इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

रविवार, 17 मई 2015

घरेलू.पति

राजा सिंह

    विशेष सोच रहा हैं। आने का सम्भावित समय निकल गया हैं।.........अब तो सात भी बज चुके हैं। शंका-कुशंका डेरा डालने लगी थीं।.........अणिमा अब तक निश्चय ही आ जाती हैं । फिर आज क्या हुआ ? अनहोनी की आशंका से वह ग्रस्त होता जा रहा है।......... एक नजर किटटू पर जाती है और फिर दूसरी नजर बेबी पर आकर ठहर जाती हैं।.......... अगले ही पल उसकी निगाह घड़ी की टिक-टिक पर स्थिर हो जाती और वहॉ से उसके कान टिक-टिक से इतर कुछ और सुनने को तत्पर होते हैं, शायद काल बेल की आवाज या दरवाजे की ठक-ठक।......ऐसा कुछ भी आभास नहीं होता है, निराश वापस कमरे पर आकर घूमने लगती है।........उसका मन किया उसे काल करी जाये, परन्तु ठिठक गया। अणिमा का रिसपांस ऐसे मामलों में काफी तल्ख होता है और उसकी काल करने कह भावना को ठेस लगेगी। उसकी काल अपना अर्थ खो देगी और परिवाद को जन्म देगी और उसकी चिंता परिहास बनकर रह जायेगी। आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा और वातावरण कलुषित हो जायेगा। इन्तजार करते है।
    इधर काफी दिनों से वह महसूस करता है कि अणिमा बात-बात पर झल्ला उठती है। उस पर उसकी जासूसी करने का आरोप मढ़ देती है, जब वह कुछ उससे पूॅंछ-तॉंछ करने लगता है। फिर भी उसे देर से आने का कारण पहले से बता देना चाहिए था। एक काल तो कर सकती थी। अब तो यह निश्चित हो गया है कि वह अपने आप कुछ नहीं बताती। उसे ही पूछॅंना पड़ता हैं। .......और उत्तर कटीलें प्राप्त होतें हैं। मगर आज वह पूॅंछ कर रहेगा, उसकी जिम्मेदारी बनती है।
    किट्टू स्कूल से आया था, उसे खिला-पिलाकर सुला दिया था। इस समय वह उठकर होमवर्क कर रहा है। उसने एक बार भी मम्मी के विषय में नहीं पूॅछा। वह समझदार हो गया है, मम्मी छै-साढ़े छै के बाद ही आयेगीं। विशेष ने उससे होमवर्क में हेल्प करने के बाबत पूॅंछा था, उसने कहा था जरूरत होगी तो बतायेगां। बेबी इस समय सो रही है। आज काफी तंग किया उसने । रो रही थी। शायद बेवजह या उसकी समझ से परे था उसका कारण। अणिमा को पता लग जाता था उसके रोने का कारण। खैर! थोड़ी देर बाद वह खुद चुप हो गई। उसने उसे दूध पिलाया। वह फिर सो गई, क्षुधा शान्त होने की वजह से या रोकर थकने की वजह से। उसने महसूस किया शायद उसे अपनी मम्मी की याद आ रही होगी। परन्तु वह तो था। अक्सर वही रहता है, कोई नई बात नहीं है। ........बच्चों का क्या किस बात पर मचल गये, क्या पता ? वह अभी तक अनुमान नहीं लगा पाता है।
    अणिमा और विशेष एक ही कोचिंग स्कूल में पढ़ाते थे। अणिमा अंग्रेजी और वह मैथ। एक दूसरे से अच्छी पहचान हुई, जो प्रेम पर पहुॅच गयी, जिसकी परिणिति शादी में हो गई । उन लोगों ने घर वालों के विरोध को दरकिनार कर दिया और अपनी अलग दुनिया बसा ली । दोनों खुश और संतुष्ट थे, अपनी पंसद को पाकर।
