरा बड़ी क्लास के स्टूडेन्ट ले जाते तो कोई बात थी। देखो ये तामझाम हमें पसंद नहीं है।'' इस बार मैंने हृदय से उनका समर्थन किया। किसके पास फेंकने के लिए इतने पैसे हैं।'' पति - पत्नी दोनो के कमाने के बाद भी वे तृणमूल स्तर पर थीं।
        उनकी छोटी बिटिया अभी मुश्किल से एक साल की होगी। कन्हैया उसे गोद में उठाकर घूमाता। उसके खिलौनों को नचाकर उसे हॅसाने की कोशिश करता। कभी वह खुद भी नाच कर बच्ची को बहलाने का प्रयास करता। दरअसल इन सब उपक्रमों से स्वयं उसका मन भी बहलता था। हैप्पी उसे कन्हैया भईया कहता। वह भी उसे देखकर मित्रवत मुस्कराता। कभी उसके किताब में बने चित्रों को नजदीक आकर गौर से देखने लगता। साफ - सुथरे वस्त्र धारण किए बालकों के मध्य कन्हैया थोड़ा दबा अवश्य रहता लेकिन चहकने में कमी नहीं करता था। गेंदा में गुलाब जैसी सुगन्ध नहीं होती लेकिन उसकी गंध में अपनापन खूब होता है भले ही वह गुलाब की तरह अभिजात्य न हो।
         मिसेज सचदेवा जैसी सुरुचिपूर्ण स्त्री घर की सज्जा पर विशेष ध्यान देती थी। यदि कन्हैया का कार्य उनकी अपेक्षानुसार नहीं होता तो वे कड़ाई से पेश आतीं। हैप्पी को नहीं पता कि वह मार खाता था कि नहीं परंतु डॉट खाने के बाद कई घंटे तक मॅुह लटकाए रहता। जो खाना अपने बच्चों को देती हॅू वही नौकर को भी देती हॅू। मुझे लगा कि कन्हैया इतने दिनों बाद भी काम ढग से नहीं सीख पाया है। मुझे उनके घर के बारे में ज्यादा नहीं पता था। एक बार उन्होंने स्वयं बताया कि इस भागदौड़ वाली जिन्दगी में वे नौकर को सुबह पॉच बजे उठने को बोलती हैं। घर का काम निपटाने के लिए जल्दी उठना जरुरी है लेकिन वह मरा एक तो उठता नहीं है और अगर घंटी बजाकर जगाया भी उनींदी अवस्था में जो भी काम करेगा वह गड़बड़ कर देगा।
          मैं क्या कहती। सुबह उठने में मैं खुद आलस्य करती थी लेकिन झक मारकर उठना पड़ता। विद्यार्थी के पंच लक्षणों में एक श्वान निद्रा भी शामिल है लेकिन यह औरों के लिए भी जरुरी है। जैसे हम गृहणियों, काम पर जाने वाले लोगों, नौकरों इत्यादि के लिए।
        एक सुबह खिली हुई गुलाबी धूप में पार्क में टहलती हुई मिसेज सचदेवा मिल गयीं। बोली - आशा तुम्हें क्या बताऊॅ। कन्हैया घर से भाग गया।''
- क्या..... !'' मैं सचमुच अवाक रह गयी। पूछी - कब.... ।''
- कल। ये ऑफिस के लिए निकले ही थे। मैं फोन पर किसी से बात कर रही थी। देखती हॅू कि यह घर में कहीं नहीं दिख रहा है। हर जगह छान मारा। आसपास की झुग्गियों में कामवाली को भिजवा कर पूछ लिया। कहीं कुछ पता नहीं। कन्हैया से अपभ्रंशी समरुपता के आधार पर अगल - बगल के नौकरों से भी पूछा। शायद उधर का होने की वजह से उसने उन लोगों को कुछ बताया हो।''
          मैं उनको मुसीबत में ढ़ॉढस बॅधाना चाहती थी पर उन्हें अविचलित देखकर चुप रही। बेचारा इतना सा बच्चा आखिर कहॉ जा सकता है। गलत हाथों में पड़ गया तो .... मैंने पूछा -  कुछ पैसे - वैसे तो नहीं लेकर गया।''
