इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2015

बिना टिकट

मनोज सिंह

        बचपन का नाम सुनते ही मेरा तुरंत पीछे मुड़कर देखना स्वाभाविक था। अब तो राघव भी कोई नहीं बोलता। मि. राघवेंद्र या मि. सिंह ही बोला जाता है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर भीड़ अभी कम थी और मेरी दृष्टि अपना नाम पुकारने वाले को आसानी से ढूँढ सकती थी।
- कौन, सुनील! ज़्यादा फर्क उसमें भी नहीं आया था। नौवीं कक्षा तक आते - आते चेहरा व शरीर अपना पूरा आकार तकरीबन ले ही लेते हैं। और तभी हम बिछड़े थे। हाँ, आज उसकी जींस की पैंट घुटने के नीचे से कुछ ज़्यादा फटी हुई थी। नहीं, शायद फाड़ दी गई थी। पता नहीं। ऊपर मामूली - सी टी.शर्ट और कंधे के पीछे लटका बड़ा - सा मगर पुराना बैग। इसे झोला भी कहा जा सकता था। रंग उसका गोरा न होता तो हिंदुस्तान में उसे भीख माँगने वाला घोषित कर दिया जाता। मेरी कौतूहल व खोजती निगाहें रुक - रुक कर सरकते हुए और नीचे पहुँची तो देखा कि उसकी चप्पलें अपने जीवन की अंतिम साँसे गिन रही थीं। उसकी ऐसी हालत देख मेरी आँखें में चमक उभरी थी। और क्यों न उभरती, मेरे कपड़े जो बेहतर थे।
- कहाँ जा रहा है? ''उसके नजदीक आकर पूछा था।
- मैं भोपाल जा रहा हूँ ... और तू ...।''
- वैसे तो गोवा जा रहा था, पर चल, तेरे साथ भोपाल चलता हूँ।कुछ दिन तेरे पास रुककर फिर वहीं से चला जाऊँगा। रास्ते में ही तो है। फिर बहुत दिनों बाद मिले हैं कुछ बातचीत और मस्ती भी हो जाएगी।''
        और अगले ही पल वो बिना किसी इजाजत के मेरे साथ ट्रेन की बोगी में था। अजीब आदमी है। सोच कर हैरानी हुई थी। मगर फिर लगा कि बचपन के घनिष्ठ मित्र ऐसा ही करते हैं। और फिर उसका साथ अचानक अच्छा लगने लगा था और मैं खुश था। लेकिन कहाँ अब मैं दोस्तों के लिए घंटे भी नहीं निकाल पाता हूँ और इसने तो दिनों में बात कह दी। सोच - सोच कर आश्चर्य हो रहा था। मगर ट्रेन के प्लेटफार्म छोड़ते ही उसको जानने की जिज्ञासा, फिर एक -दो सवाल और उस ओर से जवाब। दूसरी तरफ  से कोई खास पूछताछ नहीं की जा रही थी फिर भी प्रवाह में सब कुछ भूलकर मैं कुछ ही देर में अपनी ऊँची - ऊँची सुनाने लगा तो वो धीरे -धीरे मेरी बर्थ पर पसर चुका था। कंडक्टर नहीं आता तो शायद मैं बोलता ही रहता। इस दौरान मैंने तो पूछा भी नहीं था कि उसकी टिकट का क्या होगा। मेरे दिमाग में यह सवाल आता भी कैसे, और फिर उसने इसका जि़क्र भी तो नहीं किया था। कंडक्टर को देखकर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन न थी। चेहरे से निर्भय, तनावमुक्त। मानो उसने कुछ किया ही न हो। मैं अपनी टिकट दिखा चुका था परंतु कंडक्टर के उसकी टिकट के लिए खड़े रहने से मुझे परेशानी होने लगी थी। दूसरी बार उससे टिकट पूछे जाने पर उसने बेझिझक होकर एक नज़र मेरी ओर डाली थी। और अंत में उसकी टिकट मुझे ही लेनी पड़ी थी। पैनल्टी के साथ। और साथ थी टीटी की उलाहना भरी नज़र। जिसके पास उसे गलत साबित करने के लिए पूरा प्रमाण था।