    उनकी जिन्दगी में परिवर्तन लेकर आया, केन्द्रीय विद्यालय संगठन की अध्यापकीय नियुक्ति का विज्ञापन । दोनों ने एक साथ जूनियर अध्यापक पद के लिए अप्लाई किया। जहॉं अणिमा जांब पाने में सफल रही, वही विशेष अपने एक्सीलेन्ट एकाडेमिक कैरियर न होने की वजह से असफल रहा। अणिमा को कानपुर सेन्ट्रल स्कूल, अर्मापुर में पोस्टिंग मिली। दोनों को अलग होना मंजूर नहीं था। दोनों ने मिल कर निर्णय किया कि गाजियाबाद से शिफ्ट कर के अब कानपुर रहा जायेगा और विशेष कानपुर के किसी प्राइवेट स्कूल या कोचिंग में जॉब कर लेगा। ऐसा ही हुआ।
    लाल बंगला के कोचिंग इन्स्टीट्यूट में उसे पढ़ाने का जॉंब मिल गया और फिर वहीं दो कमरे का एक पोर्शन रहने के लिए। केन्र्द्रीय विद्यालय अर्मापुर वहॉं से काफी दूर था। घर से अणिमा को वह बस स्टैंड, स्कूटर से छोड़कर आता और वहॉं से अणिमा बस द्वारा अर्मापुर स्टेट तक और स्कूल तक पैदल। स्कूल से पढ़ाकर लौट कर आते-आते साढ़े छै से सात बज जाते थे। घर का काम सहयोग भावना से चल रहा था और विशेष का प्रयास भी एक बेहतर नौकरी पाने की लालसा से जोर-शोर से चल रहा था, कि उनकी जिन्दगी में तीसरे का प्रवेश हो गया। किट्टू आ गया । उसके आते ही चिन्ताओं और उलझनों की आमद भी हो गई । जब तक अणिमा का प्रसव अवकाश चलता रहा स्थिति सामान्य रही। उसके बाद यक्ष प्रश्न सामने खड़ा हो गया, किट्टू की परिवरिश का। उस इलाकें में क्रैंच कोई नहीं था। अब दो में कोई एक ही नौंकरी कर सकता थां अणिमा की नौंकरी सरकारी और स्थायी थी और उसकी सैलरी भी विशेष से तीन गुना ज्यादा थीं । इसलिए विशेष को ही अपनी नौंकरी की तिलांजलि देनी पड़ीं। उसने सोचा जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो जाता वह घर पर ही एक-दो-प्राइवेट ट्यूशन पढ़ा लिया करेगा और उसके बाद कोई रेगुलर जॉब पकड़ लेगा। इस बीच उसे एक अच्छी नौंकरी पाने के प्रयास को बल मिलेगा। क्योंकि अब उसके पास तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकेगा।
    मगर सोचा होता कहॉ है घर में दो ट्यूशनें थी। किट्टू था। घर की सम्पूर्ण व्यवस्था थी। अणिमा का सहययोग कम से कमतर होता गया। अणिमा की नौंकरी से आयी अतिरिक्त व्यवस्था व्यवधान दूर करने की जिममेदारी थी। उसके लिए नोट्स बनाना, प्रोजेक्ट वर्क तैयार करना और घर लायी कापियां जांचने में सहयोग, तथा अणिमा समय से स्कूल पहंॅुच जाये यह भी सुंनिश्चित करना था। उसके अपने लिए समय नहीं था। परन्तु खलिस का एक रेशा भी उसके पास नहीं था, क्यों कि वह प्रेम और हर्ष में था।
    किट्टू बड़ा हुआ। नर्सरी में यही एडमीशन दिलवाया गया, क्योंकि केन्द्रीय विद्यालय में नर्सरी की कक्षायें सुबह लगती थी और अणिमा की क्लासेज 10 बजे से प्रारम्भ होती थी। इसलिए मॉ-बेटे स्कूल भी साथ नहीं जा सके। अब किटृटू को स्कूल भेजने और वापस लाने की जिममेदारी भी आ गईं घर के काम काज के लिए कामवाली रखी गई। वह अपने को फ्री नहीं कर पा रहा था किसी भी बाहरी जॉब के लिएं। किसी तरह कामवाली की सहायता से एडजस्ट हो रहा था। उसने पार्ट-टाइम जॉब करने की कोशिश की 7 बजे से 10 बजे रात में। परन्तु चल नहीं पा रहा था, लड़खड़ा रहा थां। इसी बीच बेबी आ गई। एक आया भी रखी गईं सब आया और कामवाली के भरोसे चलने लगा या घिसटने लगा या खींचा जाने लगा। उन दोंनों में कुछ नहीं बचा। रह गई तो खीज हताशा और अस्त व्यस्त होती जिंदगी में तनाव।