- नहीं, ऐसी बात नहीं है।'' उसने  सकून भरी वाणी में बोलीं - '' मैंने चेक कर लिया है।''
- बिना रुपए - पैसे के आाखिर कन्हैया कहॉ निकल गया। भूखा - प्यासा कब तक भटकेगा। पुलिस को रिपोर्ट कर दीजिए भाभी जी। कुछ अनहोनी घट गई तो बेकार में मुसीबत हो जाएगी। वह अपने लेबल पर खोज - खबर करेगी।'' मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार सबसे उपर्युक्त सुझाव दिया। वे विचारमग्न हो गयीं। बोली - देखो कल तक नहीं मिला तो सोचूगी।'' उनकी पेशानी पर बल पड़ गए। वे आकर हमें तंग करेंगे। चाइल्ड लेबर में फॅसा न दे। आशा मैंने बस तुमसे यह सीक्रेट शेयर किया है। किसी को नहीं पता कि हमारा नौकर भाग गया है। कोई पूछेगा तो यही कहॅूगी कि अपने गॉव चला गया।'' उन्होंने मेरी हथेली अपने दोनों हाथों में लेकर भावपूर्ण तरीके से कहा।
- इसमें कहने की क्या बात है।'' बदले में मुझे यह कहना ही पड़ा। लेकिन जेहन में कन्हैया की भोली सूरत घूम रही थी। मैंने प्रश्‍न किया - आखिर वह गया कहां।''
- अपने गॉव की ट्रेन में बैठ गया होगा।'' उन्होंने अनुमान प्रकट किया लेकिन इस अंदाज में मानो इसके सिवा कोई अन्य संभावना हो ही नहीं सकती। '' विद आउट टिकट !'' मेरे मॅुह से हठात् निकल पड़ा।
- अरे टिकट - विकट क्या होता है आशा। टी.टी. को देखकर ये लोग बर्थ के नीचे घुस जाते हैं। ये जानवर से कम थोड़े न हैं।'' वे अपनी सुविधानुसार भविष्य को रेखांकित कर रही थीं।
दो दिन और बीत गए। मैं उनके घर पहॅुच गयी। हालॉकि हैप्पी से रोज पूछने पर यही सुनने को मिलता था कि कन्हैया भईया का कुछ पता नहीं चला। वे मुझे देखकर पहले जितना खुश नहीं हुईं। मैं बिना कहे सोफे पर बैठ गयी। वे काम में व्यस्त होने का प्रदर्शन करने लगीं। इस ठंड़े स्वागत को दरकिनार कर मैंने पूछा - क्या हुआ, कुछ पता चला ।
- देखो आशा हम इस बारे में क्या कर सकते हैं। मेरे हसबैण्ड बेहद बिजी रहते हैं। छुट्टी मिलती नहीं है। वी आर सिविलाइज्ड पीपुल। अगर इस बात का जरा भी गुमान होता तो कभी ऐसी मुसीबत नहीं पालती। ना बाबा खुद काम कर लो लेकिन यह बला मत पालो। उनके ड्राइंग रुम में चर्चित हस्तियों से जुड़े चटपटी खबरों का टी.वी.चैनल नाट्य रुपांतरण प्रस्तुत कर रहे थे। कमरे में टी.वी. की आवाज गॅूज रही थी अन्यथा हमारे बीच खामोशी खून के थक्के की तरह जम गयी थी। मैं उठकर चली गयी।
आखिर पॉचवें दिन खुद मिसेज सचदेवा का फोन आया - आशा कन्हैया अपने गॉव पहॅुच गया है।''
- अच्छा!'' मेरे ऊपर से मानो एक बड़ा सा पत्थर हट गया है। लेकिन विश्वास नहीं हो रहा था इसलिए प्रश्न किया - लेकिन कैसे मालूम हुआ।''
- उसके गॉव का एक आदमी है। हम उसे जानते हैं। वही बता रहा था। न जाने क्यों मुझे अपनी सुशिक्षित व व्यवहारकुशल सहेली पर शक हुआ।
