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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

प्रभा खेतान के नाम एक खत

डॉ. अर्चना रानी 

प्रभा!
       मैं सोचती ही रह गई और तुम चली भी गई। पर तुम्हारा व्यक्तित्व तुम्हारे कृत्तित्व के रूप में मेरे सामने है। जिसके माध्यम से मैं तुमसे संवाद स्थापित कर रही हूँ। साथ ही साहित्य की अध्येता होने के नाते मैं तुम्हारी छोटी बहन भी हूँ। और तुम्हारे प्रति मेरा यह ख़त बहनापे का प्रमाण है।
     प्रभा! स्वयं को इतनी ईमानदारी से बयान कर देना जोख़िमभरा और दुश्कर कार्य है। सिर्फ  हिन्दी में ही नहीं बल्कि प्रत्येक भाषा में ऐसी आत्मकथाओं को आना चाहिए। हिन्दी साहित्य में इसका बेहद अभाव है। महिलाओं को अपनी चुप्पी तोड़नी ही होगी। जब तक यह चुप्पी नहीं टूटेगी, हम कैसे सचेत कर पाएंगी आने वाली पीढ़ियों को। परम्परा से ही पुरुष, शोषण के भिन्न - भिन्न तरीके सीख लेता हैं - कुछ पढ़ कर, कुछ देख कर और स्त्री परम्परा से चले आ रहे शोषण को सहने के लिए स्वयं को तैयार करती रहती है। औरतें शोषण सहती रहती हैं -खामोशी के साथ और प्रतिरोध भी करती हैं तो बेहद निश्क्रिय। इसलिए जरूरी हो जाता है -'प्रभाओं का लिखना।'
      प्रभा! तुम अपने ही अन्तर्विरोधों से ग्रस्त रूढ़ भारतीय समाज की ऐसी पारम्परिक लड़की हो,जो अपनी मर्जी से जीना तो चाहती है,अपनी मर्जी से जीने के भ्रम में जीती भी है, पर वह इस सच्चाई को नज़रअंदाज कर देती है कि वह अब भी पुरुषसत्ता के हाथ की कठपुतली बनी हुई है। यह सत्ता उसे जैसा चाहती है वैसा नचा लेती है। अपने मनमुताबिक सत्ता उस पर सब कुछ थोपती जाती है और वह करने को मजबूर है। सत्ता अपना पक्ष मनवाने के लिए उसे डराती - धमकाती है और हाथ से सब कुछ निकलता देख प्यार से सहला भी देती हैै। (तुम्हें पता नहीे प्रभा कि दुनिया कितनी जोखमभरी है। लोग तुम्हारा सारा धन लूटपाट कर खा जाएँगे। मैं तुम्हारा हितैशी हूँ। मुझसे ज्यादा तुम्हें न किसी ने चाहा है और न चाहेगा।)
      एक उन्नीस - बीस वर्षीय अल्हड़ भावुक किशोरी! (प्यार दिमाग से नहीं दिल से किया जाता है।) जो अभी प्रतिबद्धता, चयन, चुनौती, विद्रोह जैसे शब्दों का अर्थ भी नहीं समझ पाई और व्यवहारिक जीवन में इनका प्रयोग करने बैठ गई। परिवार में उपेक्षित प्रभा, लापरवाह प्रभा,भोली प्रभा,मासूम प्रभा, पागल प्रभा। कुछ - कुछ ऐसी ही है -फंतासी / स्वप्न की दुनियां में जीने वाली प्रभा।
      प्रभा! विवाह व्यवस्था बुरी व्यवस्था है। इस रूप में कि माता - पिता बच्चों के जन्म से पहले या जन्म के बाद ही उनका विवाह तय कर देते हैं। विवाह व्यवस्था बुरी व्यवस्था है। इस रूप में कि वहाँ किसी की भी (विशेषकर लड़की) इच्छा - अनिच्छा के बारे में नहीं जाना जाता। विवाह व्यवस्था बुरी व्यवस्था है इस रूप में कि अग्नि के सात फेरे लेकर या किसी भी इष्टदेव को साक्षी मानकर एक - दूसरे के वरण के बाद भी वे एक दूसरे की इच्छा, महत्वकांक्षा व स्वतन्त्रता का सम्मान नहीं कर पाते। विवाह व्यवस्था मनुष्य द्वारा निर्मित है। अत: इसे तोड़ने का पूरा अधिकार मनुष्य को है। वह चाहे तो इसे न