    विशेष सोच रहा था इस समय हम दोंनों नौंकरी करेंगे तो कैसे सुखमय रह पायेंगे? हमारे पीछे बच्चों को कितनी परेशानी होगी । आया व नौंकरों का कोई भरोसा नहीं कि वे कब आयेंगे, कब जायेंगे और समय पर आयेंगे भी या नहीं। फिर हम दोंनों की अनुपस्थिति में वे लोग किस तरह और किस ढंग से ट्रीट करेंगे, क्या पता ? हम अलग तनावग्रस्त रहेंगे और बच्चे अलग। बड़े होने तक वे सामान्य रह पायेंगे या नहीं। उसने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया, हम दोंनों में से किसी एक को ही नौंकरी करना चाहिए और दूसरा तब तक घर सम्हालेगा जब तक बच्चे बड़े न हो जायें। जाहिर था, विशेष को ही बैठना पड़ा। इसमें अजीब और असंगत जरूर लग रहा था, परन्तु अपने और अपने बच्चों के खातिर यह उचित ही लगा। आपाधापी भरी जिंदगी में उनका प्यार मर रहा था इसको बचाने के लिए उसे अपने पुरूष अहं को मारना पड़ा था।
    वह घरेलू पति था, परन्तु उसके अधिपत्य को कोई चुनौती नहीं थीं वह पूर्ववत घर का मालिक था और उसका डर तथा दबदबा कायम था। हर महीने की पहली तारीख को अणिमा की पूरी की पूरी सैलरी, उसके हाथ में होती थीं और वह उसे अपनी मन मर्जी से खर्च करता था। अणिमा भी अपना दैनिक खर्चा उससे मांग कर लेती थीं कहीं भी आने जाने पर उसका नियंत्रण था। स्कूल के अतिरिक्त अणिमा का उसके साथ ही आना-जाना सम्भव था। वह जो भी कुछ करता था वह सब अणिमा पर अहसान होता था, जो वह गाहे-बगाहे अहसास दिलाया करता था। कुल-मिलाकर उसका जलबा कायम था।
    अणिमा आई और सोफे पर निढाल होकर पसर गई। वह गुस्से और तनाव में था। उसे उसके ऊपर कोई सहानुभूति नहीं उभरी थी। .......वह देर से आने के कारण उस पर कुपित था। ..........कहीं मटक रही होगी? घर आने की जल्दी क्या है? घर में मरने के लिए पति तो बैठा ही है। ........उसकी सोच दूषित दिशा में चल रही थीं। बेबी रोयी। सोकर उठी थी। अणिमा तुरन्त हरकत में आई और भागकर बेबी को उठाया और पुचकार-सहला कर उसे चुप कराने में लग गयीं, अब वह वापस बेबी के साथ सोफे में धंस गयी। लगता है थकान गहरी हैं।
    विशेष ने अपनी डृयूटी कीं उसने नाश्ता और चाय लाकर उसके सामने टेबुल पर रख दिया और खुद किट्टू को पढ़ाने चल दिया। अब तक अणिमा भांप चुकी थी कि वह नाराज हैं और दिनों की तरह उसने हुलस कर स्वागत् नहीं किया था, न कुशल क्षेम पूछी थी। एक तरह से उसके आगमन को उपेक्षित किया था। उसने आने आप को रोमांसिकता में ढाला ''क्यों मुॅह क्यों फुला रखा है '' आवाज संयत, स्थिर और मुलायम थी। विशेष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने बेबी को वहीं सोफे पर बिठाया और लगभग दौड़ते हुये, उसे बांह से पकड़ा।
    ''नाराज हो?'' क्या हुआ ?  अबकी उसका स्वर मनौवल और मुस्कराहट युक्त था। वह पलटा और लगभग घूरते हुए बका।
    ''कहॉ मटक रही थीं? इतनी देर कैसे हुई? कुछ बताने की जरूरत है कि नहीं?'' प्रश्नों की बौछार और होती कि उसकी नजर उन आंखों पर टिक गई जहॉ निरीहता टपक रही थी। ........