बात आयी - गयी सी होने लगी। उन्होंने दिवाली पर अपने पति के साथ हमारे घर आकर एक बेहतरीन टी - सेट उपहार स्वरुप दिया। हम अभिभूत रह गए। मैंने कहा - इतना मॅहगा गिफ्ट देने की क्या जरुरत थी।''
- अपनों में मॅहगा.सस्ता नहीं देखा जाता।'' वे पहले जैसी मित्रवत् थीं। उस दिन की रुखाई न जाने कहॉ छूट गयी थी। अतिथि के लिए चाय - नाश्ता परोसते और अच्छी बातें करते व सुनते मेरा मन अभी भी कहीं भटक रहा था। क्या कन्हैया सचमुच अपने गॉव पहॅुच गया। मानव अंगों की तस्करी करने वालों के हत्थे नहीं चढ़ा। अंग - भंग करके भीख मॅगवाने वाले गिरोह से बच गया या गलत ट्रेन में चढ़कर राह भटक कर कहीं और पहॅुच गया। कैसे मॉ - बाप होगें इसके जो खोजखबर तक नहीं करते कि उनकी औलाद किस हालत में हैं। क्या पैदा इसलिए करते हैं कि मेहनत - मजूरी करके उन्हें पैसा भेजता रहे। अब तक यदि वह जिन्दा भी होगा तो क्षुधाग्रस्त आंतों के वश में होकर किसी के द्धारा इस्तेमाल किया जा रहा होगा। मछली यदि मगरमच्छ के जबड़े से बच भी जाए तो उदबिलाव के मॅुह में जाएगी।
           सलीके से मिठाई का जरा सा टुकड़ा मॅुह में डालते सचदेवा दम्पत्ति अत्यन्त सभ्य शहरी प्रतीत हो रहे थे। मिसेज सचदेवा के पति ने संयत स्वर में अपना मंतव्य व्यक्त किया - देश की जनसंख्या बेहिसाब बढ़ रही है। साहब, क्या कीजिएगा। गरीबों की संख्या बेरोक - टोक बढ़ती रही तो बेचारी सरकार भी क्या करेगी। कोई कुछ भी कहे लेकिन डेमोक्रेसी छोड़कर कुछ देर के लिए हमें डिक्टेटरशिप चलानी होगी। इनके पोपुलेशन को रोकने के लिए कुछ करना चाहिए।'' सचदेवा दम्पत्ति के दमकते चेहरे को देखकर लगता नहीं था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। उनका सौम्य स्वभाव सारे संदेह मिटा देता था। शहर का ट्रैफिक, जनजीवन बिल्कुल सामान्य था। किसी विशिष्ट व्यक्ति के काफिले के गुजरने पर सुरक्षा में तैनात पुलिस बिल्कुल मुस्तैद दिखती थी।
          मेरे पति विषय को सूचनात्मक जानकारी की ओर ले गए। बोले - हर रोज हजारों बच्चे सड़क पर सोते हैं। बिना किसी हिफाजती उपाय के। उनके मॉ - बाप कहीं और, वे कहीं और। कुछ तो जानबूझकर वहॉ सोते हैं जहॉ सारे कुत्ते सोते हैं ताकि अगर कोई उन्हें उठाना चाहे तो कुत्ते भौंककर शोर मचाए।''
         सचदेवा दम्पत्ति मौन रहे। आत्मलीन वृक्ष संभवत: पवन के वेग से कतिपय ध्वनियॉ करने लगते हो पर चेतना सम्पन्न मनुष्य बाहृय चित्ताकर्षक व्यवहार से अन्र्तमन के भाव आवृत करना बेहतर समझता हैं। वे चाहते थे कि घटना के विषय में उनकी व्याख्या को स्वीकार किया जाए एवं उससे भिन्न पाठों पर चिन्तन वर्जित हो। मेरे पति ने उनके जाने के बाद मुझे समझाया कि परायी बातों में अधिक रुचि उचित नहीं है। कुत्ता अगर घास खाना शुरु कर दे तो सब लोग उसे पाल ले। ये नौकर - चाकर भी टैक्टफुली हैंडल करने पर टिकते हैं। मैं समझ गयी कि गुदगुदी उतनी ही करनी चाहिए जिससे हॅसी आए पर जान न जाए। बेकार में कहीं दोस्ती पर आंच न आ जाए।