स्वीकारे। होता अक्सर यह है कि औरत विवाह व्यवस्था के भीतर और बाहर दोनों ही स्थितियों में पीसती है। दरअसल, स्त्री - पुरुष के साथ होने के लिए व्यवस्था नहीं आपसी समझदारी और प्रेम महत्वपूर्ण है। और प्रेम सिर्फ  यही नहीं है कि आप सारी दुनिया से लड़झगड़ कर, विद्रोह कर अपनी मर्जी से विवाह कर लो, या फिर 'लव इन रिलेशनशीप' में बँध जाओ। प्रेम का अर्थ विस्तार अनंत है। सम्बन्ध के संदर्भ में प्रेम का अर्थ मान सकते हैं - अपनी उपलब्ध दुनिया में किसी ऐसे स्त्री / पुरुष को खोज निकालना जो तुम्हारी तरह सोचता हो,जिसे पाकर तुम्हें लगे कि तुमनें वैचारिक व मानसिक स्तर पर खुद को पा लिया। मैं यहाँ वैचारिक स्तर पर विशेष बल दे रही हूँ। जहाँ स्त्री - पुरुष वैचारिक स्तर पर समान होंगे, वहाँ किसी तरह का छल - कपट न होगा। दोनों एक दूसरे का सम्मान करेंगे। एक दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे। ऐसे में यही आपसी समझदारी है कि वे एकनिष्ठ होंगे, प्रतिबद्ध होंगे और यदि नहीं रह पाएंगेे तो अलग हो जाएंगे - फिर चाहे वह विवाह व्यवस्था हो या 'लव इन रिलेशनशीप'। यही प्रेम है और यही यौन - मुक्ति। यौन - मुक्ति इस संदर्भ में कि औरत विचार न मिलने पर भी पुरुष के साथ बँधें रहने का दु:ख नहीं भोगेगी। उसे यह चिंता नहीं सताएगी कि तलाक लेने पर या घर छोड़ देने पर घर कैसे चलेगा? बच्चे कैसे जिएँगे? उनका भविष्य क्या होगा ? समाज क्या कहेगा? रिश्तेदार क्या कहेंगें? अथवा बच्चे क्या सोचेंगें? वह जिस पुरुष से जुड़ गई है, वही उसकी जिन्दगी का पहला और अंतिम पुरुष है। इस पितृसत्तात्मक मानसिकता से मुक्ति। (मुझे शादी नहीं करनी, मैं किसी पुरुष के बारे में सोच भी नहीं सकती) इस यौन - मुक्ति की भारतीय महिलाओं को बहुत जरूरत है।
      प्रभा! तुम 'रखैल' नहीं हो। तुम आर्थिक रूप से निर्भर हो। डॉ. सरार्फ  से पैसे नहीं लेती। पर डॉ. सरार्फ  'रखैल' अवश्य हैं क्योंकि वे तुम्हारे सारे पैसे ले लेते हैं। (व्यापार मैं कर रही थी मगर पैसे का कंट्रोल डॉक्टर साहब कर रहे थे। कहाँ कितना पैसा लगाना है। किसके पास कितना रूपया जाना है, इसके निर्णय वही लेते थे)
प्रभा! ऐसे 'लव इन रिलेशनशीप' का भी क्या औचित्य, जिसमें औरत विवाह व्यवस्था के समान ही ठगी - छली जाती है, जिसमें निर्णय लेने के सारे अधिकार पुरुष के पास सुरक्षित हैं? दोनों ही स्थितियाँ एक - सी हैं। सिर्फ  शोषण के तरीके व रूप बदले हैं। प्रभा! तुम्हारा किशोर मन सिमोन व सार्त्र के आदर्श तक पहुँचना चाहता है। तुम स्त्री मुक्ति की चकाचौंध से प्रभावित हो पर सिमोन के विचारों के पीछे की दृढ़ता को नहीं देख - समझ पाई हो। सिमोन आत्मनिर्भर है साथ ही स्वाभिमानी भी है। वह अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं करती। प्रभा! तुम आत्मनिर्भर तो हो पर स्वाभिमानी नहीं हो। (मुझे डॉक्टर साहब को छोड़ देना चाहिए लेकिन निर्णय की तमाम स्वतंत्रता के बावजू़द डॉक्टर साहब को छोड़ने के नाम से मैं कातर हो जाती हूँ।) प्रभा! सिमोन बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं बनना चाहती। ऐसा कर वह समाज के उस पारम्परिक ढ़ाँचे