इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

जूते की जोड़ी

सपना मांगलिक
परिचय

उपसम्पदिका- ' आगमन ' साहित्य पत्रिका , स्वतंत्र लेखन , मंचीय कविता , ब्लॉगर , संस्थापक – जीवन सारांश समाज सेवा समिति , बज्म - ए - सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति ) , सदस्य - ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया , अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव , महानगर लेखिका समिति आगरा , साहित्य साधिका समिति आगरा , सामानांतर साहित्य समिति आगरा , आगमन साहित्य परिषद् हापुड़ , इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन दिल्ली
प्रकाशित कृति - पापा कब आओगे , नौकी बहू (कहानी संग्रह) , सफलता रास्तों से मंजिल तक , ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्य संग्रह) कमसिन बाला , कल क्या होगा , बगावत (काव्य संग्रह ) जज्बा - ए - दिल भाग – प्रथम ,द्वितीय , तृतीय (ग़ज़ल संग्रह) टिमटिम तारे , गुनगुनाते अक्षर , होटल जंगल ट्रीट(बाल साहित्य), संपादन –तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह )स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान), प्रकाशनाधीन – इस पल को जी ले (प्रेरक संग्रह)एक ख्वाब तो तबियत से देखो यारो (प्रेरक संग्रह ), विशेष –आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण।,सम्मान-विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित


कहानी
      श्यामा की जब से सगाई तक हुई है। उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। और उसकी छोटी बहनें व सखी सहेली उसे चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थीं। सावन का महिना था। श्यामा झूले पे झोंटा लेती हुई सावन की मल्हार गुनगुना रही थी- '' झूला तो पड़ गयो अमुआ की डाल पे जी'' झोटे लेते - लेते वह दूर कहीं एक स्वप्निल आकाश में बिना पंखो के ही उड़ान भरने लगी। चारों तरफ  पीले सरसों के फूल और मोहन अपने दोनों हाथ फैलाकर अपनी बाहों में आने के लिए कह रहा है। जैसे कि दिलवाले दुल्हनियां ले जाऐंगे वाली फिल्म में शाहरूख खान, काजोल को बुलाता है। और वह भी सफेद लांक्षा और चुनरी पहनकर, शरमाती,सकुचाती,आंखों में प्रेम के आंसू भरे,दोनों हाथ फैलाए उसकी तरफ  भाग रहीं थी। धड़ाम् की अचानक आवाज आई, श्यामा को दिन में अंधेरे के साथ चाँद तारे दिखने लगे। अरे, यह क्या श्यामा तो जमीन पर सिर सहलाये '' ऊई मां मर गई रे ''  की चित्कार करने लगी। तभी पेड़ के पीछे से मुन्नी,तेजी,लालो की हंसी के फव्वारे एक सुर में फूट पड़े। तीनों श्यामा को घेर कर उससे हंसी ठिठोली करने लगीं। '' क्यूॅ री श्यामा, ससुराल की खाट से गिरी या झूला से'' तेजी तेज स्वर में खिलखिलायी।
      लालो - ''अरी ससुराल की खाट से ही गिरी लगे है जीजा संग'' हंसी का एक और फव्वारा। तीनों एक के बाद एक हास्य और व्यंग्य के तीर छोड़ खिलखिला रहीं थीं जैसे डीग के फव्वारे एक के बाद फिर दूजा शुरू कभी एक साथ सारे फव्वारे शुरू कभी हल्के तो कभी रंग भरे।
मुन्नी -  अरी श्यामा ऐसो काह कर रही ऐं जीना संग जो फट ते गिर पड़ी''
श्‍यामा - (बनावटी गुस्से में) मैं मरी हाय राम यह सब पगलियाऐं मेरे मत्थे ही लिखीं तुमने। चुप बेशर्मों, अब जियादा चांय चूं की तो देख लियो। बात नाय करूॅगी तुझसे! और झूठ - मूठ एक कोने में मुंह फुलाकर बैठ गयी।
