इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

महराज के बेटा

वीरेन्द्र ‘सरल‘

      एक गांव में महराज अउ महराजिन रहय। महराज गजब विद्वान मनखे रहय, तीर-तखार में ओखर जजमानी चलय। ओहा कथा-भागवत पढ़े के ले जउन दान-दक्षिणा मिले तउने में अपन गुजर-बसर कर लेवय। दूसर के चीज बर महराज कभु लाालच नइ करय। सब मनखे ला मिहनत के कमई खाय के अउ बने मिलजुल के रहे के पाठ पढ़ावय। तिही पाय के उखर गजब मान सम्मान रहय। महराज महराजिन के तीन झन बेटा घला रहय फेर तीन झन अपढ़ अउ निरबुद्धि रहय। जइसे-जइसे ओमन जवान होवत रहय महराज रातदिन उखरे संषों -फिकर में घुरत रहय।
      धीरे-धीरे समें निकलत गिस महराज अब निचट सियान होगे। आंखी दिखय नहीं, कान सुनावय नहीं। जांगर चलय नहीं तिही पाय के ओहा कथा भागवत घला नइ पढ़ सके। अब दान-दक्षिणा मिलना बंद होगे। गरीबी के सेती खाय-पिये बर दुख मिले लगिस। महराज अपन तीनो झन जवान बेटा मन ला गजलब समझावय फेर तीनो के तीनो निचट कोढ़िहा अउ अपढ़। दूबर बर दू असाढ़ अब महराज बपरा काय करे, ओला कुछु समझ में नइ आवय।
       एक दिन खिसिया के महराज ह अपन तीनों झन बेटा मन ला अपन तीर में बला के कहिस-‘‘ अरे! कुलबोरूक हो। तुमन ला थोड़को लाज षरम हे कि नहीं? काम-बुता बर तुहर गतर ह चले नहीं अउ रंग-रंग के खाय पिये के साध करथो। तुहरे असन मन बर सियान मन हाना कहे हावे कि खाय बर लरकू अउ कमाय बर टरकू। घर के गरीबी ह घला तुंहर आंखी में नइ दिखत होही। जब तक मोर जांगर चत रिहिस तब तक गुजर बसर ह कइसनो करके हो जावत रिहिस अब तो महू सियान होगे। चार अक्षर पढ़े रहितेव तो कहूं मेर कथा भागवत पढ़ के दान-दक्षिणा पातेव, तुम तो निचट निबुद्धि हो। आज तो तुमन कहूं करा ले चार पइसा कमाके लावव तभे घर के चूल्हा बरही । नहीं ते भूख पियास में सबके जीव छूठ जही।‘‘
      ददा के बात ला सुनके तीनो भाई ठाढ़ सुखागे । हक्का फूटे न बक्का। ओमन सोचे लगिन कहां ले कमा के लानन ददा। तीनो झन एक ठउर में सकलाके विचार करिन, हमर ददा ह इतवार के इतवार राजा के दरबार में जाके दक्षिणा मांग के लावय। आजो इतवार आय, चलो हमू मन राजा के दरबार में जाबो। अपन घर के दसा ला बताबो, राजा बने दयालू जीव आय। हमरी कुछु न कुछु मदद जरूर करही।
      तीनो भाई राजा के दरबार में जाय बर अपन घर ले निकलगे फेर रद्दा रेंगत ओमन सोचिन-राजा ह दान-दक्षिणा करही तब ओला आशीष देबर लागही हमन ला तो अशीष देय बर घला नइ आय काय अशीष देबो? कोन्हों अन्ते-तन्ते कहि पारबो तब राजा ह हमर मूर्खता ला जान डारही। तेखर ले इही मेरन बइठ के तीनो झन सुन्ता हो जथन।‘‘ फेर बड़े भाई किहिस-‘‘ अरे अभी ले संषो करबो तब तो बेरा इही मेरन पोहा जही। जब के बात तब बनत रही । सियान मन कहिथे के जइसे-जइसे पानी गिरथे तइसे-तइसे छाता ओढ़ना चाही अउ जे दिन के नाचा ते दिन के बाजा, समझगेव। अभी तो जल्दी से राजा के दरबार में चलव। ओमन तीनो झन आधू बढ़गे।
