इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

गुरुवार, 14 मई 2015

'' माई कोठी के धान '' लेखक की समीक्षा पर विनम्र प्रतिक्रिया

'' माई कोठी के धान '' लेखक की समीक्षा पर विनम्र प्रतिक्रिया
डॉ. जीवन यदु
     मैं पहले ही यह स्पष्ट कर दूँ कि समीक्षा पर यह विनम्र प्रतिक्रिया समीक्षा की समीक्षा नहीं है अपितु समीक्षक की कुछ स्थापनाओं और उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों के उत्तर मात्र हैं। जब कोई पुस्तक प्रकाशित होती है तो वह सम्बंधित विषय की न तो अंतिम पुस्तक होती है और न लेखक की ही अंतिम पुस्तक। किन्तु प्रकाशित पुस्तक पर सवाल उठाया जाना ही चाहिए और उस पर चर्चा भी होनी चाहिए ताकि नया ज्ञानोदय संभव हो सके। समीक्षक श्री हीरालाल अग्रवाल मेरे आदरणीय अग्रज हैं और खैरागढ़ के वरिष्ठ रचनाकार भी। उनकी समीक्षा पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मूल समस्या लोक की परिभाषा को लेकर है। अत: थोड़ी सी चर्चा लोक के इतिहास और उसकी परिभाषा पर करना ठीक होगा। यूँ तो लोक और वेद की चर्चा हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में भी हुई है किन्तु आज हम जिसे पारिभाषिक शब्दों में लोक कहते हैं उसकी शुरुआत विदेशी विद्वानों द्वारा लोक ज्ञानों के सग्रहण के बाद से हुई है। हमारे देश के अनेक लोक विज्ञों ने लोक ज्ञानों का संग्रहण प्रारम्भ किया। उनमे सबसे पहले पंडित रामनरेश त्रिपाठी का नाम लिया जाता है। विदेशी विद्वानों ने लोक ज्ञानों के संग्रहण से नए ज्ञानोदय की सम्भावना की थी।वही ज्ञान पिपासा भारतीय लोक विज्ञों में भी देखी गयी थी। पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने लोकगीतों का संग्रह प्रस्तुत किया और उसे ग्रामगीत कहा। ग्रामगीत के कारण ग्राम की संस्कृति को ग्राम संस्कृति मान लिया गया। उस समय के बहुत से विद्वानों ने इसे संस्कृति की अपूर्ण परिभाषा माना क्योंकि ग्राम से जुड़ा हुआ व्यवसाय कृषि है और कृषि भूमि का निरंतर पारिवारिक बंटवारा होता जा रहा था। इससे भूमि मालिक कृषि मजदूर में बदल रहे थे। वे कृषि मजदूर जीवकोपार्जन की तलाश में शहरों और नगरों में बसने लगे। औद्योगिक क्रांति से ग्रामीण मजदूर भी जिनका कि घरेलू उद्योग मशीनीकरण के कारण टूटता जा रहा था,वे सभी शहरों और नगरों की ओर उन्मुख हुए। वे सभी अपने साथ अपनी संस्कृति भी ले गए और वह संस्कृति शहर - नगर में भी फलने - फूलने लगी। अत: उनकी संस्कृति को ग्राम संस्कृति शब्द पूर्णता प्रदान नहीं कर रहा था। तब अनेक विद्वानों ने उस संस्कृति को प्राचीन परंपरा के अनुसार लोकेच् वेदेच् लोक संस्कृति कहा। अनेक परिभाषाओं से जो बात छनकर निकलती है उसे बहुत ही सार्थक शब्दों में डॉ. हजारी प्रसाद द्धिवेदी ने '' जनपद '' के प्रथम वर्ष के प्रथम अंक में लिखा है -'' लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है,बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं,ये लोग नगर में परिष्कृत रूचि संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रूचि संपन्न वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं,उनको उत्पन्न करते हैं।'' इन बातों का अर्थ यही