इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

रविवार, 17 मई 2015

अरमान ( पुरस्‍कृत कहानी )

मुकुन्‍द कौशल

आज का दिन किरन के लिये सर्वाधिक खुशी का दिन है। आज न केवल वह कम्प्यूटर इन्जीनियर बन गई है बल्कि उसे सन्तोषप्रद पैकेज के साथ जॉब भी मिल गया है। रविवार होने के कारण मम्मी - पापा दोनों आज घर पर ही है। यूं तो अक्सर सण्डे को भी पापा आधा दिन के लिये वर्कशॉप चले जाते हैं किन्तु आज कैसे जाते ? बेटी किरन जो आने वाली है।
          पूना से दुर्ग तक की लम्बी यात्रा के बावजूद, माता - पिता से मिलकर किरन की सारी थकान छू - मंतर हो गई थी। सर्वाधिक अंक प्राप्त  करके नगर का नाम रोशन करने वाली यशस्वी छात्रा किरन वर्मा के विषय में सूचना मिलते ही कुछ पत्रकार भी आ जुुटे। खटाखट कैमरों के फ्लैश चमके और साक्षात्घ्कार  आरम्भ हो गया। एक पत्रकार ने अंतिम प्रश्र किया - अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगी ?
- ऑफ कोर्स, अपने पापा मम्मी को ही ...।'' बोलते बोलते पल भर के लिये खामोश हो गई किरन ... सहसा आँखें डबडबा आई उसकी, फिर क्षण में ही स्वयं को संयत करते हुए उसने कहा - मेरे मम्मी - पापा डिसएबल है। किन्तु आप लोग उनसे मिलकर महसूस करेंगे कि एक्चुअली वे कितने एबल है।''
          पत्रकारों की उत्सुकता और बढ़ गई।
किरन ने पुकारा - मम्मी, पापा। आइये न..। भीतर से कमरे का पर्दा हटाते हुए एक हँसमुख व्यक्ति ने लँगड़ाते हुए कमरे में प्रवेश किया। साथ में थी एक सीधी - सादी सुशील महिला। आते ही उन्होंने सबको अभिवादन किया। स्थानाभाव के मद्देनजर दो युवा पत्रकारों ने उठकर उन्हें स्थान दिया।
वर्मा जी ने किरन से कहा - बेटा, इन्टर्व्यू तो हो चुका। अब सभी का मुँह मीठा नहीं कराओगी ?''
किरन मिठाई का पूरा डिब्बा उठा लाई।
        मिठाई खाते हुए पत्रकारों ने किरन को एक बार फिर बधाई दी साथ ही माता - पिता के साथ तस्वीर भी खींची। जाते - जाते एक पत्रकार ने वर्मा जी से निवेदन के अंदाज में कहा - कभी मैं आपको भी कष्ट दूंगा वर्माजी, आपका जीवन संघर्ष जानने की भी उत्कंठा है।''
उत्तर में वर्मा जी केवल मुस्करा दिये।
         समय पंखा लगाकर उड़ जाता है और यादों के रुप में अपने निशान छोड़ जाता है। नेपाली पहरेदार की सीटी और उसकी लाठी पटकने का स्वर कानों में पड़ा, तो निगाहें दीवाल घड़ी की ओर घूम गई। रात के बारह बज चुके थे किन्तु नींद नहीं थी धनुष की आँखों में। दुलारी और किरन थककर सो चुके थे। इतमिनान गहरी नींद में सोयी किरन बिटिया का सुंदर और सौम्य चेहरा देखकर धनुष को दुलारी का यौवन याद हो आया। टकटकी लगाये वह छत की ओर निहारने लगा। विगत एक -  एक कर सारी घटनाएँ याद आने लगी और स्मृतियों की फिसलपट्टी से फिसलते हुए वह जा पहुँचा बचपन की दहलीज पर ....।
         लगभग २५ वर्ष पहले की बात होगी, जब समोदा गाँव में स्थित श्यामजी भाई के सब्जी - बगीचे में काम कर रहे किसान मजदूर पुनीतराम वर्मा एवं उनकी पत्नी जगौती बाई का  तड़ित बिजली गिरने से देहान्त हो गया था। उस दम्पति का इकलौता पुत्र धनुष तब कक्षा ग्यारहवीं का विद्यार्थी था। मेहनत - मजदूरी कर के जीवन यापन करने वाले उसके माता - पिता उसे पढ़ा - लिखा कर आगे बढ़ाना चाहते थे। धनुष एक होनहार विद्यार्थी के रुप में जाना जाता था। छुटपन से ही पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे विगलांग सहायता कोष से एक ट्रायसिकल भी प्राप्त हो गई थी। यही ट्रायसिकल धनुष की कल्पनाओं में मानों पंख लगा देती थी, किन्तु माता - पिता के असमय देहान्त से वह भीतर ही भीतर टूट सा गया था। आगे की पढ़ाई जारी रख पाना अब उसके लिये सम्भव न था।
          गाँव - गाँव घूमकर महिलाओं को रंग - बिरंगी चूडिय़ाँ पहनाने वाली वृद्ध तुरकिन दाई रुखसाना बी का नाती कादर, आज गाँव आया हुआ था। पड़ोस में रहने वाले धनुष को उदास बैठे देख उससे रहा न गया। बोला - अगर वेल्डिंग का काम सीखेगा तो चल मेरे साथ।''
कहते है न, कि डूबते को तिनके का सहारा ?