      तीनों सखियां अपनी रूठी दुल्हनियां को मनाने की कोशिश करने लगीं।
तेजी - अरी श्यामा काहे को सूजी पड़ी है। अच्छा बहन चल माफ  करिदे हमकूं बस'
श्यामा मुंह झटककर बोली - हॅू .... और दूसरी तरफ  देखने लगी।
लालो - अरी ऐसे ही रूठी रहेगी तो जे दो चार दिन तेरे संग बिताने कूं जो रह गये हैं ऊं यों ही बीत जायेंगे। फिर जाने कब मिलनों होए ना होए का पतो।'
मुन्नी - हां री, सही कहत है भग्गो के ब्याह कू भी महिना बीत गयो पग फेरा तक कू नाय आई।''
      अब श्यामा अपना गुस्सा और नखरे भूल अपनी सखियों के गले से लग गयी। तभी वहां पिन्ना कूदते - कूदते आ गयी और हांफते हुये बोली - अरी तुम यहां मगजमारी कर रही हो वहां भग्गों जीजी घर आई हैं तमकूं बुलाय रही हैं।''
      चारों सखियां खुशी से उछलते हुये - का कह रही है पिन्ना भग्गो आई है। अरी बड़ी लम्बी उमर है मोढ़ी को नाम लियो नहीं के हाजिर ' चल पिन्ना कहते हुये चारों भग्गो के घर की तरफ दौड़ पड़ीं। पलक झपकते ही पांचों शैतान की खाला भग्गो के घर में पहुंच गयी और उसे कलेजे से लगाते हुये - काय री भूल गयी हम सखी सहेलिन कूं ? जीजा ने ऐसी का घुट्टी दूध में घोलके पिलाय दई तोकूं जो हमारी नेक याद नांय आई तोहे। भग्गो की भाभी - घुट्टी दूध में नाय प्रेम में घोलके पिलायी है बहनोई जी ने! भग्गो शर्माते हुये ' का भाभी तुमऊ ना।
      इतने में तेजी की तेज नजर भग्गो के गले और गालों पर कनपटी के पास कुछ गोल लाल धब्बों पर पड़ीं। तेजी - अरी भग्गो यह कैसी चोट के निशान हैं ? भग्गो (शर्माते हुये) मच्छर खाय गयो कल रात मोहे।
 भाभी - बीबी जी मच्छर कुछ ज्यादा बड़ो हथो ना ? भग्गो फिर शर्मा गयी। भाभी हंसी दिल्लगी करके सखियों के लिये छाछ और चबैना लेने रसोईघर चली गयी। तभी श्‍यामा ने भग्गो की बांह पकड़ी और उसे धकेलते हुये बाहर खेत में ले जाने लगी। बाकी सखियां भी पीछे पीछे चल पड़ीं। खेत पहुंचकर भग्गो ने पूछा - अरी श्‍यामा यहां काय कूं खेंच लाई घर पे आराम ते बात करते छाछ चवैना खाते पीते!''
श्‍यामा-  वहां भाभी और चाची के सामने जियरा की बात नाय होय पाती ताते यहां ले आये तोहे।''
भग्गो - सुनो है तेरो ब्याह पक्को है गयो पार गाम के मोहन ते सुनो है बड़ो खूबसूरत गबरू जवान हत्यो है ऊ लालो सही सुनो है मोहन जीजा सलमान खाने के जैसे हत्यें बस जूता ही फटीचर पहने है। लालो की बात सुन सब सखी सहेली खिलखिला पड़ीं। और श्‍यामा क्रुद्ध होकर बोली - आदमी की पहचान जूता ते नाय दिल ते होवे! जूता तो फटअऊ जावे और नये अऊ आ जावें!
भग्गो - (रूठी सखी को मनाते हुये) अरी छोड़ लालो तो कुछ ज्यादा ही हंसी करे। तू इ बता अब तो तेरे मन में लड्डू फूट रहे होंगे।
      श्‍यामा का चेहरा उगते सूरज की समस्त लालिमा अपने अंदर समेट लाया। सखी के सुर्ख कपोल देख अन्य कुआंरी सखियां प्रसन्न भी हो रही थीं और साथ में अपने स्वप्‍न कुमारों की कल्पनाये सजों रहीं थी। तेजी अपना तेजपन प्रयोग में लाते हुये बोली - अरी भग्गो - अब तेरो ब्याह है गयो है नेक बता तो ई ......... अलीमून का होवे पिक्चर में बड़ो दिखावें ?
भग्गो - (हंसते हुये अपना ज्ञान प्रकट करती है) अरी मोढ़ी ऊ अलीमून नाय हनीमून होवे।
लालो - (धड़कते हृदय से) और इ सुहागरात कै होवे ?
भग्गो - इ टीवीया में हीरो हीरोइन चूमा चाटी करे ऐसो का ब्याह के बाद आदमी अपनी औरत ते भी करें ?
