इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

फूलचंद गुप्‍ता की चार रचनाएं

फूलचंद गुप्‍ता 
(1)
सभी अपराध करने को यहाँ मिलती हिदायत हैं।
यहाँ पर न्याय बिकता है इसे कहते अदालत है।
मुझे फिक्र है केवल इन्हीं भोले परिदों की
वनों के जानवर तो अब शहर में भी सुरक्षित हैं
हितों की बात इतनी है कि हम उनके विरोधी हैं
वगरना हम नहीं रखते कभी कोई अदावत हैं
कभी अपराध की दुनियाँ हुआ करती सलामत थी
अभी अपराध की दुनियाँ सरे - संसद सलामत है
सियासत में मुहब्बत के लिए अवकाश हो न हो
मगर सब क्यों मुहब्बत में किया करते सियासत हैं
भरी कैसे रहेंगी राग की नदियाँ बयाबाँ में
जहाँ संबंध में केवल शिकायत ही शिकायत हैं
दिलों में हौल, आँखों में धुँवाँ, पैरों में कंपन
इन्हीं को इस व्यवस्था से मिली कहते इनायत हैं
मवेशी को मसीहा आप कह दें, कैसे कह दूँ मैं ?
कि लफ्ज़ों में फकत नफ़रत नज़र उगले हिकारत हैं
जमीं को एक - सा सिम्त करना मेरा मकसद है
मगर ढूहों ने समझा फूलचंद करते बगावत हैं।

(2)
यकीं हयात रहे, आओ दवा करें कोई
उठा के हाथ तहेदिल से दुआ करें कोई
हुई सदी कोई बच्चा यहाँ सोया नहीं
अमन सुकून के किस्से कहा करें कोई
तड़प - तड़प के हुआ मौन पलको जख्मी शहर
हरा - भरा है जख़म ठंडी हवा करें कोई
निकल गया वो कतरा के जुल्में दुनियाँ से
मुआफ़ कर दें उसे, या उसको सज़ा करें कोई
बयान हाले दुनियाँ का ये शायर बहुत हुआ
खुदा ले आएं नया, सजदा नया करें कोई

(3)
साँसे आती जाती हैं, कह सकता हूं जिन्दा तो हूँ
जीवन और मरण के घर, मैं झीना - सा पर्दा तो हूँ
जितना पाया उतना बाँटा सिफरों में मीजाने कुल
इंसानों के शक्ल भले, कुदरत तेरा सौदा तो हूंँ
चन्दा तन्हा, तारे तन्हा, रातें भी तन्हा - तन्हा
तन्हाई में सबके जैसा, पर कद्र में ऊँचा तो हूँ
मैं सड़कों में शोरोशर में गाता राग मुहब्बत के
सौदाई हो सकता हूँ, पर सच कहना, मैं सच्चा तो हूँ
मरघट - सी खामोशी फैली, सहरा - सा सन्नाटा है
तेरी सुनी चौखट पर, दीवानों - सा बैठा तो हूँ

(4)
अब बागुनाह हूँ, तो हम्माम हूँ
जब बेगुनाह था, सबने सजाएं दीं
जो पास में खड़े थे हंसते रहे फ़कत
जो दूर था नज़र से उसने दुआएं दीं
अरसा गुजर गया कुछ याद ही नहीं
किसने दिए ज़खम किसने दवाएं दीं
कुछ सिलसिले हुए फिर बात बन गई
कुछ ने पनाह दी, कुछ ने बलाएँ दीं
बस फर्क है जरा - सा रिवाज़ का
मैंने दिए जनम, तूने कजाएँ दीं

बी - 7, आनंद बेंगलेंस
गायत्री मंदिर रोड
बी/ एच, उमिया समाजवादी
महावीर नगर
हिम्मत नगर - 383001
एस.के. गुजरात (भारत)
मोबा. 09426379499

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