        मगर उसके चेहरे पर कोई शरम न थी जबकि मैं पानी - पानी हो रहा था। टिकट कलेक्टर के जाने के बाद ही मैं लंबी साँस ले पाया था। मानो मैंने ही कोई चोरी की हो। एक मिनट के लिए झुंझलाहट हुई थी। ये कोई बात हुई! ख़ैर, बचपन के दोस्त आपस में ऐसा ही अधिकार दिखाते हैं। यही सोचकर मैंने खिड़की से बाहर झाँका तो वहाँ अंधेरा हो चुका था। कुछ देर बाद मैं फिर सामान्य क्या हुआ कि अचानक मन में भाव उमड़े थे कि कम से कम धन्यवाद तो कहना था। और मैं उसे इस बात का अहसास दिलाने अंदर मुड़कर कुछ कहना चाहा तो देखा कि वो झोले में से एक अंग्रेज़ी नॉवल निकालकर पढ़ने में मस्त हो चुका था। यह उसकी बचपन की आदत है। देखते ही पुरानी यादें ताजा हुई थीं। यह तो बिल्कुल भी नहीं बदला। और मैं, शायद मैं भी नहीं। आदमी का मूल स्वभाव कहाँ बदलता है। और मैं अचानक उससे जुड़ी पुरानी यादों में खोने लगा था। वैसे मैं इतना जरूर जानता था कि उसने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया था। उसके डैडी के स्थानांतरण के बाद हम स्कूल से अलग - अलग क्या हुए, मुझे अपने पापा से उसके बारे में जानकारी मिलती रहती थी। हमारे दोनों के पिता एक ही विभाग में जो थे। इधर मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला क्या लिया मेरी प्रतिष्ठा समाज में स्थापित होने लगी थी। और दिनों में एक बार फिर मैं सुनील से अपने आपको ऊपर रखवाने में सफल हुआ था। कालोनी में भी मम्मी - पापा की पूछ ज़्यादा रहती जब मेरा नाम बेहतर ढंग से लिया जाता। और यह सिलसिला कुछ सालों तक तब तक चलता रहा जब तक उसकी ख़बर मिलती रही। शायद फाइनल ईयर में पता चला था कि वह दिल्ली के किसी फाइव स्टार होटल में नौकरी करने लगा है।
- उंह, बेयरे की नौकरी ही तो है फिर चाहे बड़े होटल में क्यों न सही। कभी माँ तो कभी पड़ोस की आँटी बोल ही देती थीं। और सुनक मैं भी मन ही मन खुश होता था। वह आखिरी खबर थी उसके बाद उसकी कोई जानकारी नहीं थी।
- खाने का क्या है? '' उसने बेझिझक होकर पूछा था। उसकी आवाज ने मुझे भूतकाल से बाहर निकाला था।
- ऑर्डर दे दिया है। आगरा में सर्व होगा। आगरा शायद नौ बजे आता है। अभी लगता है, टाइम लगेगा।'' 
        मैंने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखते हुए कहा था। ताजमहाल के शहर की लाइटें अभी दूर थीं। और मेरी निगाह घड़ी पर फिर वापस पहुँची थी।
-दारू चलेगी ?''कहते हुए उसने अपने उसी बैग से शराब की छोटी - सी बोतल निकाली थी। प्लास्टिक के दो गिलास उसने स्टेशन पर चाय वाले से जब माँगे तो मैं कुछ समझा न था। अब वही काम में लिए जा रहे थे।
- नहीं - नहीं। वैसे कभी - कभी लेता तो हूँ, मगर ...।'' देसी देखकर मेरे चेहरे पर आड़ी - तेड़ी कुछ रेखाएँ उभरी थीं।
- अरे यार, देसी मस्त होती है, ऊपर से सस्ती भी पड़ती है। फिर स्टेशन के बाहर यहीं मिल रही थी।'' शायद उसने मुझे पढ़ लिया था।
        मैं पीने तो लगा था लेकिन देसी नाम से भी परहेज था। तभी तो उसे देख हैरानी हो रही थी ... तो यही इसका स्टैंडर्ड है। और फिर मैं जब स्वयं को रोक न सका तो धीरे से बोल ही पड़ा - कोई बात नहीं, तुम लो। मैं सिर्फ  अंग्रेज़ी लेता हूँ।''
- अच्छा।'' उसने मुस्कुराते हुए आँखों से मेरे बड़प्पन को स्वीकारा था। अगले घूँट के साथ उसने एक निगाह सामने के बर्थ वाले पर डाली थी और फिर बिना किसी परवाह के एक बार फिर गिलास भरकर उसे बगल में रखा और नॉवल खोलकर पढ़ने लगा था। तभी सामने वाले की निगाह मुझसे टकराई तो मैं झेंप गया था। दारू गिलास में से छलक न जाए, सामने वाला यात्री कहीं कुछ टोके नए मुझे ज़्यादा चिंता हो रही थी। और फिर हमें देसी पीता देख पता नहीं दूसरे क्या सोचते होंगे। मगर वह बेपरवाह था। और फिर आगरा में खा - पीकर वह तुरंत सो गया था। हाँ, लेटने पर उसने इतना ज़रूर कहा था - कोई दिक्कत तो नहीं। और मैंने अपना सिर हिलाते हुए मन किया था।
        सुबह भोपाल पहुँचकर फ्लैट में मैं उसके साथ पहुँचा तो मेरा चेहरा कमरे की तरह सिकुड़ रहा था। जिन लोगों के सामने अपने आपको छिपाना है उन्हें घर कभी नहीं लाता था। उसने घर के अंदर पहुँचते ही चारों ओर नज़र डाली तो लगा कि आज मेरा अभिमान इसके सामने टूट जाएगा। मगर उसने तुरंत अपनी प्रसन्नता प्रकट की तो एक मिनट के लिए आश्चर्य हुआ था। और क्यों न होता एक कमरे का फ्लैट अंदर से अव्यवस्थित और गंदा जो था। साफ़. सफाई कौन करता। प्राइवेट नौकरी में रात देर हो जाती और फिर बीवी का इंतजाम भी अभी तक नहीं हुआ था। कैसे होता, छोटी - सी नौकरी में इंजीनियरिंग कॉलेज की सारी हवा निकल रही थी तो शादी की हवा कैसे बन पाती। शादी के पहले कुछ पैसा इकटठा हो जाए, इस चक्कर में जवानी बेकार जा रही थी और मैं अक्सर रात में हिंदुस्तानी इंग्लिश शराब के दो पैग लगाकर अपनी भड़ास निकाल लिया करता था। तो क्या हुआ, इंजीनियर तो हूँ इससे बेहतर ही है। तभी तो इसे ये भी अच्छा लग रहा है और क्या...? और मैं तुरंत घर में बिखरे सामान को समेटने की कोशिश में लगा तो उसने किचन में घुसकर तांक - झांक कर चाय बना डाली थी।
- दूध तो होगा नहीं।'' मैंने सफाई दी थी।
- कोई बात नहीं, ब्लैक टी ज़्यादा अच्छी होती है।'' और वह चाय की चुस्कियाँ ले रहा था।
        बचपन का दोस्त आया है तो जवानी के कुछ दोस्त भी इकटठा हुए थे। और देर शाम दारू की महफिल ज़मीन पर ही जम गई थी। लड़के ज़्यादा और कुर्सियाँ कम थीं। बड़े गर्व से मैंने नई बोतल सुनील के हाथ में पकड़ाई तो उसने खुशी - खुशी उसको दोनों हाथों से समेटा था।
- अरे यार, वही ब्रांड ... आज तो कोई अच्छी मँगाता। ये तो अंग्रेज़ी के नाम पर विदेशी ठर्रा है..।''. एक मुँहफट दोस्त बोल पड़ा था।
- क्यों! अच्छा ब्रांड तो है। इससे किक जल्दी मिलती है।'' बोलते हुए सुनील ने बोतल का ढक्कन बड़ी सरीके से खोला था।
- खाने में क्या है... अच्छा! आज तो नमकीन के साथ अंडे भी हैं...क्या बात है।'' एक बार फिर उसी दोस्त द्वारा बोला गया था। नौकरी के दोस्तों और बचपन की दोस्ती में यही फर्क होता है। तभी तो प्याज़ के साथ खाने वाला, अंडा देखकर भी टोंट मार रहा है। और कहाँ सुनील फाइव स्टार होटल वाला होकर भी कुछ नहीं बोल रहा। पहली बार मुझे सुनील में अच्छाई दिखी थी। और मैंने भी उसकी बड़ाई कर दी थी। क्यों न करता, दोस्त की बड़ाई में खुद की भी तो बड़ाई है।
- अरे इसके लिए यह क्या है। फाइव स्टार में तो एक से एक नानवेज डिश मिलती है, क्यों सुनील?'' सुनकर स्थानीय दोस्तों ने उसे आश्चर्य से देखा मगर वह सिफ़र्  मुस्कुराया था। और उसने पैग बनाने के लिए बोतल को गिलास में डालना शुरू किया तो शराब उड़ेलने के अंदाज़ में विशेषता थी। साफ  जाहिर हो रहा था कि उसे बार में काम करने का एक लंबा अनुभव है।
- क्या बात है... फाइव स्टार की तो बात ही कुछ और है। एक बार फिर उसी लम्पट दोस्त ने छेड़ा था।'' सुनकर अबकी बार उसकी आँखों से लार टपक रही थी। ऐसा ही है। लालची कहीं का।
- ऐसी कोई बात नहीं यार ...।'' सुनील ने टरकाया था।
- ऐसे कैसे नहीं। एक से एक सुंदर लड़कियाँ देखी होंगी।'' दूसरे दोस्त ने भी हिस्सा लिया था।
- सब एक - सी होती हैं। कई होटलों में काम कर चुका हूँ। इटालियन, रशियन, आयरिश, अफ्रीकन, अमेरिकन... तुम समझ लो कि कई देश की लड़कियों का अनुभव है।'' सुनील ने मानो सबकी नस पकड़ ली थी।
- अच्छा!! दोस्तों के लिए यह एक दिलचस्प और सबसे प्रिय विषय था। शराब भी कमाल की चीज है अंदर जाते ही शरीर में आग लगा देती है। फिर क्या, हर कोई पहलवान और फिर सबको चाहिए सपनों की राजकुमारी। और उसकी ड्रेस को देखकर मुँह बनाने वाले अब उससे चिपकने लगे थे। एक की अभी पूरी चढ़ी भी नहीं थी कि उसने तो कह भी दिया - हमसे साली एक तो पटती नहीं और तेरे से ... कहीं फेंक तो नहीं रहा... उसी लंपट ने ताना मारा तो मैंने अबकी बार उसे घूरा था।
- अब यहाँ पर आकर होटलों में कई - कई दिन अकेले रहती हैं तो किसी - किसी के साथ, कभी -कभी मौका मिल ही जाता है। फिर हमने कौन साथ - साथ जिंदगी बितानी है... ये तो समय की माँग है। और फिर उस सोसायटी में ये सब गलत भी नहीं।
        गरमा - गरम बातों का असर था जो दूसरी रात दोस्तों ने शहर के छोटे से होटल में उसे पार्टी दी थी। उम्मीद थी कुछ और विस्तार में सुनाएगा। मगर वहाँ भी सुनील चैन से बैठ नहीं पाया था। बेयरे के हाथ से गिलास की ट्रे लेकर खुद ही पैग बनाने लगा। साथ ही वही उन्मुक्त हँसी... बचपन की तरह...। शुरू से उसका दिमाग चंचल था अत्याधिक होशियार। कुछ लोग सनकी भी कहते थे। मैं उससे अक्सर एक - दो नंबरों से बाजी मार लेता और वह क्लास में हमेशा दुसरे पायदान पर ही रह जाता था। मगर उसे इस बात का कभी मलाल न होता और परीक्षा से पहले किसी मैग्ज़ीन को पलटने में उसे कोई भी हिचकिचाहट नहीं होती थी। उसके चेहरे पर शांति रहती थी और मैं टेंश की कहीं मेरा फर्स्ट रेंक न छिन जाए। तो क्या हुआ, आख़िरकार मैं आगे रहता भी तो था। शीर्ष पर पहुँचने के लिए तपस्या करनी होती है, माँ की इस बात से मुझे फक्र होता। वही आदत अभी तक बनी हुई है। पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की चिंता फिर नौकरी फिर अब एक छोकरी। साला कहाँ मैं अब तक एक के लिए परेशान हूँ और कहाँ ये इतने मौज कर चुका है। उँह, ऐसी ही होगी बेकार, बाज़ारू नहीं तो। और मैंने अपनी भावनाओं को सँभाला था। लेकिन देर रात घर वापस आया तो बिस्तर पर लेटते ही कई एक ने सपनों में आकर तंग करना शुरू कर दिया था। तभी उसकी आवाज बगल के बिस्तर से आई थी।
- अंकल - आंटी कैसे हैं?''
