इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

स्‍वर्गवासी - नर्कवासी

                                                                  कुबेर

                                                         लेखक परिचय 



सन 2012 में जिला प्रशासन व्‍दारा  मुक्तिबोध सम्‍मान से सम्‍मानित श्री कुबेर का जन्‍म 16 जून 1956 में राजनांदगांव (छ.ग.) जिले के ग्राम भोडि़या, में हुआ। वे शास. उच्‍च.माध्‍य.शाला कन्‍हारपुरी में व्‍याख्‍याता के पद पर कार्यरत हैं। अब तक भूखमापी यंत्र (कविता संग्रह), उजाले की नीयत( कहानी संग्रह), भोलापुर के कहानी ( छत्‍तीसगढ़ी कहानी संग्रह ) कहा नहीं (छत्‍तीसगढ़ी कहानी संग्रह), छत्‍तीसगढ़ी कथा - कंथली ( संकलन अउ लेखन ), माइक्रो कविता और दसवॉं रस ( व्‍यंग्‍य संग्रह ) पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है। और कितने सबूत चाहिए ( कविता संग्रह ), सोचे बर पड़हिच् ( छत्‍तीसगढ़ी कविता संग्रह ) प्रकाशन की प्रक्रिया में है। उनकी अनेक रचनाएं अनेक पत्र - पत्रिकाओ में प्रकाशित हो चुकी है एवं अनेक कहानियों का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर व्‍दारा प्रसारित हो चुकी है। श्री कुबेर साकेत साहित्‍य परिषद सुरगी व्‍दारा प्रकाशित  स्‍मारिका वर्ष 2006 से 2012 तक एवं शास. उच्‍च. माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी व्‍दारा प्रकाशित पत्रिका ' नव - बिहान ' का वर्ष 2010 एवं 2011 में सम्‍पादन कर चुके हैं।

