इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

हमर गंवई गॉंव म

गणेश यदु
चहके चिरइया, बिहिनिया अंगना अउ दुवार म। 
सरग - सुख पावंय जम्‍मों, अमरइया खेतखार म।। 
हमर गंवई गॉंव म...... 

छनर - छनर पइरी बाजय, पनिहारिन के पॉंव म। 
पंडरू - बछरू- पठरू बोलयं, महतारी के नांव म।।
खेलइया लइका निकरगे, खोर भिनसार म
हमर गंवई गॉंव म ...... 

बबा के खांसी - खोखली, लइका के तोतरी बोली। 
पिंजरा के सुवा बोले, संगी के हांसी ठिठोली।। 
सरी सुख ह अमाये हे, दाई के दुलार म 
हमर गंवई गॉंव म ......... 

अंगाकर चीला अउ चाहा, बनावत हे बहुरिया। 
गोसानिन संसो करय, भुखागे होही नंगरिहा।। 
रोटी - अथान धर के,  रेंगय, मेड़पार म 
हमर गंवई गॉंव म ......... 

बर अउ पीपर के छंइया, गॉंव म तीरथ - धाम हे।
पबरित नंदिया के पानी, गॉंव म बुता काम हे।। 
नइ जावन कहूं डहर दूसर के रूजगार म 
हमर गंवई गॉंव म ......... 

पता 
सम्‍बलपुर 
जिला - कांकेर (छ.ग.) 494633 
मोबा: 07898950591

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें