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सोमवार, 24 अगस्त 2015

लाला जगदलपुरी की तीन रचनाएं

1 रीते पात्र रह गये रीते
मचल उठे प्लास्टिक के पुतले,
माटी के सब घरे रह गये।
जब से परवश बनी पात्रता,
चमचों के आसरे रह गये।

करनी को निस्तेज कर दिया,
इतना चालबाज कथनी में,
श्रोता बन बैठा है चिंतन,
मुखरित मुख मसखरे रह गये।

आंगन की व्यापकता का,
ऐसा बटवारा किया वक्त ने,
आंगन अंतर्ध्यान हो गया,
और सिर्फ  दायरे रह गये।

लूट लिया जीने की सारी,
सुविधाओं को सामर्थों ने,
सूख गयी खेती गुलाब की,
किंतु कैक्टस हरे रह गये।

जाने क्या हो गया अचानक,
परिवर्तन के पाँव कट गये,
रीते पात्र रह गये रीते,
भरे पात्र सब भरे रह गये।
2 प्रश्‍न ही प्रश्‍न बियाबान है

हम - तुम इतने उत्थान में हैं
भूमि से परे, आसमान में हैं।

तारे भी उतने क्या होंगे,
दर्द - गम जितने इंसान में हैं।

सोना उगल रही है माटी,
क्योंकि हम सुनहले विहान में हैं।

मोम तो जल जल कर गल जाता,
ठोस जो गुण हैं, पाषाण में हैं।

मौत से जूझ रहे हैं कुछ,
तो कुछ की नज़रें सामान में हैं।

मुर्दों का कमाल तो देखो,
जीवित लोग श्मशान में हैं।

मन में बैठा है कोलाहल,
और हम बैठे सुनसान में हैं।

किसने कितना कैसे चूसा,
प्रश्न ही प्रश्न बियाबन में हैं।

सोचता हूँ, उनका क्या होगा?
मर्द जो अपने ईमान में हैं।
3 बस्‍ती यहां कहां पिछड़ी है

जिसके सिर पर धूप खड़ी है,
दुनिया उसकी बहुत बड़ी है ।

ऊपर नीलाकाश परिन्दे,
नीचे धरती बहुत पड़ी है ।

यहाँ कहकहों की जमात में,
व्यथा कथा उखड़ी.उखड़ी है।

जाले यहाँ कलाकृतियाँ हैं,
प्रतिभा यहाँ सिर्फ़ मकड़ी है।

यहाँ सत्य के पक्षधरों की,
सच्चाई पर नज़र कड़ी है।

जिसने सोचा गहराई को,
उसके मस्तक कील गड़ी है ।

और कहाँ तक प्रगति करेगी,
बस्ती यहाँ कहाँ पिछड़ी है।

:जन्म: 17 दिसंबर 1920
निधन: 14 अगस्त 2013
उपनाम: लाला जगदलपुरी
जन्म स्थान - जगदलपुर ( छ.ग.)

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