व्‍यंग्‍य


    उस दिन मैं काफी देर तक सोता रहा। और जब मेरी नींद खुली, मेरे कानों में ढेर सारी महिलाओं और इक्का-दुक्का मर्दों के रोने-कलपने की आवाजें आ रही थी। ऐसा तो किसी के मरने के बाद होता है। मुझे आश्चर्य हुआ। हमारे परिवार में अस्वस्थ तो कोई नहीं था।
   मैंने अनुभव किया, मेरा फोम का मुलायम गद्दा बड़ा सख्त हो गया है और  मुलायम रजाई की जगह मैं अजीब तरह के कपड़े ओढ़ा हुआ हूँ। एक जोरदार अंगड़ाई लेकर आँखें मलता हुआ मैं बैठ गया। पता चला, मैं जमीन पर सोया हुआ था। मेरे सामने सजी हुई एक अर्थी पड़ी थी। परिवार और गाँव के सारे लोग आसपास बैठे हुए थे। बहुत सारे मित्र और रिश्तेदार भी उपस्थिति थे। आँख मलते हुए चेहरे पर मैंने धूल की मोटी परत का अनुभव किया था। मैंने अपने हाथों को देखा। हाथों में गुलाल लगे हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ। क्या मेरा ही मातम मनाया जा रहा था?
   माहौल अचानक बदल गया। सबके चेहरे पर आश्चर्य और अविश्वास की मिलीजुली खुशियाँ तैरने लगी। मेरे परिवार वालों, रिश्तेदारों और मित्रों से भी अधिक खुशी कचरूमल सेठ के चेहरे पर दिखी। कचरूमल गाँव का सबसे बड़ा सेठ है। वह गाँव भर को अनाज, कपड़े और किराने के सामान बेचा करता है। उनके सूदखोरी के बोझ से सारा गाँव दबा हुआ है। मैं भी हजारों से दबा हुआ हूँ।
   लोग मेंरे भाग्य को सराह रहे थे और मुझे लंबी उम्र की दुआएँ दे रहे थे। दुआएँ देने वालों में मेरे स्कूल के मेरे सहयोगी शिक्षक भी थे। इनमें सबसे आगे खातू गुरूजी थे। सोकर उठते वक्त मैंने गौर किया था, तब खातू गरूजी वहाँ नहीं दिखे थे। उनका न दिखना स्वाभाविक ही था। ये मेरे उन चाहने वालों में से हैं जो दिन में सौ-सौ बार मेरे मरने की कामनाएँ किया करते हैं। परन्तु अभी वे कहने लगे - ’’सर! आपके पुनः जी उठने से आज मुझे जो खुशी मिली है, उतनी तो जिंदगी में कभी नहीं मिली थी। बधाई हो सर।’’
   और नित्यकर्मों से निपटकर जब मैं बैठक में लौटा तो मेरे आसपास लोगों की भीड़ पुनः जमा हो गई। जमा होने वालों में एक डेरहा बबा हैं जो रामचरित मानस का पाठ सुने बिना भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। ’हम बदलेंगे, युग बदलेगा, का नारा लगाने वाले रामसरन जी हैं। पिछले चालीस साल से वे इस नारे का निरंतर, विधि पूर्वक जाप कर रहे हैं, पर आज तक न तो वे खुद बदल सके और न ही युग बदला। मुसुवा राम सहित और भी बहुत लोग थे जो त्रिवेणी में डुबकी लगा आये थे। वैतरणी, चौरासी लाख योनी और सरग-नरक को मानने वाले अनेक लोग थे पर सबसे आगे था गाँव के मंदिर का पुजारी जो सूदखोर ही नहीं नंबर एक के नीयतखोर भी हैं। सूदखोरी के मामले में ये दूसरे नंबर पर हैं।
   पुजारी जी बड़े धैर्यवान व्यक्ति हैं, धीरज धारण करते हुए उन्होंने पूछा - ’’क्या हुआ था बेटा?’’
मैंने कहा - ’’मैं तो मजे से सोया हुआ था। बढ़िया-बढिय़ा सपने देख रहा था। मुझे क्या पता क्या हुआ था?’’
    ’’सुबह जब तुम देर तक सोकर नहीं उठे तो हम लोगों ने देखा, तुम्हारी साँसें बंद थी। नाड़ी-गति भी रुक गई थी। शरीर बरफ के समान ठंडा पड़ गया था। हम लोगों ने समझा, कि तुम सदा के लिए सो चुके हो।’’ पुजारी जी ने फिर कहा।
   रामसरन ने कहा - ’’हमें भी पता है कि तुम सपने देख रहे होगे, पर क्या-क्या देखा कुछ याद भी है? यमदूत देखे होगे, वैतरणी पार किये होगे। चित्रगुप्त के दरबार में हाजिर किये गये होगे। चित्रगुप्त ने तुम्हारा बही-खाता देखा होगा। तुम्हारे दिन पूरे नहीं हुए थे इसलिए उन्होंने तुम्हें वापस धरती पर धकेल दिया होगा।’’
