इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

सोमवार, 24 अगस्त 2015

तीजा

नंदकुमार साहू

सिव-सती के मया पिरित ल, बेद-पुरान ह गाथे।
सबे जनम म पारवती ह, सिवजी ल पति पाथे।
अमर पति पाए बर देवी, करिस तपसिया भारी।
तब ले अपन सुहाग के खातिर, तीजा रहिथें नारी।

तिजिहारिन मन करत रहिथें , तिजहारा के अगोरा।
पन्दरा दिन के अघुवाही, हो जाए रहिथे जोरा।
सुरता आथे ननपन के, सखी-सहेली के नाँव।
नंदिया-तरिया, घाट-घठउंदा, बर-पीपर के छाँव।

ओरी-पारी आगू-पाछू सबके तिजहारा आ गें।
जम्मों तिजिहारिन मन ए दे, मइके म जुरियागें।
दूज के रतिहा किंजर-किंजर के करू भात ल खाथें।
तीज के निरजला बरत ल, हँसी-खुशी रहिजाथें।

चउथ मुंधेरहा चरबज्जी ले, चाबे लगे मुखारी।
नहाखोर नवा लुगरा पहिने, पूजा के करे तियारी।
पारबती अऊ सिव ल सुमर के, मन के साध पुराथे।
मया-दुलार मिले मइके ले, तीजा के चिनहा पाथे।

ठेठरी, खुरमी, सूजी, सिंघाड़ा, ले, भर जाथे थारी।
अरपन करके भोग लगाथें फेर करथें फरहारी।
तिजिहारिन दीदी-बहिनी के, दुएच् टप्पा बोल हे।
मइके के चेंदरा अऊ, पसिया घला अमोल हे।
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ग्राम - मोखला
पोष्‍ट - भर्रेगांव, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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