    'अरे! डियर, बस का टायर फट गया था, उसको ठीक होने में समय लग गया। इस कारण देर हुई। इसमें नाराज होने वाली क्या बात थी?'
    ''बता नहीं सकती थीं? सोच सकती हो कि मेरी क्या हालत थी, जब तक तुम नहीं आई थीं।'' उसका स्वर मध्यम नहीं पड़ा था।
    ''मैंने कोशिश की थी, परन्तु नेटवर्क काम नहीे कर रहा था। आने पर आपने पूछा नहीं जिसकी उम्मीद मैं कर रही थी, अपने आप रोना आता नहीं।' कुछ देर वे वैसे ही खड़े रहे। एक दूसरे को तौलते हुए। अणिमा ने उसे लगभग खींचते हुए सोफे पर बैठाया और उसकी आंखों में प्यार डाल दिया। वह खिल पड़ा।
    अणिमा ने उसे सामान्य कर दिया था। परन्तु आंतरिक रूप से वह अशान्त हो गयी थी। उसे चिढ़ लगती थी, खीज उठती थी, उसके अकारण गुस्सा करने और नखरें दिखाने पर। परन्तु वह बेबस थीं। विशेष एक आवश्यकता बन गया था, उसकी उपेक्षा नहीं कर सकती थी।
    विशेष सहज भाव से घर की व्यवस्था में रम गया था, परन्तु अणिमा असहज हो गयी थीं। उसे कुछ ऐसा लगता था कि उसकी जिंदगी में कुछ अधूरापन हैं। उसे विशेष का घर में बैठना रास नहीं आ रहा था। हालांकि उसके घर में रहने से घर-परिवार सुव्यवस्थित रूप से चल रहा था उसे भी आराम था। उसे घर और बाहर दोनों मोर्चों पर नहीं खटना पड़ रहा था, जैसा कि अन्य कामकाजी महिलाओं को करना पड़ता हैं हालात संतोषजनक थे, शिकायतें नगण्य थीं, परन्तु वह प्रसन्न नहीं थी। कुछ खटक सा रहा था।.......उसने कभी नहीं चाहा था कि विशेष स्थायी रूप से घर बैठ जाये और घर वाली भूमिका अंगीकार कर ले। थोड़े समय के लिये तो ठीक था और अच्छा भी लगा कि उसका पति उसके लिए इतना सोचता है और करता है। .........किन्तु उसे मर्द पति की कामना थी उसे औरत पति नहीं चाहिए था। इस वजह से उसने उसे कई बार उकसाया और तनियांया भी, परन्तु विशेष में तो जंग लग चुकी थी। उसको कुछ भी असंगत और आपत्तिजनक नहीं लग रहा थां। इसमें उसका कहीं भी पुरूष अहं आड़े नहीं आ रहा था।
     प्रिंसिपल के घर पर उनके बच्चे की बर्थडे पार्टी थी। स्कूल का सारा स्टाफ था अपने परिवार सहित। परिचय के दौर में प्रिंसिपल साहब ने विशेष से पॅूछ लिया आप कौंन सी जॉब में हैं।
     मैं हाऊस जॉब में हॅू। विशेष ने बिना किसी संकोच के निरपेक्ष भाव से जबाब दिया। सब हंस उठे थे और वह झेंप गई थी।
    अरे! ये मजाक कर रहे हैं, साहब सहारा इंडिया में मैंनेजर हैं। उसने झूठ बोलकर बचाव किया और विशेष को ईशारों से रोका चुप रहने के लिए। किसी ने नोटिस नहीं किया। अणिमा कई बार पति की जॉब बदल चुकी थी।
    घर आकर विशेष ने उससे काफी झगड़ा किया अपनी जॉब को लेकर। वे दोनों रात भर लड़ते-झगड़ते रहे। वह उसके झूठ बोलने के कारण प्रताणित और अपमानित करता रहा और वह अपनी जग हंसाई रोकने की दलील देकर अपने झूंठ को उचित बताती रही। बहस जारी रही थी रात के अंतिम प्रहर तक।