भग्गो - (लजाते हुये) हां री इ टीवीया के गाने जो आवें उनमें खेला दिखायो जावे।
मुन्नी - ऐ री भग्गो इ खेला तेने कैसे खेलो हमकूं बता ? अब हमारे बापू भी हमारे काजे नाई से बात कर रहे हैं। हमारो ब्याह हो गयो तो हमें मुश्‍िकल नाय पड़ेगी ?
भग्गो - (गंभीर होते हुये) अरी ई खेला इतनों अऊ मजेदार ना होवे जो तुम सब बावड़ी हुयी जा रही हो।
श्‍यामा - (घबराकर) अरी काय है गयो पूरी बात बताय दे हमकूं मोकू तो डर लग रयो है। भग्गो की गंभीरता से श्‍यामा की सुनहरी बिन पंखों वाली स्वप्‍नलोक की उड़ान को जैसे ब्रेक लग गये। अब तीनों सखी गंभीरता से भग्गो की सुहागरात की कहानी सुनने लगीं।
भग्गो - जब यहां ते कंगना खेलके और जूता चुरायके तुमने हमें ट्रक में बिदा करो तो तुम्हारे जीजा हमें बड़े प्रेम ते देखत रहे! घर पहुॅचके भी हमरो बड़ो ध्यान रख रहे। जब रात कूं हमें लहंगा ओढ़नी पहनाके जब कमरा में अकेले बैठायो जेठानी जी ने तो ऊ वहां आ गये और कुंडी लगाय लई। फिर कछू देर तक तो ऊ हमरे हाल चाल पूछत रहे फिर ना जाने उनकी खोपड़ी में का भूत सवार हुयो ऊ हमारी ओढ़नी खेचवे लागे। हमकू कसके पकड़ लियो हम घबराये गये। हमने कहीं इ काह कर रहे हो जी ? तो ऊ बोले - चुप रह जो कर रहे हैं करन दे नहीं तो गुस्स आय जायेगी हमें। फिर उनने हमें और कसके भींच लियो तो अबके हमें गुस्सा आय गई हमने कही - ई काह कर रयो है। मरजाने, का तोय लाज ना आवे। अबई रूक मैं सासूजी कू बुलाऊं ऊ तोय सीधो करींगी। हम जैसे सासू जी कू आवाज लगाते बाने हमारो मोंह पकड़ो एक हाथ ते और दूजे ते दो चार हममें धर दिये। और पिल पड़ो हमपे, हमरी ऐसी हालत कर दई चार दिना तक ना बैठत बनो ना उठत।
श्‍यामा - (घबराके) हम ब्याह ना करेंगे हमें तो डर लग रयो है बड़ी जोर को।
लालो - अरी भग्गो इ खेला तो बड़ो ई बुरो होवे री टीविया (टीवी) के गाने मे तो ऐसो बड़िया प्रेम दिखावें लगे कै हीरो हीरोनिया कैसो आनंद ले रहे हैं।
तेजी - अरी जाको मतलब टीवीया में सब झूठ दिखायें ब्याह बहोतई बुरो होवे है।
भग्गो - अब अपने कपोलों को टमाटर की तरह रसभरे सुर्ख करते हुये - अरी नाय तेजी, शुरू - शुरू में ऊ सब तकलीफ देवे पर अब जबते मैने उनकी बात माननी शुरू करी है। ऊ तो टीवीया के हीरो की तरह हमरो ध्यान रखे हैं और बहुत अई प्रेम करे हैं।
मुन्नी - ई निशान मारवे पीटवे के हैं भग्गो ?
भग्गो - (लजाते हुये) नाय री उनके प्रेम के हैं।
श्‍यामा - ऐं री भग्गो दरद होवे ?
भग्गो - बा से ज्यादा आनंद आवे!''
      बंद कली सी किशोरवय सखियां भग्गो की बात सुनकर अपने - अपने भंवरे के आने के सपने संजोने लगीं। जो उन्हें छूकर खिलते हुये फूल की शोखी और खुश्‍बू प्रदान करेगा। सबके दिल धोंकनी से धड़क रहे थे। रोमांच की तरंगे नाजुक अंगो को थर्र थर्रा रहीं थीं। कांपते होंठ, तेज धड़कन और नारीत्व की लाज शरम इन तीनों का संगम उन नवयौवनाओं में उस पल दृष्टिगोचर हो रहा था।
श्‍यामा ने लरजते होंठ और धड़कते मन से पूछा - भग्गो का तेने अलीमून मनायो ऊ के बारे में भी बता ना ?