निकलता है कि लोक शहरों - नगरों तक फैला है और उनके ज्ञान का आधार जगत व्यवहार  है, कोई पोथी नहीं। दो संस्कृतियों के बीच यह पोथी शब्द ही एक मोटी रेखा खींचता है जिसे भक्तिकाल के कवियों ने और यदि और ऊपर जाएँ तो संस्कृत के ग्रंथकारों ने वेद कहा है। इस तरह वेदाधारित और लोकाधारित समाज पूर्वकाल से दृश्य में रहे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इन दोनों संस्कृतियों के बीच '' आदान - प्रदान '' का सम्बन्ध बनता रहा है और संस्कृति पुष्ट होती रही है मध्यकाल में दोनों संस्कृतियाँ काफी निकट आ गयी थी जो कि भक्तिकाल के कवियों के अध्ययन से पता चलता है। भक्तिकाल के कवियों ने दोनों को बराबर महत्व दिया है तुलसीदास ने '' लोकहु वेद नाआन उपाऊ '' कहा तो सूरदास ने लोक वेद श्रुति ग्रन्थ रहित सब कथा कहत विपरीत लिखा है।
     जिन लोगों  ने लोक को वेद के बरअक्स  खड़ा करने का षड़यंत्र रचा ऐसे ही लोगों ने लोक के परिभाषित होने के बाद वेदाधारी समाज को '' शिष्ट '' नाम दिया ताकि लोक को अशिष्ट समाज भी कहा जा सके। किन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी संस्कृति शिष्ट या अशिष्ट नहीं होती। इसीलिए मैंने शिष्ट कहे जाने वाले समाज को वेदाधारित समाज कहा है। यह वेदाधारित  शब्द मुझे एक लम्बी परंपरा से प्राप्त है। इसकी चर्चा मैं ऊपर कर चुका हूँ। पूर्व के रचनाकारों और चिंतकों ने दो प्रकार के समाज के लिए दो ही शब्द दिए हैं .लोक और वेद।
     आदरणीय हीरालाल अग्रवाल की स्थापना में पोथी या वेद अनुपस्थित है। उन्होंने जो स्थापना की है वह किसी भी क्षेत्र की संस्कृति की परिभाषा हो सकती है किन्तु लोक संस्कृति की नहीं। यद्यपि उन्होंने लोक समाज को निकट से समझने  का प्रयास अपने आलेख में किया  है तथापि यह कहना उचित होगा कि जातियों के सरकारी विभाजन में लोक समाज को नहीं समझा जा सकता,क्योंकि आज की स्थिति में पिछड़ा वर्ग में ऐसी जातियाँ भी शामिल हो रही हैं,जो इतिहास के पिछले कालखंडों में शासन करते हुए वेदाधारित समाज में शामिल हो चुकी थीं। मराठा जाति ने न केवल महाराष्ट्र अपितु छत्तीसगढ़ पर शासन किया था किन्तु वह आज सरकारी वर्ग विभाजन में पिछड़ा वर्ग में आ चुकी है। वोट की राजनीति में कोई भी जाति किसी भी वर्ग में शामिल की जा सकती है। समीक्षा में जो सबसे अच्छी बात दिखाई दी वह यह कि बदलते हुए समय में लोक को पुन: परिभाषित करने की तड़प। यहाँ यह बताना आवश्यक हो जाता है कि अनेक लोकचिंतक विद्वानों ने लोक को पुन: परिभाषित करने की बात उठाई है और यह आज के समय में आवश्यक भी है, किन्तु अभी बहुत कुछ बदल जाने के बाद भी नए लोक के सारे लक्षण उभर कर सामने नहीं आये हैं। इसलिए जो लोक की पूर्वप्रचलित परिभाषा है, उसे ही मान देना होगा।