    एक दिन उन दोनों की मुलाकात माल में वाइस प्रिंसिपल और उनके पति से हो गईं। उनसे गुफ्तगू के बीच में, वह ध्यान रखती रही कि पतिदेव के जॉब की चर्चा न छिड़ जाये। परन्तु घर द्वार की बात करते करते अचानक वाइस प्रिंसिपल साहिबा ने पॅूछ लिया आप टीचर्स क्वार्टर, क्यों नहीं एलाट करवां लेती? इतनी दूर से आप कालेज आती हैं पैसा समय और एनर्जी बेमतलब बरबाद करती हैं इतने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर कैसे मैनेज करती हैं? क्या प्रोबलेम है? कानपुर में तो आपका कोई निजी घर भी नहीं है। किराये में ही तो रहती हैं, यहॉ पर भी आप?
    असल में मेरे पति महोदय की सर्विस यहीं पास में है, इन्हें तकलीफ हो जायेगी। उसे कोई बहाना नहीं सूझा। विशेष अविश्वसनीय नजरों से उसे तक रहा था।
    'अरे ! अणिमा आप भी कमाल करती हो। लड़की होकर, तुम यहॉ से अर्मापुर आ सकती हो, ये पुरूष होकर अर्मापुर से यहॉ नहीं आ सकते। वाइस प्रिसिंपल साहिबा ने झिड़का था, जिसकी छींटें विशेष को गहरे अपमानित कर रही थी।
    मैडम, हम लोग जल्दी ही क्वाटर के लिए अप्लाई कर देंगे। वास्तव में हम लोगों को पता नहीं था के क्वाटर खाली हैं, विशेष ने उत्सुक्तता और तत्परता दिखाईं । उसे पता ही नहीं था कि टीचिंग स्टाफ के लिए कालेज परिसर में क्वाटर भी है न कभी अणिमा ने जिक्र किया था।
    उस दिन की मुलाकात ने उन दोनों के बीच बहस-मुहावसों, तर्क-वितर्क, रोष-गुस्सा और लड़ाइयों की अनवरत श्रंृखला को जन्म दे दिया था। विघालय के सरकारी क्वाटर में जाने से समय, धन, उर्जा की बचत थी और भी ढेर सारी सुविधायें थी, नहीं थी तो पति की नौंकरी के विषय में झूठ बोलने की सुविधा। अणिमा को वहॉ शिफट होने का ऐतराज सिर्फ इसी कारण से था, जबकि विशेष को जिम्मेदारियों से अत्याधिक छूट मिलने की सम्भावना और अणिमा पर स्कूल के समय भी निगरानी बेहतर ढंग से हो पायेगी इसकी सुविधा। इस कारण वह लालायित था। उसे अणिमा का विरोध बहुत ही नागवार और नाजायज लग रहा था। युद्ध कई दिनों तक जारी रहा था, वे भूखे-प्यासे लड़ते रहे। परन्तु, अन्तत: जीत विशेष की हुई और अणिमा को समर्पण करना पड़ा। क्योंकि विशेष ने घर छोड़ने की धमकी दे दी थी।
    ''सम्हालो, अपनी दुनियां, मैं तो चला। तुम्हें मेरे काम न करने पर ऐतराज है और अपमान लगता है। मेरा घर का काम करने पर लज्जा आती है। तो मैं नौंकरी करने जा रहा हूॅ वापस गाज़ियाबाद। पुराने कोचिंग कालेज में मुझे अब भी जॉब मिल जायेगी।'' विशेष के इस हथियार की काट उसके पास नहीं थी। कभी भी नहीं थी। पति के रूप में जो प्यार, संरक्षण और सुविधा उसे प्राप्त थी, उसके विछोह की कल्पना मात्र से ही वह कांप उठती थी।