          मरता क्या न करता .... धनुष चल पड़ा कादर के साथ शहर की ओर ...।
दुर्ग के कब्रस्तान के पास एक छोटे से टपरे में कादर की वेल्डिंग - वर्कशॉप थी। इसी में काम सीखने लगा धनुष। कब्रस्तान से लगी मिलपारा की लम्बी गली के अंतिम छोर की नज़ूली ज़मीन पर कामगारों ने अपने छोटे - बड़े कुंदरे बना रखे थे, इन्हीं में एक कुंदरा कादर मिस्त्री का भी था। जिसमें वह अपनी बीबी के साथ रहता था। बाजू में ही था एक  बड़ा सा झोपड़ा जो खासा चौड़ा और गहरा था अत: भदरी की पतली आड़ उठाकर उसमें एक अतिरिक्त खण्ड बना दिया गया था। भरी जवानी में अपने पति खो चुकी परेमिन बाई अपनी बेटी दुलारी के साथ इसी झोपड़ें में अपनी जिन्दगी गुजार रही थी। सुबह होते ही फलों का टोकरा सिर पर उठाए, वह निकल पड़ती शहर की कॉलोनियों की ओर। दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी दुलारी, तब खाना पकाकर स्घ्कूल  चली जाती। बस्ती के सारे लोग भी अपने - अपने काम में चले जाते। चहल - पहल सन्नाटे में बदल जाती।
धनुष के रहने के लिए कादर ने परेमिन बाई से जब उसका अतिरिक्त कमरा किराये पर माँगा, तो पूछ ही लिया परेमिन ने - का नांव हे बाबू ?''
- धनुष वर्मा .. ।'' कादर ने बताया।
          परेमिन बाई देशमुख को धनुष की दशा पर तो दया आ ही रही थी, नाम सुनकर मया भी  उमड़ आई। उसने सहर्ष हाँ कह दी।
           हर सुबह मुहल्ले भर में शोर सा उठने लगता।  मुर्गों की बाँग  और बकरे - बकरियों की मिमियाहट के साथ स्त्री - पुरुषों का समवेत स्वर मानों एक कोलाहल में तब्दील हो जाता। लोग प्लास्टिक की पानी बोतलें और डिब्बे ले - लेकर दिशा - मैदान के लिये सुलभ की ओर दौडऩे लगते। महिलायें बाल्टियाँ, बर्तन और कपड़ों के साथ सार्वजनिक नल के आस पास एकत्र हो जातीं। हिन्दू - मुसलमानों सहित अनेक भिन्न - भिन्न जातियों की इस संयुक्त बस्ती की एक मिली - जुली संस्कृति थी। जातिगत भेदभाव तो जैसे था ही नहीं। वैसे भी मजदूरों की तो बस एक  ही जाति होती है, श्रमिक जाति।
           समय गुजरते धनुष ने गैस वेल्डिंग के साथ - साथ इलेक्ट्रोवेल्डिंग में भी दक्षता प्राप्त कर ली थी। स्कूटर और मोटरसाइकलों आदि के कलपुर्जों की वेल्डिंग के अतिरिक्त, अब वह खिड़कियों की ग्रिल्स और छोटे बड़े गेट भी बनाने लगा था। बचपन से पोलियो ग्रस्त अपने बाएँ पैर को उसने लाचारी नहीं, चुनौती मान लिया था। भरपूर दमखम के साथ वह अपने हुनर में महारत हासिल करता चला जा रहा था। कादर की वर्कशॉप अब वही सम्हालता। काम का दबाव इतना था कि कभी - कभी तो रात के ९- १० बज जाते।
          कादर आज अपनी बीबी के साथ बकरीद का त्यौहार मनाने समोदा गया हुआ था। वर्कशॉप इन त्यौहारों पर अक्सर बंद रहा करती सो उस दिन भी थी। परेमिन बाई फल बेचने जा चुकी थी और छुट्टी होने के कारण दुलारी भी स्कूल नहीं गई थी। खाना पकाते - पकाते धनुष की एक आहट पाने के लिये न जाने क्यों वह उत्सुक हुई जा रही थी। वह बगल के कुरिया में झाँक आई, सहसा नल की तरफ से धनुष को नहाकर लौटते देखा तो मुँह से निकल ही पड़ा - चाय पियोगे ?''
