इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

वारिस शाह की हीर

राखी वर्मा

            ऐतिहासिक निष्‍कर्षों पर खरी उतरने वाली प्रेम-कहानियाँ संवेदनशील हदय की ऐसी अमिट छाप होती है जिन्हें लोग सदियों तक याद रखते हैं। बात नारी की हो या पुरूष की, आत्मा की हो या परमात्मा की, अतीत की हो या वर्तमान की, कहानियाँ इनके बिना अधूरी ही रहती है। ऐसी ही कुछ कहानियाँ लैला - मजनू, शीरी - फरहाद, शशि - पुन्नू एवं हीर - रांझा की हैं जो आज भी जनमानस के हृदय में अपना स्थान बनाए हुए हैं। वारिस शाह की हीर ऐसी ही अद्वितीय प्रेम कहानी है।
            वारिस शाह का जन्म गुजराँवाला जिले में शेखू पुरे के समीप के गॉंव जंडियाला शेरखान में हुआ। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जंडियाला में ही हुई। इनके जन्म के साल की प्रामाणिकता नहीं है। वह 1704, 1722, 1730, 1735, 1738 ई. अनुमानित किया गया। दरबार वारिस शाह के बाहर की पत्थरशिला पर अरबी भाषा में इनका जन्म 1722 ई. तथा मृत्यु 1798 ई. में लिखी हुई मिली है। इन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कसूर आकर मौलाना हाफिज गुलाम मुर्तजा सेली और उनके शागिर्द बन गए। बाद में वे पाकपटन में बाबा फरीद की गद्दी पर बैठे। इन्हें आध्यात्मिक तथा दार्शनिक ज्ञान प्राप्त हुआ। एक आंतरिक साक्ष्य के अनुसार ही का किस्सा 1766 ई. में मुकम्मल हुआ। इस तिथि के बारे में वारिस शाह ने स्वयं लिखा है। सन ग्यारह सौ अस्सीया नबी हिजरत, लम्मे देस दे विचतियार होई। हीर-रांझाा की प्रेम कहानी पर प्रथम काव्य ग्रंथ रचने का श्रेय अकबर के समकालीन दामोदर कवि (1572) ई. को दिया जाता है। इसके बाद लगभग अगले 250 वर्षों में इस प्रेम कहानी पर मुकबल, वारिस शाह, गुरदास, हामिदशाह, हाशिम, फजलशाह, हजारासिंह इत्यादि ने लगभग तीस के करिब किस्से लिखे। इन सबमें सबसे अभूतपूर्व तथा अधिक प्रसिद्धि पाने वाले वारिस शाह ही रहे हैं।
           हीर-रांझा एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें वारिस शाह ने अपने समय के पंजाब तथा पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों का वर्णन प्रभाव-पूर्ण ढंग से किया है। हीर-रांझा के बिछड़़़ने और मरने के बाद भी आज तक यह कसक पंजाबियों के हृदय के तारों को उद्वेलित कर देती है। इनकी हीर के नाटकीय भाषा, अलंकार और अन्योक्ति की नवीनता काव्य को उत्कृष्ट कोटि की श्रेणी में रखती है। इश्क मजाजी (लौकिक प्रेम) से इश्क हकीकी (अलौकिक प्रेम) की व्याख्याँ मन का छू लेती है।
कहानी शुरू होती है धीदों के पिता के जमीन बांटने से। पिता तो मर गया किन्तु सबसे छोटे बेटे धीदों रांझा पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ा क्योंकि बड़े भाई ने लालच और रिश्वत से अन्य भाइयों को अपने तरफ कर धीदों को बंजर जमीन देना ही ठीक समझा।
'हजरत काजी ते पैंच सहाय सारे भाइयां जिमी नूं कछ पवाया ई
बढी दे के भुऐं दे बणे वारिस, बंजर जिमी रंझेरे नूं आया ई
(हीर-वारिस शाह, नामवर सिंह, पृष्ठ 17)