    तय यह किया गया कि अगले शैक्षिक सत्र से विद्यालय के क्वाटर में शिफ्ट किया जायेगा । किट्टू का वर्ष भी बरबाद नहीं होगा और बेबी का भी नर्सरी में एडमीशन करा दिया जायेगा।......परन्तु विशेष का क्या करें? अणिमा उलझन, चिंता और परेशानी में निरन्तर थी। तनाव अपने चरम पर था । वह हताशा की गिरफ्त में थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि घर के काम-काज में रम गये, और देवता की तरह स्थापित हो गये विशेष को कौन सी नौकरी आभूषित करा दी जायें कि उनकी और अपनी प्रतिष्ठा धूल-धूसरित होने से बच जायें और उनके घर में रहने, बसे रहने को जस्टीफाई किया जा सकें।
    सर फटा जा रहा था। उसने दर्द की एक गोली निगली और पानी पीकर लेट गई । दर्द कम होने लगा तो उसने सोने की भरपूर कोशिश की परन्तु उसके पास नींद नहीं आ रही थी। अपना ध्यान हटाने को तत्पर वह 'वनिता' मैगज़ीन उठाकर उलट-पुलट कर देखने लगी। वह बेमन से देख रही थी, उसका पढ़़ने का कोई इरादा नहीं था। मुख्य पृष्ठ पलटते ही उसे लेखों, कहानियों और कविताओं की सूची थी और साथ में लेखकों के नाम। साधारणतया वह उस पृष्ठ को कभी नहीं देखती, परन्तु आज न जाने क्यों उसको उस पृष्ठ में दिलचस्पी हो रही थी।
    अचानक उसका मन उचाट हुआ और उसने मैगजीन परे कर दी और ऑंखें बन्द कर के लेट गई । बंद ऑंखों ने लेखकों की सूची उसके जेहन में डाल दी और फिर सहसा एक विचार कौंधा । वह विस्मित रह गई अपनी खोज पर। उसने विशेष के लिए एक ऐसा काम खोज लिया था, जो सम्मानीय प्रतिष्ठित और प्रसंशित होता है और जो घर बैठ कर किया सकता है। उसने विशेष को लेखक बनाने का संकल्प कर लिया था। उसका ध्यान अखबार में रोज प्रदर्शित विज्ञापन पर गया, जिसमें लिखा रहता था, 'घर बैठे आमदनी करें, लेखक बने.........वगैरह वगैरह.............सम्पर्क करें और पता-फोन नं. आदि.......आदि।' उसे यकीन था कि विशेष इस काम को कर लेगा और इन्कार नहीं करेगा।
    वह आशावान थी । सरदर्द गायब था। तनाव और हताशा गायब हो गई और वह बेफिक्र होकर नींद के आगोश में चली गई ।
                                                           द्वारा राजाराम सिंह
                                                         एम-1285 सेक्टर-आई
                                                       एल.डी.ए. कालोनी, कानपुर रोड,
                                                           लखनऊ-226012
                                               फोन-0522-2422326,मो0 9415200724

 

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