          गीले कपड़े सुखाते हुए धनुष ने आश्चर्य से पूछा - सिर्फ चाय ? अरे,कल रात से कुछ नहीं खाया। पेट में उथल - पुथल मची है। खाली चाय क्या होगा ?''
          दुलारी को उसकी यह बेतकल्लुफी अच्छी लगी। बोली - भात चुरने में अभी देर लगेगी। बाहर से कुछ ला देती हूं।''
          धनुष ने उसे पचास रुपये पकड़ा दिये। पास की दुकान से दुलारी मिक्सचर का पैकेट, ब्रेड और बिस्केट्स ले आई। थाली में रखकर धनुष के आगे खिसका दिया और चाय चढ़ाने के लिये गंजी माँजने लगी।
          साल भर बीत चुका था यहाँ रहते, लेकिन इतने दिनों में पहली बार धनुष, परेमिन बाई की अनुपस्थिति में आज उसके घर पर दुलारी के साथ बैठा था। बिस्कुट का पैकेट खोलकर वह शुरु तो ही हो गया। उसने देखा कि चाय चढ़ाने, चाय की गंजी उतारते, चाय को छानकर कप में डालते और कप को धनुष की ओर बढ़ाते समय दुलारी ने सिर्फ दाहिने हाथ ही उपयोग किया। बाएँ हाथ का पंजा उसने ओढऩी से ढँक रखा था। धनुष का ध्यान आज से पहले कभी इस ओर नहीं गया। अभी वह सोच ही रहा था कि उसकी जिज्ञासा दुलारी ने शांत कर दी। बोली - मेरा बायाँ हाथ पोलियो वाला है। कलाई तक तो ठीक है पर उँगलियाँ काम नहीं करतीं।''
          फिर मुस्कुरा कर बात पूरी की - लेकिन मैं एक हाथ से सारा काम कर लेती हूं।''
- तुम क्यों नहीं ले रही ? लो, तुम भी लो ...। धनुष ने खाने का आग्रह किया।''
- नहीं, मैं चाय भर पियुंगी। आप खाओ ... रात को क्यों नहीं खाए ?''
- कादर भाई के यहाँ मटन जो बना था ...।''
- तो .....।''.
- अँहँ मैं नहीं खाता। हम लोग शाकाहारी है।''
- हम लोग भी''
          कुछ देर चुप्पी रही। केवल चाय की चुस्कियॉ  रह - रह कर सन्नाटे को तोड़तीं।
बात का अगला सिरा दुलारी ने ही पकड़ा - मेरे बाबू ( पिता ) ड्रायवर थे। उनके बीतने के बाद हम बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। बगल वाली शांति काकी  पहले से फल बेचने का काम कर रही थी। उसी ने माँ को समझाया - सिखाया। उन्हीं के साथ माँ भी यही धंधा करने लगी। तब मैं छोटी थी, पर अब मुझे अच्छा नहीं लगता। माँ बेचारी दिन - दिन भर अकेली खटती रही है ...।'' बोलते - बोलते उदास हो उठी दुलारी। विषाद की रेखाओं ने उसके सुन्दर चेहरे पर व्याकुलता अंकित कर दी।
उस दिन के बाद धनुष और दुलारी के बीच, मानो एक नई दर्द का रिश्ता कायम हो गया। दोनों में निरन्तर संवाद होने लगा। परेमिन बाई के समक्ष भी और उसकी अनुपस्थिति में भी। दुलारी की माँ को जब पता चला कि  धनुष शाकाहारी है, तो उसने उसे विन्रमता पूर्वक अपने ही घर पर खाने के लिए राजी कर लिया। परेमिन बाई के परिवार के साथ निकटता में, कादर भाई को भी धनुष का हित नजर आया।
         चाय - नास्ता और भोजन आदि के एवज में धनुष पर्याप्त धन राशि परेमिन बाई को दे दिया करता। अधिक दौड़धूप न करनी पड़े इसलिये परेमिन अब जिला कचहरी के सामने फलों का ठेला लगाने लगी थी। यह ठेला उसे धनुष ने ही खरीद कर दिया था।