      रद्दा रेंगत बड़े भाई देखथे कि तरिया के पार में मछरी के ताक में एक ठन कोकड़ा ह चुप्पे मिटका के बइठे रहय। मनखे के आरो पाके ओहा कड़ाग-कड़ाग रेंगिस। बड़े भाई किहिस-मोला मंतर मिलगे। राजा ह मोला दक्षिणा दिही तब मैहा रेगे कड़ाग-कड़ाग कहिके आशीष देहूं।
      थोड़कुन अउ आघू बढ़िस तब मझला भाई देखथे के एक खेत के मेड़ ला एक ठन मुसवा ह बिला बनात रहय। मंझला भाइ्र के मुहूं ले निकलगे कि खोदे भुसाभुस, देखे मुलामुल। ओहा किहिस, अशीष देबर महुं ला मंतर मिलगे।
      ओमन  फेर आघू बढ़िन तब छोटे भाई देखथे कि एक पेड़ के ओघा में एक ठन कोलिहा ह सपट के बइठे रहय जउन ह तीन झन मनखे मन ला अपन कोती आवत देख के पल्ला भागिस। छोटे भाई कहि पारिस अब काबर भागथस लकर-धकर। ओहा इही ला अपन मंतर बना डारिस।
      अइसे किसम के तीनो झान ला अशीष देबर मंतर मिलगे। एखर काय मतलब होथे ओला ओ तीनो मूरख मन जानबे नइ करय फेर अपन -अपन मन में ठान लिन के राजा ह जब दक्षिणा दिही तब हमन अइसनेच अशीष देबो।
      फेर तीनो झन के मन में एक चिन्ता बने रिहिस कि राजा ह एक मतलब पूछही तब काय बताबो? तीनो झन सुनता होइन कि राजा ह पूछही तब हमन येला कागज में लिख के दे देबो अउ लिखके बता देबो कि आज हमर मौन व्रत हे हमन आज कुछु बोलबेे नइ करन। दक्षिण ला धरके के तुरते लहुट जाबो। बाद में राजा ह एखर मतलब ला सोचत रही हमन ला काय करना हे। ओमन अइसने सुनता होके राा के दरबार में पहुंचगिन।
राजा ह अपन दरबार में तीनो झन महराज मन ला देख के गजब खुष होइस ,उखर बढ़िया स्वागत सत्कार कसि, सियनहा महराज के हाल चाल पूछिस अउ अड़बड़ अकन दान दक्षिण दे दिस। महराज के तीनो बेटा मन अपन-अपन गढ़े मंतर ला कागज में लिख के राजा ला थमा दिन। वतका बेरा तो राजा ह कुछु नइ किहिस अउ ओमन दरबार ले बिदा करके अपन काम काज में लगगे।
      राजा ह रतिहा के बेरा बने फरसुदहा में महराज के बेटा मन के लिखे अशीष ला पढ़े लगिस फेर ओमन लिखाय मंतर ह राजा ला कुछु समझ में नइ आवय । राजा घेरी बेरी ओला पढ़े अउ ओखर मतलब समझे के उदिम करे। अइसने-अइसने अधरतिहा होगे।
      उहीच बेरा राजा के घर में तीन झन चोर मन सेंधमारी करत रहय। तीनो झन मिलके राजा के कुरिया के दीवार ला संध बनात रहय। राजा ह कागज के मंतर ला जोर से पढ़िस जेमा लिखाय रहय, रेंगे कड़ाग-कड़ाग। येला सुनके एक झन बने ऊंचपुर चोर ह डर्रागे। ओहा समझिस राजा ह जान डारिस तइसे लागथे । मोरे गोड़ ह लाम-लाम हावे। फेर दूसर चोर ह आध डर आध बल करके येती ओती ला देखत दीवार ला खोदे में लगे