मैंने मन में कहा, दिन में कई-कई बार मरने वाले लोग ऐसे ही सपने देखा करते होंगे। फिर ऊपर से कहा -           ’’अरे हमारी ऐसी किस्मत कहाँ भैया, जो हमारे लिए यमदूत आएँ। बहरहाल, बड़े मंत्री जी के कमाण्डो आये थे लाल बत्ती वाली गाड़ी में। कहने लगे - ’’जल्दी चल साले, मंत्री जी अभी बुला रहे हैं।’’
    बड़े मंत्री का नाम सुनते ही मुझे बेहोशी आने लगी। कमाण्डों के पास ए. के. 47 था, साले की गाली सुन लेने में ही भलाई थी। डरते-डरते मैंने पूछा - ’’भाई! किसलिए?’’
     ’’अनाप-शनाप लिख-लिखकर खूब छपवाने लगे हो। बड़ा लेखक जो बनने चले हो न। कुछ इनाम-विनाम नहीं लोगे?’’
    और फिर इनाम-विनाम का नाम सुनकर मैं पूरी तरह बेहोश होकर गिर गया। वो मुझे घसीटकर ले जाने लगे। लाल बत्ती वाली गाड़ी में बैठने की मेरी भी बड़ी इच्छा थी, सोचा आज इसका भी आनंद मिल जायेगा। पर मेरी ऐसी किस्मत कहाँ। उन्होंने कहा - ’’अबे लल्लू ! कहाँ चले? हट साले। तुझे तो पीछे रस्सी से बांधकर घसीटते हुए ले जायेंगे।’’
     ’’उन्होंने मेरे हाथ-पैर बांधकर गाड़ी के पीछे बंपर से बांध दिया। गाड़ी हजारों मील की स्पीड से दौड़ने लगी और देखते ही देखते अंतरिक्षयान में तब्दील हो गई।’’
    पुजारी ने कहा - ’’हरे! हरे! बड़ी तकलीफ हुई होगी वैतरणी पार करने में। गऊ दान किया था कि नहीं? अब की बार जरूर कर देना।’’
    मैंने कहा - ’’वैतरणी? अरे पुजारी जी, रास्ता तो यही था, बड़े-बड़े गड्ढों वाली, जो इस गाँव को राजमार्ग से जोड़ता है। बीच का वही बरसाती नाला था जिसमें पिछले साल पुल बनवाया गया था और जो पहली बरसात में ही राम नाम सत्त् हो गया था। ऐसे रास्तों पर शायद आप लोगों को तकलीफ नहीं होती होगी, हमको तो रोज ही होती है। रोज-रोज देखकर दिल जलाने में और आने-जाने में जो तकलीफ होती है, वही आज भी हुई।’’
   रामसरण के मन में जिज्ञासाएँ उछाल मार रही थी। पूछा - ’’अच्छा! अच्छा! ये तो बताओ, चित्रगुप्त के दरबार में पहुँचकर क्या हुआ?’’
   मैंने कहा - ’’अरे भैया, कुछ मत पूछो। लोगों की बड़ी भीड़ थी वहाँ। लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई थी। बड़ी-बड़ी मूछों वाला और भयानक चेहरे वाला आदमी मेन गेट के सामने आरामदायी कुर्सी पर बैठा था। उसके पीछे दो दरवाजे थे, एक सरग वाला और दूसरा नरक वाला।’’
  ’’सही कहते हो भैया, सरग और नरक के दरवाजे अलग-अलग तो होंगे ही। वह आदमी खाता-बही देख-देखकर लोगों को सरग या नरक की ओर भेज रहा होगा। है न?’’ पुजारी जी ने अपने पारंपरिक ज्ञान की पुष्टि के लिए मेरी ओर कातर निगाहों से देखा।
   ’’खाता-बही नहीं, थैलियाँ देख-देखकर। जिनके हाथों में चढ़ावे के लिए सोने-चाँदी की थैलियाँ होती थी उनके लिए सरग के द्वार खोले जाते। बाकी के लिए नरक के द्वार तो खुले ही थे।’’
   मेरे प्रत्यक्ष अनुभव से पुजारी जी को बड़ी निराशा हुई। उसने प्रतिवाद किया - ’’बेटा क्या कहते हो? धन-दौलत, महल-अटारी तो सब यहीं रह जाता है। थैली की बातें कुछ समझ में नहीं आई। अच्छा यह तो बताओ, फिर तुम्हारा क्या हुआ?’’ पुजारी जी ने दूसरा प्रश्न किया।
   ’’कर्म जब साथ में जाता है तो उसका फल साथ में क्यों नहीं जायेगा पुजारी जी। यहाँ के कर्म का फल वहाँ मिलता है कि नहीं? आदमी यहाँ जो-जो और जितना-जितना कमाता है, वहाँ के हिसाब से वही चीजें वहाँ फिर मिल जाती हैं। रही मेरी बात, तो मेरे लिए भी नरक के ही द्वार खुले थे। थैला मेरे पास भी कहाँ से आता। पिछले दिनों पार्ट फायनल निकलवाया था, वो सब तो कचरूमल के थैले में समा गया था। यहाँ क्या है अपने पास, जो वहाँ वापस मिलता। पर किस्मत अच्छी थी मेरी जो उसने मुझे पहचान लिया।’’
    ’’अरे! किसने? चित्रगुप्त ने। भैया! वो तो सबको ही पहचान लेते हैं। अंतरजामी जो ठहरे।’’ पुजारी जी ने फिर अपना पौराणिक ज्ञान बघारा।