       मैं रात में पति के साथ मार्केट निकली। कुछ दिनों से बारिश के कारण बाहर जाना रुक गया था। नगरवासी वर्षाजनित कठिनाईयों का अनुभव कर रहे थे। बारिश में शहर के बिजली के खम्बे दिन भर भीगते रहे। विशिष्ट जनों के इलाकों की बात अलग थी। संपूर्ण दिवस अविराम वृष्टि के पश्चात् भी ढालू जमीन पर जल का कोई अवशेष न रहा। मानो सब कुछ अध्र्य मात्र था जो लुढ़क गया। टी.वी. चैनल शहर के ट्रैफिक जाम और जलभराव की द्दश्यावलियॉ दर्शाते हुए अधिकारियों की पोल खोलने में लगे हुए थे। मैं खरीददारी के साथ कहीं ठीक - ठाक जगह पर बैठकर खाने का लोभ संवरण न कर पाई। लौटते वक्त सड़क पर खम्बों पर लगे ट्यूब - लाइट दूधिया रोशनी का आवृत फैलाकर एक नितांत शहरी द्दश्य उपस्थित कर रहे थे। तभी मेरी द्दष्टि फुटपाथ पर लेटे हुए कुछ भिखमंगेनुमा व्यक्तियों पर पड़ी। पानी से यथासंभव बचते हुए यत्र - तत्र चादर व कम्बल बिछाए कतिपय जीव पड़े थे। दिवस पर्यन्त वर्षा में भीगने के बाद वृक्ष के पत्ते किसी अभिशप्त आत्मा की तरह फड़फड़ा रहे थे। हम दोनों आगे बढ़ते रहे। शहरों में समृद्धि के साथ ये नजारे आम बात हैं। दोनों का सहअस्तित्व है। क्षुद्र कंकर फेंकने से भले ही अथाह गहराई वाले सागर का मौन भंग हो जाता है लेकिन नगरीय सभ्यता इस प्रकार के द्दश्यों से विचलित नहीं होती है। एक ओर थोड़ी कम रोशनी में कुछेक कुत्ते लेटे हुए थे। उनके बिल्कुल समीप दो - तीन बच्चे कूड़े के ढ़ेर की तरह पड़े हुए थे। चादर ओढ़े बच्चों को उनके देह का लघु आकार व्यस्कों से अलग करता था। दिन में शायद किसी फिल्मी गाने की धुन अथवा किसी भक्ति गीत पर भीख मॉगते होगें। मेरे मन में सहसा यह ख्याल आया कि कहीं कन्हैया उनके बीच तो नहीं लेटा हुआ है। कैसे पता क्या उनका मॅुह देखने के लिए चादर खींचे, लोग क्या सोचेगे, शायद मुझे पागल समझे। फिर वही हो इसकी क्या गारंटी। शहर में ऐसे न जाने कितने फुटपाथ और सड़के हैं। इन पर सोने वाले अनगिनत लोग हैं। वह शायद इसी शहर में कहीं होगा। अपने गॉव अकेले कैसे पहॅुच जाएगा। मॅुह - ढ़ॅककर सोए लघु आकार की प्रत्येक देह कन्हैया दिख रही थी। कहॉ खोजे....।
        खैर जहॉ भी हो, समझदार होगा तो वहीं सोएगा जहॉ कुछ कुत्ते पहले से पड़े हो।  भले ही इनका भौंकना बेवजह माना जाए या फिर किसी तकलीफ में रोना तो नितांत अशुभ समझा जाए परंतु वे भौंककर उसे खतरे से बचा सकते थे। आखिर उनकी श्वान निन्द्रा आसानी से भंग होती है। दुनिया और समाज भले ही सोई रहे।

पता
कमरा नं. 148 बी, प्रथम तल
परिवहन भवन, संसद मार्ग
नयी दिल्ली.110001
मोबाइल: 9868140022

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