         यहाँ भाइयों का लालच और ईर्ष्या दिखाई देती है जो आज भी है। संयुक्त परिवार एकल परिवार में परिवर्तित होकर रिश्तों-नातों को तवज्जों देना भूल सा गया है। प्रेम लुप्त होता जा रहा है। वारिस शाह ने समाज को देखते हुए इस किस्से को काव्य में पिरोया। कनफटे नाथ-संप्रदाय में दीक्षित हो कर रांझा गाँव को छोड़कर बाँसुरी बजाते हुए ही के गाँव पहुँचा। वहाँ पर गाय-भैंस चराने का काम करने लगा। हीर उसकी बाँसुरी की आवाज पर मुग्ध हो गई। दोनों में प्रेम हो गया। प्रेम ज्यादा दिन टिक न सका क्योंकि हीर के ईर्ष्यालु चाचा कैदों ने हीर के माता-पिता को उसकी शादी के लिए तैयार किया। तक उन्होंने हीर का विवाह सैदा खेडें़ से मुकर्रर कर हीर-रांझे के प्रेम को नकार दिया। हीर की स्थिति ऐसी हुई जैसे आग की लपटों ने उसे जला दिया हो-
'लै बे रांझिया वाह मैं लाय थकी, मेरे बस की गल बेबस होई काजी मापियां भइयों बन टोरी, साडी तैंडडी दोसती भस होई घर रवेडियां दे नहीं बसणा मैं, साडी इन्हांनाल खडखस होई जहां जीवांगे मिलेंगे सब मेले हाल साल ता दोसती होई
(हीर-वारिस शाह, नामवर सिंह पृष्ठ - 68)
           दिन गुजरते गए और एक दिन ऐसा आया जब प्रेम फकीर रांझा हीर के ससुराल पहुँच गया। प्रेम का अंकुर दोनों के हृदय में फूट पडा और दोनों हीर के गाँव आए जहाँं माता-पिता ने उन्हें विवाह की अनुमति दी। परन्तु नियति को यह मंजूर नहीं था कि दोनों प्रेमी मिले। विवाह के दिन ही चाचा कैदों ने हीर के भोजन में जहर डाल दिया और उसकी मृत्यु हुई। धीदों रांझा पर यह सब देखकर ऐसा कहर टूटा कि उसने भी जहरीला लड्डू खाकर अपनी हीर के बगल में ही दम तोड़ दिया। दोनों के इस भयावह अंत ने सभी की रूह को कपाँ दिया।
           खुशियों भरी आशा दिखते-दिखते भी वारिस की हीर का अंत दुख भरा है। कहानी दुखांत है। पंजाबी समाज का ब्यौरा और ईर्ष्या के परिणाम के साथ-साथ नाथपंथियों के प्रभाव का भी चित्रण है। इस किस्से से पंजाब जुदाइयों का देश लगता है और शायद ही कोई धरा ऐसी होगी जिसने इतनी जुदाइयाँ देखी हों। यह प्रेम काव्य सूफी प्रेम दर्शन से प्रभावित है जिसे सूफी दार्शनिकता से समन्वित करके जीवन मूल्य के रूप में स्थापित किया। प्रेम और सौन्दर्य पाठक के मन पर एक ऐसी गहरी छाप छोड़ता है जिसमें प्रेम की मधुरता हृदय के तारों को छन छन करती अपूर्व आनन्द की तृप्ति कराती प्रतीत होती है। प्रकृति के स्वरूप को वारिस ने बडे प्रभावी ढंग से दिखाया है। हीर की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। लालच और ईर्ष्या का भाव जैसा हीर में दिखाया है कहीं न कहीं आज के रिश्ते-नातों में भी प्रत्यक्ष रूप में विद्यमान है। प्रेम भाव जिसकी कोई सीमा नहीं है, कोई भेद नहीं है। उसमें अमीरी-गरीबी, जातिगत भेदभाव पहले की तरह आज की पीढी को भी सामना करना पड़ रहा है।
पता 
पी.एच.डी. दिल्ली विश्वविद्यालय
निवास स्थान: आर जैड ई 171 न्यू रोशन पुरा
नजफगढ, नई दिल्ली 110043

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें