इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 24 अगस्त 2015

धर मशाल ल तैं ह संगी

सुशील भोले 
धर मशाल ल तैं ह संगी, जब तक रतिहा बांचे हे
पांव संभाल के रेंगबे बइहा, जब तक रतिहा बांचे हे

अरे मंदिर - मस्जिद कहूं नवाले, माथा ल तैं ह संगी
फेर पीरा तोर कम नइ होवय, जब तक रतिहा बांचे हे

देश मिलगे राज बनगे, फेर सुराज अभी बांचे हे
जन - जन जब तक जबर नइ होही, तब तक रतिहा बांचे हे

अबड़ बड़ाई सब गाये हें, सोसक ल सरकार कहे हे
हम तो सच ल कहिबो संगी, जब तक रतिहा बांचे हे

नवा किरण तो लटपट आथे, तभो उदिम करना परही
चलौ यज्ञ कराबो आजादी के, जब तक रतिहा बांचे हे

संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853.05931,098269.92811

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