भग्गो - घर के बाहर जो पति पत्नि खेला करें, बाय हनीमून कहवें।''
तेजी - घर के बाहर कहां खेत में या भैंस के तबेले में ?''
भग्गो - दोनों ही जगह घर ते बाहर हैं। जाको मतलब हनीमून है। एक दिन वे भी कह रहे हमकू खेत ले जावेकी। पर हमने मना कर दई का पतो कोई देख ले हम तो मरि जायेगे शरम ते। ताते हम नाय गये।''
तेजी ने फिर अपना तेजपन दिखाया और बोली - अरी तो रात में फसल की रखवारी करवे के बहाने ते जईयो। रात में तो कोऊ ना मिलेगो। जीजा के मन की भी है जायेगी।'
लालो - कैसे ना मिलेगो ऊ मटका के खोपड़ा बारो बिजूका अपनी बड़ी आंखन ने गाढ़के इनन ने ना देखेगो का ?''
मुन्नी - अरी एक उपाय है। बिजूका के मोंह पे अपनो आंचल ओढ़ाय दियो।''
      मुन्नी की बात पे सब सखी सहेली खिलखिला पड़ीं। दो दिन बाद भग्गो तो अपने प्रियतम के संग विदा हो गई। मगर श्‍यामा के तन बदन में खलबली मचा गयी। श्‍यामा ही क्यों तेजी, लालो, मुन्नी इन तीनों के सपनों ने भी अपने पंख फैला लिये थे। सोते - जागते, उठते - बैठते अपने काल्पनिक शहजादे के साथ चांद के रथ पर बैठी दूर कहीं ख्यालों की स्वर्ण नगरी की सैर करना ही उनका अब मुख्य काम था। बापू उनके इस तरह खोये - खाेये रहने की वजह पूछते मगर मां तो सब समझती थी कि उसकी चिड़िया अब उसका घोंसला छोड़ नया घोंसला बनाने को उतावली हो रही है। किशोरावस्था का यह ख्वाबों, ख्यालों और रोमांचक कल्पनाओं से भरा समय हर स्त्री पुरूष के जीवन में आता है। गांव की काकी इसे '' सोग का रोग ''  कहती थीं। श्‍यामा अपने मोहन की बारात का रास्ता बेसब्री से देखने लगी। कैसे मोहन घोड़ी चढ़के फूलों का सेहरा सिर पर बांध राजकुमार की तरह बारात लेकर आयेगा और रानी महारानी के तरह वह उसके साथ डोली में बैठकर विदा होगी। भग्गो की शादी की तरह कंगना, अंगूठी और छंद वाले खेल - खेले जायेंगे। मोहन कनखियों से उसकी ओर देखकर छंद सुनायेगा।
'' छंद पकाऊं छंद पकाऊ छंद के ऊपर थाली
साली मेरी तेजतर्रार घरवाली भोली भाली''
      फिर जूता चुराई की रस्म होगी। तेजी, लालो, मुन्नी, राधे सब जूता चुराके नेग मांगेगी। अरे! नहीं मोहन वा दिन भी उधड़े जूते पहन आयो तो सखी खूब मजाक उड़ायेंगी मेरो। यह सोचते ही श्‍यामा बाहर आ गयी! और अलमारी में रखी अपनी मिट्टी की गुल्लक निकाल लायी। एक पल के लिये उसके हाथ ठिठके क्योंकि उसने अपनी बहन राधे से वादा किया था कि ब्याह के बाद वह यह गुल्लक उसे दे जायेगी। मगर फिर उसने अपने हृदय को कड़ा करके वो गुल्लक फोड़ ही दी। वर्षों से सहेजी गुल्लक को फोड़ते वक्त वह ठीक ऐसा महसूस कर रही थी जैसे उसने अपने ही हाथों किसी अपने की कपाल क्रिया की हो। सदा- सदा के लिये किसी प्रिय चीज को खो देने का भाव उसके मन को कचोट रहा था। खैर उसने फटाफट पैसे बीने गुल्लक से निकले आठ आने एक रूपया और दो रूपया के सिक्के और वह नोट गिने तो वह पांच सौ रूपयों की एक मोटी राशि बन चुके थे। श्‍यामा ने चुपके से गांव के गौतम को यह पैसे देते हुये शहर से एक बढ़िया जूते की एक जोड़ी मंगाई। और लग्न वाले दिन गौतम के द्वारा ही मोहन के पास भिजवा भी दी। साथ में यह भी कहलवाया कि मोहन ब्याह वाले दिन यही जूते की जोड़ी पहनकर आये।
