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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

गरमी के चारगोडिया

आनन्‍द तिवारी पौराणिक
(1)
अंगरा कस भुइंया धंधकत हे
सरर - सरर, लू चलत हे
सुरुज के बाढ़े तेवर
गली - मोहल्ला होगे सुन्ना, कलेचुप हे घर।
(2)
तन ले चूहय अब्बड़ पछीना
मन हे बियाकुल, गरमी के महीना
रहि रहि के, लागय पियास
रद्दा रेंगइया ल हे, छइंहा के आस
(3)
रेती के समन्दर, बनगे नदिया
सुक्खा होगे, कुआँ तरिया
गगरी धरे, भटकय पनिहारिन
सुन्ना परान अधर, पानी बिन
(4)
आलस के कविता, पियास के गीत
हरर - हरर, बड़ोंरा के संगीत
हवा म घुरगे हे, पछीना के गंध
अतलंग करय गरमी, पुरवाही हे बंद
(5)
गोधुली बेला संग संझा जभे आही
जुड़ हवा चलही, त जी ह जुड़ाही
दीया बाती होही, घर म जेवन चुरही, सबो खाहीं
थके परानी ल, निंदिया, लोरी गा के सुताही

श्रीराम टाकीज मार्ग
महासमुन्‍द( छ.ग.)

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