     अग्रवालजी की दूसरी स्थापना है कि संस्कृति का ह्रास कभी नहीं होता। वह सदैव विकासोन्मुखी होती है और उन्होंने संस्कृति को सतत प्रवाहिनी नदी की उपमा दी है। इस पर मेरा कहना है कि संस्कृति में समय के अनुसार परिवर्तन आता ही है किन्तु यह देखा जाना आवश्यक होता है कि उस परिवर्तन की दिशा क्या है। क्योंकि परिवर्तन भी सदैव लोक हितकारी नहीं होता। यदि हम अग्रवालजी की स्थापना से नदी की उपमा को लें तो नदी भी अपनी बाढ़ से परिवर्तन लाती है। जैसे अपने किनारों को उपजाऊ मिटटी प्रदान कर देती है,इससे विकास की सम्भावना बढ़ जाती है किन्तु यदि वही नदी अपने किनारे के ग्रामों नगरों को बाढ़ की चपेट में लेकर समुद्र में फेंक आये तो क्या इसे भी विकासोन्मुखी कहा जायेगा। बिलकुल इसी तरह संस्कृति की गति भी होती है। क्या आज की भारतीय संस्कृति को विकासोन्मुखी संस्कृति कह सकते हैं जिसमे बलात्कार और गर्भपात सामान्य सी बात हो रही है। मेरे कहने का तात्‍पर्य यह है कि संस्कृति के ह्रास और विकास को समय के परिवर्तन की दिशा ही तय करती है। क्योंकि परिवर्तन भी हमेशा सकारात्मक नहीं होता।आदरणीय अग्रवालजी ने अनेक संस्कृतियों की बात की है किन्तु एक संस्कृति आधुनिक समय में सबसे ज्यादा चर्चा में है,वह है '' लोकप्रिय संस्कृति'' इस लोकप्रिय संस्कृति पर अनेक पत्रिकाओं में आजकल आलेख छपते ही रहते हैं। यह लोकप्रिय संस्कृति बाज़ारवाद की देन है! बाज़ार को जो चीज़ लाभकर लगती है, उसे वह बेचने के लिए लोकप्रिय बनाता चलता है,चाहे वह किसी संस्कृति का कोई हिस्सा हो या स्थूल पदार्थ। समीक्षक महोदय ने प्रगतिशील लोगों को लताड़ते हुए ए. आर.रहमान द्वारा संगीतबद्ध छत्तीसगढ़ी गीत '' सास गारी देथे, ननद मुह लेथे'' को  यह कहते हुए सराहा है कि इससे छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बाहर के लोग जानेंगे। ए.आर. रहमान से पहले इस गीत को हबीब तनवीर ने अपने नाटकों के माध्यम से देशभर में फैलाया था। तब क्या उससे छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को लोगों ने नहीं समझा था। स्वर्गीय हबीब तनवीर ने उसे प्रस्तुत करते हुए उसकी मौलिकता की हत्या नहीं की थी,किन्तु ए. आर.रहमान ने इस गीत को उसके मूल से ही काट दिया। बाज़ार किसी चीज़ को लोकप्रिय बनाने लिए पहले उसे उसके मूल से काट देता है। यह लोक संस्कृति के क्षेत्र में लोकप्रिय संस्कृति का आक्रमण ही है। पिछले दिनों घर में जब चूसने वाला आम आया तब मेरे पोते ने उस पर पाइप लगाकर पीने की बात की। उसने कहा उसे पाइप से पीने वाला आम चाहिए, चूसने वाला नहीं। उसका तात्पर्य फ्रूटी से था। अर्थात बाज़ार चीज़ों के स्वाद को उसके मूल से काटकर परोसना चाहता है, यह भी लोकप्रिय संस्कृति के प्रचार माध्यमों का प्रभाव है। आम का स्वाद यहाँ अपने मूल रूप से कट गया है। मेरे एक मित्र शाकिर अली- बैंक कर्मी कवर्धा एवं रचनाकार ने एक घटना बताई कि जब वह पंजाब यात्रा कर रहे थे तब एक गवैये ने पंजाबी धुन में गीत गया, जिसे सुनकर पंजाब की संस्कृति की गंध मिल गयी किन्तु आधुनिक गायक बाज़ार की माँग पर पंजाबी गीत लेकर टी. व्ही. और फिल्मों में आ रहे हैं तो उनमे पंजाब की सुगंध ही नहीं मिलती, कारण वही लोकप्रिय संस्कृति ही है।