- ठीक हैं।'' मैंने दूसरी तरफ़  करवट लेते हुए जवाब दिया था। चूँकि ख्वाबों से निकलना नहीं चाहता था।
- मुझे उनके हाथ के परांठे आज भी याद हैं। और तूने शादी नहीं की।''
- हाँ, माँ ने देख तो रखी है। बस मुझे ही छुट्टी नहीं मिल रही।''
- छुट्टी! ये क्या बात हुई! ऐसी नौकरी को तो लात मारते हैं यार।'' उसने भरपूर छेड़ने की कोशिश की थी।        सुनकर मैं मुस्कुराया तो था मगर मन ही मन कहने लगा- ये नौकरी तो बड़ी मुश्किल से मिली है वह भी गई तो क्या खाऊँगा।''
        उसे भोपाल आए तीन दिन बीत चुके थे। बस इतना पता चला था कि उसके मम्मी - पापा रिटायरमेंट के बाद पंजाब जा बसे हैं। और उसने और अधिक उनके बारे में बताने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई थी। हाँ, चौथे दिन जब उसने सुबह - सुबह अचानक तीन सौ रुपए की माँग कर डाली तो मैं सुनकर सन्न रह गया था।
- यार दो सो पचहत्तर रुपए की गोवा की टिकट है और पच्चीस रुपए में वहाँ पहुँचकर कुछ मूँगफल्ली खरीदूँगा।''
- वह क्यों?''
- बस यार, गोवा में कुछ दिन रहने का मन है। इस बार खाने कमाने के लिए समुद्र किनारे मूँगफल्ली बेचने की सोच है। आसान काम है। बाकी काम से मैं बोर हो चुका हूं देख ले। है तो दे दे। नहीं तो कोई बात नहीं।'' वह एक बार फिर एकदम सपाट था। और मैं, अपने आप से उलझ रहा था। महीने का आखिरी था। जेब में सौ - सौ के आखिरी तीन - चार नोट बचे थे। शायद इसमें मेरा बड़प्पन झलकता या पता नहीं क्या, और मैं यंत्रवत उसे पैसे देने लगा था। हाँ, इस बार थोड़ी चिंता जरूर ज्यादा हुई थी।
        देर शाम वह निकल चुका था। बिना कुछ कहे। कोई थैंक्स नहीं। बस सीधा सरल। मिले तो ठीक न मिले तो ठीक। उसके जाते ही सोचा तो पहले पहल लगा कि पागल है। देख तो शरम भी नहीं आई पैसे माँगने में। वापस करने का ज़िक्र भी नहीं किया। पता नहीं कैसा है। रात बिस्तर पर लेटा तो करवट बदलते ही लगा कि कोई आज मुझे झकझोर रहा है। और मैं बँधा हुआ हूँ। अचानक लगा कि मैं सबसे स्वतंत्र होना चाहता हूँ। अगले पल बेचैनी बढ़ी थी कि कुछ ही देर में चिंताओं ने फिर आ घेरा था। सुबह दूध वाले को पैसे देने हैं। और किराने वाला... हाँ,उसके भी बकाया हैं। साला, क्या ज़िंदगी है। क्या मेरी इन बातों का कोई अंत है? पता नहीं। और एक वह है रोज़ मस्ती से इधर - उधर घूम रहा है। उसके पास कुछ नहीं, मगर उसे कोई परवाह नहीं। और मैं, दिन भर चिंता में। तो कहीं वह मुझसे बेहतर तो नहीं? शायद। अचानक मन ने विद्रोह किया और मैं तुरंत सुबह की पहली गाड़ी से घर जाने के लिए सामान बाँधने लगा था। बे टिकट।

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