को तोड़ रही है ,जिसमें औरत विवाह के कुछेक सालों में ही अनेक बच्चों की माँ बन जाती है। और फिर उसका अपना व्यक्तिगत जीवन कुछ भी नहीं बचता। सिमोन का विद्रोह बहुत ईमानदार विद्रोह है। यह उसकी अपनी वैचारिक दृढ़ता से पनपता है। किन्तु प्रभा! तुम एक पढ़ी हुई, ओढ़ी हुई वैचारिकता को लादे हुए हो। प्रभा! माँ बनना कोई बुराई नहीं है, स्वतन्त्रता की जिम्मेदारियों से बचना बुराई है। तुम अपने ही अन्तर्विरोधों से ग्रस्त एक सामान्य लड़की रह जाती हो। (और मैनें सुना ...हम सेक्षन मेथड से एक सेकण्ड में सब कुछ खींच लेते हैं, बाद में ब्लीडिंग वगैरह कुछ नहीं होगी) सब कुछ जानते हुए भी तुम स्थिति से विद्रोह नहीं कर पातीं। जहाँ प्रेमी अपने सुख के लिए स्त्री देह का उपभोग करता हो और स्त्री समझते - बूझते हुए भी विद्रोह न कर पाए तो उसके आत्मनिर्भर होने का क्या औचित्य ? आखिर आत्मनिर्भर हुआ ही इसलिए जाता है ताकि अपने प्रति होने वाले शोषण से लड़ा जा सके और उसे समाप्त किया जा सके।
      सारा समाज कह रहा है कि मिस्टर सर्राफ  को प्रभा ने फंसा लिया है। प्रभा! समाज क्या है? इसी पुरुषसत्ता का ही तो हथियार है। समाज का निर्माण ही स्त्री और सम्पत्ति को नियंत्रित करने के लिए पुरुषसत्ता ने किया है। फिर पुरुषसत्ता द्वारा निर्मित यह समाज भी तो वही करेगा जो पुरुष चाहेगा। जबकि सच तो यह है प्रभा! कि तुम्हें एक डॉक्टर ने फंसा लिया है और तुम्हें प्यार व अपनत्व के नाम पर अपाहिज बना दिया है। डॉ. सर्राफ  को तुम्हारी देह की जरूरत है, तुम्हारे धन की जरूरत है किन्तु वे बेहद चतुराई के साथ इसे तुम्हारी जरूरत बना देते हैं। किसी पुरुष पर अपाहिज होने की हद तक निर्भर हो जाना सिमोन का नारा नहीं था। प्रभा! सिमोन तक क्या जाना ? महादेवी वर्मा को ही देख लेती तो स्त्री की आत्मनिर्भरता का ठेठ अर्थ पता चल जाता।
      प्रभा! तुम्हारे भीतर एक परम्परागत औरत मौजूद है। वह दुविधा में है, तनाव में है कि जिस पुरुष ने प्रेमातुर होकर उसके होंठों को चूमा, बाँहों मे भरा, उससे कैसे अलग हो जाए? किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचने का भी अपराध तुम्हारे भीतर की परम्परागत नारी स्वप्न में भी कैसे कर सकती है? सिमोन ने कहा था कि स्त्री जन्म से पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है। प्रभा! तुम भी स्त्री बना दी गई हो।
      प्रभा! पुरुष अड़ियल घोड़े को काबू में करने का सुख कहाँ छोड़ पाता है? तुम भी ऐसा ही अड़ियल घोड़ा हो जिसे डॉ. सर्राफ  ने काबू में कर लिया है। पर यदि यह उनकी विजय का प्रतीक है तो भय का भी। भय इसलिए कि कहीं तुम उनके छल का अंदेशा पा कर किसी अन्य पुरूष का चुनाव न कर लो। यदि उनकी पत्नी ऐसा चुनाव करेगी तो उसे कोर्ट तक घसीटने या प्रताड़ित करने का अधिकार डॉ. सर्राफ  के पास सामाजिक, कानूनी व व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित है। पर प्रभा! यदि तुम ऐसा चुनाव करती हो तो वे तुम्हें फिर नियंत्रित नहीं कर पाएंगे।