   ’’मुझे इस टोका-टाकी पर बड़ा क्रोध आया। मैंने कहा - ’’अंतर-फंतरजामी कुछ नहीं पुजारी जी, उनके पास फोटो वाला वोटर लिस्ट था। एक बहुत बड़ा सुपरकंप्यूटर था जिसके स्क्रीन में वही वोटरलिस्ट दिख रहा था। समझे? और जिसे तुम बार-बार चित्रगुप्त कह रहे हो, जिसने मुझे देखते ही पहचान लिया था, वह कोई और नहीं, मेरा ही पढ़ाया हुआ गब्बर सिंह था। समझे?’’
   ’’गब्बर सिंह?’’
   ’’आप उसे नहीं जानते पुजारी जी, दिमाग पर नाहक जोर मत डालो। जब मैं शहर के स्कूल में पढ़ाता था तब की बात है यह। बड़ा उधमी बालक था वह। भगवान जाने, मेट्रिक कैसे पास कर लिया। वैसे नकल-चकल करने में बड़ा माहिर था वह। तब मैं उसे बड़ा नालायक समझता था। पर आज वही, मेरा सबसे अधिक लायक शिष्य साबित हुआ। देखते ही पहचान लिया। कुर्सी से उठकर बड़ी श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़कर उसने मुझे प्रणाम किया। उनकी ऐसी गुरूभक्ति देखकर मेरी तो आँखें भर आयी। उसने कहा - ’’ओ हो, हो .... गुरू देव! आप कैसे? ठीक-ठाक तो है न? रिटायर हो गये क्या?’’
  तभी मुझे बांधकर लाने वाले कमांडो में से एक ने कहा - ’’हें, हें ...। भाई! बड़े साहब ने इनको स्पेशली बुलवाया है न। वहाँ के पण्डे-पुजारी और नेता लोग रोज इनके बारे में बड़ी-बड़ी शिकायतें लिखकर भेज रहे हैं, इसलिए।’’
   उसने उस कमाण्डो को धमकाते हुए कहा - ’’हुकुमचंद! हुकुमचंद ही बनकर रहो साले। .........चंद बनने की कोशिश मत करो। ले ही आये हो तो इन्हें यहाँ थोड़ा घुमा-फिरा दो और इज्जत के साथ वापस छोड़ आओ, समझे। ये हमारे गुरूदेव है। बड़े साहब से हम बात कर लेंगे।’’
   पुजारी जी ने पूछा - ’’तो कहाँ-कहाँ घूमे बेटा! सरग में घूमे कि नरक में?’’
   ’’चूकना क्यों, दोनों जगह घूमा।’’
   डेरहा बबा ने पूछा - ’’लतखोर राम बड़ा धर्मात्मा था बेचारा। जीवन भर राम का नाम जपता रहा। पंडितों और संतों की संगति करता रहा। पेटला महराज का सबसे बड़ा चेला था। सरग में आराम से रह रहा होगा। है न?’’
    ’’आराम से ही है बाबा जी, नरक में है तो क्या हुआ, यहाँ से तो लाखों गुना आराम है वहाँ।’’
’’आँय! एक तरफ कहते हो नरक में है और फिर कहते हो बड़े आराम से है? बात थोड़को समझ में नहीं आई। ऐसा धर्मात्मा आदमी और नरक में है? तो सरग में कौन लोग हैं?’’
    ’’यहाँ आदमी योनी में जनम लिया था वह पर जीया कैसे, जानवरों वाली जिंदगी? और जिंदगी भर खाया क्या, शाक-भाजी और सूखी रोटी? रहा कहाँ, दड़बे के समान झोपड़ी में? सबसे बड़े नरक की सजा तो यहाँ से भोग कर गया है वो। और हाँ, वो पेटला महराज है न, उसी के सामने रहता है, पर सरग में। लतखोर राम जब भी देखता है उसे, सौ-सौ गालियाँ बकता है। अपनी बुद्धि को कोसता है कि क्यों उस दुष्ट की बातों में आकर जिंदगी को नरक बना डाला।’’
   मेरी बातें सुनकर सारे लोग निराश और दुखी दिखाई देने लगे। पुजारी जी, डेरहा बबा, रामसरण और मुसुवा राम, चारों आपस में कुछ कानाफूसी करने लगे।  कह रहे होंगे - ’आदमी सरक गया है, बहकी-बहकी बातें कर रहा है। भूत-प्रेत का मामला भी हो सकता है। पहले ओझा से झड़वाना पड़ेगा।’ और सभी लोग उठ-उठकर जाने लगे। जाते-जाते पुजार जी ने कहा - ’’बेटा! अभी बीमारी से उठे हो, थके-थके से लग रहे हो। बाद में आयेंगे तब बात करेंगे। अभी आराम करो।’’
   और थोड़ी देर बाद जब वे लौट कर आये तो सचमुच गाँव का ओझा सबसे आगे था। मैंने खुद से कहा - ’’अब भुगतो बेटा, सच बोलने की सजा।’’
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पता 
व्‍याख्‍याता, 
शा.उच्‍च्‍.माध्‍य.शाला कन्‍हारपुरी 
वार्ड - 28, राजनांदगांव ( छ.ग.)
मो. 9407685557






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