     यादव जाति के सम्बन्ध में डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र के वाक्य को उद्धृत करने पर न जाने क्यों  अग्रवालजी को आश्चर्य होता है। डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र न केवल रामचरितमानस मर्मज्ञ थे अपितु वे पुरातत्व और इतिहास में भी दखल रखते थे,यह बात छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक '' डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र '' से ज्ञात होती है, इसके अतिरिक्त भगवत शरण उपाध्यय लिखते हैं '' आभीर और गुर्जर काफी पहले भारत में प्रविष्ट हो गए थे संभवत: पहली सदी ईसा पूर्व के पहले '' पातंजलि और महाभारत में आभीरों का उल्लेख किया है,इन दोनों ने ही इनको शूद्रों की श्रेणी में रखा है। आभीरों को हजारी प्रसाद द्धिवेदी आधुनिक अहीरों के पूर्वज मानते हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में जो यादव जाति निवास करती है, वह कुछ वर्षों पहले अपनी जाति में अहीर ही लिखा करती थी। इसी शब्द से बाद में अहीरा और अहीरा से गहीरा शब्द की निष्पत्ति हुई इसे सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। कुछ लोग इस जाति को '' राउत '' भी कहते हैं। यह राउत शब्द पूर्व में जातिसूचक शब्द नहीं था अपितु उपाधिसूचक शब्द ही था। उपाधिसूचक शब्द कब जातिसूचक शब्द में बदल गया यह कह पाना अभी कठिन है। यह घटना केवल यादव अहीरों के साथ घटित नहीं हुई है अपितु राजपूतों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। विगत इतिहास के दौर में राजपूत शब्द सम्मानजनक उपाधि थी,जो अब जाति में रूपांतरित हो गयी है। आज अन्यान्य जातियों में पद और उपाधिसूचक शब्द मिलते है,उसका कारण यही है।आभीर यादवों का शासन महाराष्ट्र सौराष्ट्र में तो था ही वहां से टूटने पर कितनी जगहों पर बिखरे हैं यह भी इतिहास की खोज का विषय है। राउत का अर्थ राजा ही है। तुलसीदास जी ने रामचरिमानस में '' रउताही '' शब्द का प्रयोग किया है,याने सोलहवीं शताब्दी से पहले भी राउत शब्द प्रचलन में आ गया था। लोक की पौराणिकी के अंतर्गत लोकगाथाओं को रखा जाता है। पुराणों की रचना में लोकगाथाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यादव  राऊतों में जो लोकगाथाएँ पूर्व से प्रचलित हैं उनमें यादव राऊतों के शासक होने के प्रमाण मिलते हैं। यदि इन उदाहरणों के प्रकाश में मैंने डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र का उद्धरण दिया तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होनी चाहिए। जातियों का इतिहास के दौर में उत्थान - पतन होता रहा है।

     मैंने अपनी पुस्तिका में लोक पर इस्लाम के प्रभाव को रेखांकित किया है। मैं यह मानता हूँ कि इस्लाम धर्मावलम्बियों पर इस क्षेत्र के लोक का प्रभाव पड़ा होगा किन्तु यह कहना कि इस्लाम धर्मावलम्बियों पर लोक का ही प्रभाव पड़ा और लोक पर इस्लाम का प्रभाव नहीं पड़ा,उचित नहीं होगा।क्योकि संस्कृति के क्षेत्र में कोई भी प्रभाव एकपक्षीय नहीं होता। प्रभाव का क्षेत्र द्विपक्षीय  होता है। इस बात को विद्वानजन मानेंगे ही। दोनों संस्कृतियाँ आपस में कुछ लेती और कुछ देती हैं। यही संस्कृतियों की प्रकृति और गति है।
     मैंने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि वेदाधारित समाज में कन्या पक्ष के लोग वर के घर जाकर विवाह सम्बन्धी बात करते है,जिसे अग्रवाल जी ने अर्ध सत्य कहते हुए अपना उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस मामले में वे निश्चित ही सौभाग्यशाली हैं किन्तु क्या इस सौभाग्य का अवसर पूरे समाज को मिलता है। उनके साथ जो सुखद घटा,वह एक अपवाद है और अपवाद से कोई नियम नहीं बनता। आज इसी तरह का अपवाद लोक समाज में भी मिल जाता है।