      ब्याह का दिन भी आ गया। सुबह से ही श्‍यामा का दिल फ्यूज ट्यूबलाईट की तरह लुप चुप लुप चुप धड़क रहा था। उसके दिमाग में यही बात मक्खी की तरह भिनभिना रही थी कि मोहन कही अपने पुराने उधड़े जूते पहनकर ना आ जाये। तभी बैंड बाजे बजने की आवाज आयी। बारात पौरी (देहरी) तक आ गयी थी। तेजी, लालो भागकर बारात का नजारा देखने गयी। मोहन काले रंग की एक घोड़ी पर टिका था और उसके कुछ मित्र '' मेरे यार की शादी है'' वाले गाने पर दारू पीकर घोड़े गधे की तरह दुलत्ती मार मारके नाच रहे थे। इसके बाद एक ने रूमाल से बीन बना ली दूसरा सड़क पर नागिन की तरह लोटकर अपने ही मित्रों को डसने की कोशिश करने लगा। तेजी व लालो ने अपनी सखी श्‍यामा को बारात का आंखों देखा हाल बयान किया। लेकिन श्‍यामा का मन तो यह जानने को बेचैन था कि मोहन ने उसके भेजे जूते पहने हैं या नहीं या फिर वही उधड़े ........ श्‍यामा का चित्त सजने संवरने में नहीं मोहन के जूतों में ही अटका पड़ा था। मानो उसे फेरे मोहन के साथ नहीं जूतों के जोड़ी के साथ लेने हों। श्‍यामा के सिर पर कोहनी तक आता घूंघट डाल दिया गया। जयमाला हुआ फिर जलपान हुआ। अंत में फेरे होने लगे। शादी का जोड़ा इतना भारी और जरदोजीयुक्त था कि उसमें से श्‍यामा मोहन के जूते भी झांक नहीं पा रही थी। फेरों के बाद कखना, अंगूठी, और छंद खेले गये। अब जूते चुराई की रस्म होने वाली थी। और श्‍यामा पसीने में नहा रही थी। उसके कानों में तेजी और लालो की भ्रामक आवाजें गूंजने लगी-  अरे जीजा तो आज ऊ उधड़े जूते लटकाये आये। कां जीजा जूता ना खरीद सको तो हमरी श्‍यामा कू कैसे राखोगे। '' मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। यह रस्म भी शांति और खुशी के साथ निपट गयी। रोने - धाेने और विदाई गीतों के विलाप के साथ श्‍यामा मोहन के साथ ससुराल आ गयी। ससुराल में मुंह दिखाई की रस्म चल रही थी। और बुजुर्ग, बच्चियां, क्या हम उम्र औरतें दुल्हन की सुंदरता कभी '' पूनम के चांद'' से करती तो कभी परियों से। मगर पूनम तो जानने को उत्सुक थी कि उसके मोहन ने उसकी भेजी गयी सौगात को स्वीकार किया या नहीं ? तभी एक रस्म के लिये मोहन की माताजी ने उसे आवाज लगाई - Óअरे मोहनवा आ दई देवतान कू ढ़ोक दई दे'' मोहन माताजी का आदेश सुन आने को तत्पर हुआ। भौजी ने कहा - अरे मोहन भैया जूता तो उतार दयो। मोहन ,श्‍यामा के बगल के कोने में ही जूते उतारने लगता है। श्‍यामा ने कनखियों से मोहन के जूतों को देखा तो उसका मन मयूर नाच उठा। मोहन ने उसके ही भेजे हुये जूते पहने हुये थे। प्रियतम के प्रति प्रेम का झरना उमड़ आया था श्‍यामा के मन में। अब इतनी औरतों के बीच में बैठी श्‍यामा अपने आपको अकेली और एक अलग ही लोक में महसूस करने लगी। जहां वो थी और उसका मोहन एक दूसरे को बाहों में थामें। भग्गो का अनुभव उसके कानों में मानो आकाशवाणी के किसी मनोरंजक कार्यक्रम की भांति प्रसारित हो रहा था। औरा श्‍यामा मानो भग्गो के एक एक शब्द को अपने मन में कानों में ही नहीं तन में भी प्रसारित होता पा रही थी। सभी मेहमान शाम होते - होते जाने लगे। श्‍यामा से क्या कहा जा रहा था, क्या करवाया जा रहा था जैसे उसके शरीर और आत्मा को कुछ इसका अहसास ही ना हो रहा था। वह तो सारी बतायी गयी रस्में जैसे यंत्रवत ही पूरी करती जा रही थी। और दिवाकर के घुमक्कड़ी स्वभाव ने अपने सप्त अश्‍व के घोड़ों को वापस दौड़ाकर उनको वह मौका दे ही दिया। मोहन और श्‍यामा को उनके कमरे में चुहलबाजी करते और मीठे व्यंग्य करते भौजी छोड़ ही आई। मोहन ने शर्माते हुये धीमे से कुण्डी लगाई। मोहन जब उसका हाथ अपने हाथ में ले प्रेम से पगी मीठी- मीठी जलेबी सी बात कर रहा था। तो श्‍यामा के तन - मन में रोमांच की ऐसी लहरें उठ रहीं थी जैसे पूर्णिमा की रात को यमुना मैया में उठतीं हैं।
