इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 24 अगस्त 2015

तीजा

नंदकुमार साहू

सिव-सती के मया पिरित ल, बेद-पुरान ह गाथे।
सबे जनम म पारवती ह, सिवजी ल पति पाथे।
अमर पति पाए बर देवी, करिस तपसिया भारी।
तब ले अपन सुहाग के खातिर, तीजा रहिथें नारी।

तिजिहारिन मन करत रहिथें , तिजहारा के अगोरा।
पन्दरा दिन के अघुवाही, हो जाए रहिथे जोरा।
सुरता आथे ननपन के, सखी-सहेली के नाँव।
नंदिया-तरिया, घाट-घठउंदा, बर-पीपर के छाँव।

ओरी-पारी आगू-पाछू सबके तिजहारा आ गें।
जम्मों तिजिहारिन मन ए दे, मइके म जुरियागें।
दूज के रतिहा किंजर-किंजर के करू भात ल खाथें।
तीज के निरजला बरत ल, हँसी-खुशी रहिजाथें।

चउथ मुंधेरहा चरबज्जी ले, चाबे लगे मुखारी।
नहाखोर नवा लुगरा पहिने, पूजा के करे तियारी।
पारबती अऊ सिव ल सुमर के, मन के साध पुराथे।
मया-दुलार मिले मइके ले, तीजा के चिनहा पाथे।

ठेठरी, खुरमी, सूजी, सिंघाड़ा, ले, भर जाथे थारी।
अरपन करके भोग लगाथें फेर करथें फरहारी।
तिजिहारिन दीदी-बहिनी के, दुएच् टप्पा बोल हे।
मइके के चेंदरा अऊ, पसिया घला अमोल हे।
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ग्राम - मोखला
पोष्‍ट - भर्रेगांव, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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