     ''सटका'' शब्द कि उत्पत्ति और उसके विकास में कुछ शब्दों को रखकर एक सम्भावना ही व्यक्त की है और मैंने इसे भाषा वैज्ञानिकों के पाले में डाल दिया है। श्री अग्रवाल जी ने यह सही लिखा है कि जाति - जाति में कुछ नवाचार होते हैं, जैसे मैंने '' मड़वा सुतना '' नेगाचार का वर्णन नहीं किया है क्योंकि यह लोक की सभी जातियों में नहीं मिलता। मैंने उन्ही लोकाचारों को शब्दबद्ध  करने की कोशिश की है जो लगभग सभी जातियों में मिलते हैं।
     श्री अग्रवाल जी चाहते थे कि उस पुस्तिका में धर्म के अध्याय में राधा - स्वामी सम्प्रदाय का उल्लेख हो। राधा - स्वामी सम्प्रदाय पिछले दस - पन्द्रह वर्षों में ही प्रकाश में आया है,उस सम्प्रदाय का इस छत्तीसगढ़ में कोई पुराना इतिहास नहीं है,इसलिए मैंने उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा।होली पर्व पर मैंने एक किवदंती का ज़िक्र किया है। वह वास्तव में एक '' मिथ '' है। लोक समाज में '' मिथ मेकिंग '' चलती ही रहती है। लोक विज्ञों ने
'' मिथ मेकिंग '' को भी लोक समाज का एक गुण माना है। इस '' मिथ मेकिंग '' के ज़रिये वे अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं। वैसे भी हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी '' मिथ मेकिंग ''के उदहारण मिलते हैं। इस पर विश्वास करने और न करने के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है। जैसे होली जलाये जाने के सम्बन्ध में प्रहलाद और होलिका का मिथक है,जो चाहे इस पर विश्वास करे या न करे।एक बात और, पूरे आलेख में दो बार प्रगतिशीलों को या तो मशवरा दिया गया है या उनके विरुद्ध विचार प्रगट किया गया है। आश्चर्य तो यह है कि उन्हें परंपरावादी भी कहा गया है दो विरोधी ध्रुवों को कमेव करने की चेष्टा क्यों यह लोक लेखांकन में असंबंधित सा और खलने वाला लगता है। समीक्षक के  प्रथम बार के विचारों का लोक संस्कृति और लोकप्रिय संस्कृति के अंतर को स्पष्ट करते हुए मैंने खंडन किया है। दूसरी बार वे लोकचिंतन करते हुए अचानक प्रगतिशीलों को राय देते हैं कि उन्हें गोवध का विरोध करना चाहिए। काश वे कहते कि भूमिअधिग्रहण बिल का विरोध करें तो अधिक सामयिक बात होती। यदि भूमि अधिग्रहण से कृषि संस्कृति ही विनष्ट हो गयी तो लोक का स्वरुप ही खंडित हो जायेगा। वैसे भी इसमें प्रगतिशीलों को लपेटने का औचित्य ही समझ से परे है। यह अतिरिक्त आक्रामकता क्यों। अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि यह पुस्तक विश्लेषणपरक पुस्तक नहीं है और इसकी पृष्ठ संख्या की भी सीमा है। अत: सभी स्थानों में मैंने विस्तार में जाकर विश्लेषण नहीं किया है। मैं श्री हीरालाल अग्रवाल जी को ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने पुस्तिका पर लेखनी चलायी और उसे चर्चा के योग्य बनाया। इसे मैं उनका आशीर्वाद मानता हूँ।

पता 
'' गीतिका'' 
दाउ चौरा,खैरागढ़ 
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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