रहय। अब राजा ह दूसर मंतर ल पढ़िस ‘खोदे भुसाभुस देखे मुला मुल‘ येला सुनके दूसर चोर के पोटा कांपगे। चोर मन समझिन राजा ह जान डारिस तइसे लागथे ददा। कहूं राजा ह गोहार पारही तहन ओखर सैनिक मन हमन ला पकड़ के काली राजदरबार में लेगही अउ राजा ह हमन ला फांसी के सजा दे दिही । इहां ले भागना ही ठीक हे। ओमन उहां ले भागे के तियारी करिन। तभे राजा ह तीसर मंतर ला पढ़िस अब काबर भागथस लकर-धकर‘। तीनो चोर मन उहां ले जीव पराण दे के भागिन। राजा के नींद घला पड़गे अउ धीरे-धीरके रतिहा पोहागे।
      बिहान दिन राजा के घर चोर मन संधमारी करे हे कहिके हल्ला मातगे। चारो कोती देखो-देखे होगे। सिपाही मन चोर ला खोजे के उदिम करत रहिन।
      येती राजा के दरबार लगे हे तभे मंझनिया बेरा तीनो झन चोर मन डरेच के मारे राज महल में  आत्म समर्पण करे बर पहुंचगे अउ अपराध ला कबूल करत हिहिन-‘‘ राजा साहेब! सिरतोन म आप मन त्रिकालदर्शी आव। अधरतिहा के बेरा घला अपमन हमर मन के करनी ला बिना देखे जान डारेव। हमन अपन अपन अपराध के सजा पाय बर आपके दरबार में आय हन अब आप जउन सजा दंहू ओहा हमन ला स्वीकार हे।
चोर मन के गोठ ला सुनके राजा के दिमाग घुमगे। ओहा मने मन गुणिस -अरे! मैहा तो कुछु नइ जानव फर येमन काय बात ला गोठियाथे। उदुप ले ओला सुरता आगे कि रतिहा नी दनइ आवत रिहस तब महराज के बेटा मन के लिखे मंतर ला पढ़के ओखर अरथ समझे के उदिम करत रहेंव, ये चोर मन उही ला सुनके डर के मारे भागे हे तइसे लागथे। राजा ह मने मन हांसिस अउ ओ चोर मन ला जेल खाना में बंद करवा दिस।
      अब राजा ह तुरते महराज के तीनो झन बेटा मन ला बलवाय बर अपन करमचारी मन ला उखर घर भेजिन। राजा के बुलावा ला सुनके महराज के बेटा मन जीव धुकधकागे। उहू मन डर्रात रहय कि दक्षिणा के लालच में हमन जउन मन में अइस तउने आषिर्वाद आय कहिके कागज में लिख के दे पारे हन। लगथे राजा ला हमर मूर्खता के जानबा होगे। अब ओहा बला के कहि हमन ला सजा झन सुना दे। फेर काय करबे राजा के डर धुन बबा के डर ओमन ला राज दरबार में जाना पड़िस।
      ओमन राज दरबार में पहुंचिन तब राजा ह ओमन ला बने ऊँच पीढ़ा में बइठार के उखर गजब मान-सन्मान कसि अउ अड़बड़ अकन दान-दक्षिणा घला दिस। महराज के तीनो झन बेटा मन एक-दूसर ला बेक बोक देखत रहय। राजा काय बर उखर सन्मान करत हे येहा ओमन ला समझ में आबे नइ करत रहय।
अब ओमन दक्षिणा ला धरके राजदरबार ले निकलगे। अउ बइहा भुतहा कस कट्ठल-कट्ठल के हाँसे लगिन। एक झन किहिसइही हरे रे करम के नांगर ला भूत जोते अउ अल्लाह मेहरबान तब गदहा पहलवान ,समझगेव?
पता
बोड़रा ( मगरलोड )
पोष्‍ट-  भोथीडीह, व्‍हाया - मगरलोड
जिला - धमतरी ( छग )

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