      उसका हृदय खेत जोतने वाले टे्क्‍टर की तरह धड़धड़ धड़ाक उछलकूद कर रहा था। और उसके पूरे जिस्म को थर्रा रहा था। मानो सीने में से कूदकर निकल ही आयेगा। मोहन के मूक प्रणय अनुरोध पर श्‍यामा ने बिना किसी प्रतिकार के सहज समर्पण कर दिया। काया से परकाया प्रवेश की यह जीवोत्पत्ति प्रक्रिया में श्‍यामा को तनिक भी उलझन, झिझक और परेशानी नहीं थी। हो भी क्यूं उसके साथ उसका जन्म जन्मांतर का साथी उसका परमेश्‍वर उसका रखवाला उसका प्रियतम मोहन जो उसके साथ था। उसकी आंखें झुकती जा रही थीं और खुली तब जब उसने अपने आपको गांव के पंचों के बीच खड़ा पाया। उसके पिता को सूचना भिजवाके बुलवाया गया था। श्‍यामा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह अपने घूंघट के झीने परदे से बाहर का माहौल और मोहन के चेहरे के भाव भंगिमाओं से माजरा समझने का प्रयास करने लगी। इतनी देर में श्‍यामा के मां बापू पंचायत में उपस्थित हुये। श्‍यामा के मां बापू के चहरे पर हवाईयां उड़ती साफ नजर आ रहीं थीं। मानो पंचों के सामने नहीं वरन साक्षात यम के सामने पेशी की गई हो। पंचायत शुरू करने का समय हुआ। सरपंच बाबूलाल जो काफी वृद्ध थे। अपनी पगड़ी संभालते हुये उच्च स्वर में मोहन को आवाज लगाते हुये कहा - रे मोहन इव सगरा गाम जमा है गयो बोल काह कहनो चाह रयोह है ?''
      सबकी प्रश्‍नवाचक और कौतूहल भरी नजर कभी मोहन की तरफ तो कभी श्‍यामा के मां बापू की तरफ उठ रही थीं। आखिर जाये भी क्यों नहीं विवाह के दूसरे ही दिन पंचायत इकट्ठी होने का यह पहला और दुर्लभ मामला था। मोहन कुछ क्षण चुप्पी के बाद कहा - इ श्‍यामा कू मैं अपनी लुगाई ना मानू। जाते छुटकारा दिलवाओ मोकू इ मेरे घर में ना रह सकत।''
      सरपंच ने आवेश में कहा - बहुतई बड़ी बात तेने कही है रे छोरा, अब कारण अऊ बतावेगो। काह कियो है छोरी ने ?
मोहन - जाके चरित्त में खोट है काका। सरपंच - कोन्हू सबूत है थारे पास ?'' मोहन - एक नये जूता की जोड़ी पहनो। एक पुरानो अंतर मालूम चले के नाये ? पंचों को मोहन की बात सुन सांप सूंघ गया। सबकी गर्दन झुक गयी। कुछ गांव के लड़के एक दूसरे की तरफ देख मुस्कुराने लगे।
      श्‍यामा के मां बापू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी ने उनकी बेटी को बीच बाजार नंगा कर दिया हो। घूंघट में लिपटी श्‍यामा को मां बाप कांपते हाथों से अपने गमछे से ढ़कने लगे। और श्‍यामा जैसे उसके कानों में किसी ने गर्म शीशा उड़ेल दिया हो। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। जहन में उसके सिर्फ जूते की जोड़ी घूम रही थी।
पता - एफ - 659 कमला नगर,
बिजली घर के निकट
आगरा - 282 005 (उ.प्र.)
मोबाईल 09548509508,07599163711

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