         एक दिन अखबार में नि:शक्तजनों के लिए स्वरोजगार हेतु ऋण उपलब्ध होने की योजना के विषय में पढ़कर धनुष ने भी प्रयास आरंभ कर दिया। प्रमाण पत्रों के साथ बैंक में आवेदन देने की प्रक्रिया  सहित दौड़ धूप तो बहुत करनी पड़ी किन्तु ऋण स्वीकृत हो गया। नगर पालिक निगम की ओर से उसे एक गुमटी भी आबंटित हो गई। गुमटी के आस - पास के स्थान पर बॉस गड़ाकर ताल पत्री की छाँव में उसने दो सहायको के साथ नई वर्कशॉप आरम्भ की। इस नये प्रयास में गैस वेल्डिंग का काम तो चल निकला किन्तु विद्युत कनेक्शन न होने के कारण इलेक्ट्रोवेल्डिंग का मशीन बन्द पड़ा था।
          परेमिन बाई धनुष को पुत्र की तरह चाहने लगी थी। उसे पता चला तो बोली - आदर्श नगर के एक साहब बिजली विभाग में है। उसकी बाई मुझसे रोज फल खरीदती थी। उससे मेरी अच्छी पहचान है। साहब भी बड़े दयालु हैं। मैं उनसे बात करके देखती हूं।''
         कहते हैं कि प्रेम और परिचय से बड़ी - बड़ी समस्याओं का भी हल निकल आता है। परेमिन ने साहब के सामने बात रखी और हफ्ते भर में ही मीटर भी लग गया। जीवन में जब अच्छा समय आता है तो कॉंटे भी महकने लगते हैं।
         उत्सवधर्मी नई खबरें इस बस्ती की महिलाओं के बीच रुचिकर चर्चा का विषय होती। परेमिन को भी जब पता चला कि नगर निगम, विकलांग जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित करने जा रही है तो रात की बियारी के बाद उसने धनुष से पूछ ही लिया - बाबू, तुमको मेरी दुलारी कैसी लगती है।''
           धनुष जिस बात को कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था वह इस तरह सहज हो जाएगी ऐसा तो उसने सोचा ही नहीं था। धनुष ने संयत स्वर में उत्तर दिया - काकी , सवाल यह नहीं है कि दुलारी मुझे कैसी लगती है। खास बात तो यह है कि मैं उसे कैसा लगता हूं ?''
दरवाजे के पास खड़ी दुलारी ने लजाकर मुस्कुराते हुए अपना सिर झुका लिया और दुपट्टे से अपना चेहरा छुपाकर भाग गई।
         फिर कैसे वह सामूहिक विवाह सम्पन्न हुआ .... कितने उपहार मिले, कब वे लोग उस झोपड़ी से निकलकर किराये के इस नये मकान में रहने चले आए ... कैसे उसने बड़ी वर्कशॉप डाली ... किस तरह किरन सी बेटी आ गई और कैसे उन्होंने उसे के.जी. वन की कक्षा में दाखिला दिलाया ... कितने बड़े आर्डर मिलते चले गए ... एक लम्बी कहानी ही तो है, लेकिन सब याद है उसे।
        शादी के बाद भी धनुष ने दुलारी से स्कूल  नहीं छुड़वाई थी। वह तो चाहता था कि उसकी शिक्षा जारी रहे पर उन्हीं दिनों दुलारी माँ बन गई। अपनी सारी ऊर्जा उसने घर सम्हालने और किरन की परवरिश में लगा दी। उसे अच्छी तरह याद है दुलारी ने एक दिन भावुक होकर उससे कहा था - हम आप भले ही आगे नहीं पढ़ सके, किन्तु अपनी किरन को हम खुब पढ़ाएंगे।''
           दूसरी संतान न धनुष ने चाही न दुलारी ने। समय की गाज अगर असमय उन पर न गिरी होती तो आज वे भी पढ़े - लिखे होते ... किन्तु किरन ने ? किरन ने तो उनके सारे अरमान पूरे कर दिये। क्या पूछेंगे, उससे पत्रकार ... और क्या बता पाएगा वह इतना सब ? काश वह लेखक होता तो अपनी आप बीती खुद ही लिख देता। पता नहीं क्या समय हुआ होगा ? रात काफी बीत चुकी है .... नींद अब आँखों को घेरती चली जा रही है ... पलकें भी बन्द हो रही है ....।
पता 
एम - 516, पद्यनाभपुर, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

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