      प्रभा! तुम्हें डॉ. सर्राफ  द्वारा हर पल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। सरेआम सड़क पर उतारकर 'यहीं पड़ी रह'  कहकर चलते बनना और भूल जाना, शाम को आकर भूखी - प्यासी बैठी मूर्खा से माफी माँग लेना अथवा चुपचाप फोन कॉल सुनना, फिर पूछताछ करना, अपशब्द कहना और प्रभा! इस सबके प्रति तुम्हारा निश्क्रिय प्रतिरोध! क्या यही प्रेम है? क्या यही है प्रेम की पराकाष्ठा? प्रेम शोषण का नाम नहीं है। तुम्हें सिखा दिया गया है कि प्रेम में प्रतिदान नहीं होता। तुम समझ नहीं रही हो प्रभा! प्रेम में प्रतिदान का न होना पुरुषसत्ता द्वारा निर्मित वह हथियार है जिसका बार - बार प्रयोग करके वे तुम्हारा शोषण करते रहेंगे।
      दरअसल प्रभा! तुम्हारी समस्या प्रेम नहीं है, विवाह व्यवस्था भी नहीं है। तुम्हारी समस्या है यह बंद रूढ़िवादी समाज - जिसमें एक ओर स्त्री को संस्कारी घरेलू बनाकर उसके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पुरुषों की शोषणकारी मानसिक निर्मित कर जय जयकार की जाती है। प्रभा! तुम तो जानती हो मनुष्य का दिमाग बहुत जटिल है। इसे समझना टेढ़ी खीर है। थ्योरी पढ़कर सही ढंग से जीवन जिया जाए यह जरूरी नहीं। तुम स्वयं देखो। तुमने दर्शनशास्त्र में पीएच.डी.किया। स्त्रीवादी सैद्धांतिकी पर अच्छी पकड़ के बावजूद तुम इस पितृसत्तात्मक समाज के हाथ का खिलौना ही बनी रहीं। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था- 'कई सौ या हजार बरस में हिन्दू नर का दिमाग अपने हित को लेकर गैरबराबरी के आधार पर बहुत ज्यादा गठित हो चुका है। उस दिमाग को ठोकर मार मार कर बदलना है। तुम इतनी पढ़ी - लिखी, आर्थिक रूप से सबल महिला पितृसत्तात्मक समाज को यह ठोकर मारती तो हमें बल मिलता। बल तो अब भी मिलेगा पर अपनी पूर्वज द्वारा की गई गलती से प्राप्त सबक के रूप में। प्रभा! 'लव इन रिलेशनशीप' बुरा नहीं है पर उसमें अमृता - इमरोज सी प्रतिबद्धता तो चाहिए। तुमनें अमृता से पूछा था - 'आपको इमरोज मिल गए लेकिन वह स्त्री क्या करे जिसे इमरोज जैसा प्रेमी न मिला हो। छूटते ही उनका उत्त था - तो एक और इमरोज की तलाश करो।' तुम उनके शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाईं। प्रभा! तुम्हें कुछ याद आ रहा है-'स्त्री होना अपराध नहीं पर नारीत्व की आँसू भरी नियति स्वीकारना बहुत बड़ा अपराध है। अपनी नियति को बदल सको तो यह एकलव्य की गुरू दक्षिणा होगी।' दरअसल प्रभा! यह सिर्फ  तुम्हारी नियति नहीं है बल्कि हर औरत की नियति है और जानती हो इस नियति को स्वीकारने का अपराध हम सब करती आई हैं। प्रभा! बहुत कुछ कहा जा सकता है पर अब अपनी लेखनी को यहीं विराम देती हूँ। तुम्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि इन्हीं शब्दों के साथ - अगर फिर प्रेम करो तो किसी की चिकनी - चुपड़ी बातों में बहक मत जाना। अपने उपेक्षित होने को अपनी कमजोरी मानकर पुरुष के हाथ की कठपुतली बनकर मत रह जाना। प्रेम करना और जीना अपने ढंग से मगर अपनी शर्तो पर, किसी डॉ. सर्राफ  की शर्तों पर नहीं।
 पता 
सहायक प्रोफेसर हिन्दी विभाग
मोतीलाल नेहरू कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
मोबाइल- 09711082105

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