इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2015

बंटवारा

योगेन्‍द्र प्रताप मौर्य

घड़ी में जैसे ही रात के 11:59 बजे कि राम ने माँ को जल्दी से उनकी छड़ी पकड़ा दी और उधर श्याम ने पिताजी को। माँ और पिताजी को भी पता था कि सोलहवाँ दिन लगने वाला है इसलिये वे पहले से ही तैयार बैठे थे। कहीं देर हो गई तो बहुओं में सिर फुटौवल शुरु हो जायेगी। माँ ने घर का चौखट लांघा। तो उधर पिताजी छड़ी लिए घर में प्रवेश के लिए खड़े थे। माँ , पिताजी को और पिताजी, माँ को आंसू भरी नयनों से निहार रहे थे। पूरे पंद्रह दिन बाद यह मिलन क्षणिक था। थोड़ा बातें कर लें नहीं तो पंद्रह दिन का इंतजार करना पड़ेगा। न जाने कितनी ही बातें आँखों ही आँखों में हो गई। उजाला भरी रात थी। मानो आज चाँद भी उन्हें एक - दूसरे को जी भर देखने के लिए अपनी आँखे खोल दी हो। पर चाँद भी मनुष्य के निष्ठुरता के आगे लाचार है।
'' पिताजी जल्दी अंदर आ जाओ,बिस्तर लगा है।'' राम ने कहा।
        उधर श्याम माँ का हाथ पकड़कर अंदर खींच ले गया, ''सो जाओ बिस्तर पर पिताजी का है'' श्याम ने कहा।
- '' बेटा थोड़ा पानी पिला दो'' माँ ने कहा।
- '' अच्छा '' राम की जुगनी ने पानी नहीं पिलाया। हाँ पिलाती भी क्यों उन्हें तो पता था माँ को अभी ठेल देंगे श्याम के यहाँ। फिर उसकी जिम्मेदारी हो जायेगी। पर हम भी पानी नहीं देगे। सुबह का इंतजार करो। और सो जाओ। श्याम ने माँ से कहा।
        शायद माँ ने आँसुओ से ही प्यास बुझा ली हो। पता नहीं स्वामीजी किस हाल में होंगे? कहींं राम उन्हें मेरी टूटी हुई चारपाई ही न दे दे सोने के लिए। उन्हें नींद कैसे आएगी। जिंदगी भर राम और श्याम की ख़ुशी के लिए अथक परिश्रम करते रहे। अब बुढ़ापा में ... किसे उनकी परवाह है।
        माँ को नींद कहाँ आने वाली थी। माँ सोचने लगी कि आखिर मेरे परवरिश में कहाँ खोट रह गई थी। अपने हिस्से की रोटी इन्हें खिलाई। पहले प्यास इनकी बुझाई। स्वामीजी जब कोई सामान बाजार से लाते थे तो पहले राम और श्याम को खिलाते थे। यदि बच गया तो हम और स्वामी जी खाते थे। माँ वैष्णो हमारी कैसी परीक्षा ले रही है?
        आज भी याद है कि जब कभी भी राम और श्याम को किसी चीज की जरूरत पड़ती थी। तो वे दोनों कैसे मेरे आँचल से लिपट जाया करते थे, पगले तरह - तरह के बहाने बनाकर हमसे ओ चीज हासिल कर लेते थे। मैं हमेशा उन दोनों की तरफ  ही रहती थी उनके पिताजी को किसी न किसी तरह मिला ही लेती थी। यदि कभी मैं राम और श्याम से रूठ जाती थी तो वे दोनों इतने भोले बनकर हमें मनाते थे कि हम दुबारा रूठना भूल जाते थे। उनके पसंद का खाना बनाना, उनके पसंद का पहनावा,उनकी हर एक इच्छाओं को पूरा करना स्वामी जी की पहली प्राथमिकता होती थी। स्वामी जी को भले ही इसके लिए अतिरिक्त कार्य करना पड़ा हो। फिर भी राम और श्याम ले लिए क्या कुछ नहीं किये पढ़ाई - लिखाई से लेकर खुद के पैर खड़े होने तक आदि - आदि।
        मैं और स्वामी जी न जाने कहाँ - कहाँ मत्था टेके होंगे। मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारा तथा गिरिजाघर जिसने जहाँ कहा। हम वहां गए। अंतिम बार एक भिखारी के कहने पर हम दोनों माँ वैष्णो के दरबार गए थे।
माँ वैष्णो ने ही प्रसाद स्वरुप हमें दो रत्न दी राम और श्याम।
        सवा महीने बाद पुन: मैं और स्वामी जी माँ वैष्णो के दरबार गए। दर्शन की। चुनरी चढ़ाई। हम दोनों ने खूब खर्च किये। सभी भीखारियों की झोलिया लड्डुओं से भर दी थी। तब से हर साल माँ वैष्णो के दरबार दर्शन करने पहुँच ही जाती थी।
        राम और श्याम भी हम दोनों से मोहब्बत करते थे। कभी- कभी वे दोनों स्वयं अपने हाथो से खाना बनाकर हम दोनों को खिलाते थे। मेरा और स्वामी जी का रोज शाम को पैर दबाना उनका नित्य का काम था। पूरे कॉलोनी में राम और श्याम की बड़ी प्रशंसा होती थी। स्कूल में हमेशा वही दोनों टॉप पर रहते थे। स्कूल से लौटने पर झट से आँचल में छिप जाना। लंच न करने का बहाना। उनकी प्यार भरी बातें। सब कहाँ चली गई। बहुओ के आते ही उनका स्वभाव बदलने लगा। पहले तो लगता था। अभी बच्चे है नासमझ है। धीरे - धीरे हालात ठीक हो जायेगा। पर दिन ब दिन घर के हालात बिगड़ते गए। सब कुछ वे दोनों अपनी मर्जी के करते गए। न हम से कोई राय- बात, न स्वामीजी से। मैं तो दाँत पीस के रह जाती थी।
        पर स्वामीजी के नाते कुछ बोल नहीं पाती थी। ओ तो अक्सर मुझे समझाया करते थे कि देख कौशिल्या ये बच्चे नए जमाने के हैं इनको अपनी मर्जी से जिंदगी जीने दो। इनके मामले में दखल न करो उसी में भलाई। नहीं तो ये कब क्या जवाब दे दे कुछ गारंटी नहीं है। अब हम वृद्ध हो गए। यूं समझ लो चाय में गिरी हुई मक्खी। चुटकी से पकड़कर बाहर करने में देर नहीं लगेगी। किन्तु मैं कहाँ मानने वाली थी। मैं सोचती थी राम और श्याम मेरे औलाद है क्या इन्हें सही - गलत पर डांट - फटकार नहीं सकती हूँ। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने राम और श्याम को बुलाकर कह दिया कि तुम लोगो की मनमानी नहीं चलेगी। घर में क्या हो रहा है कब मायके कब ससुराल क्या योजना बन रही हैं हमें भनक तक नहीं लगती। जब जी में आया पर्स उठाके चल दिया। समझ देना अपनी- अपनी बीबियों को यहाँ रहना है तो हमारी मर्जी से रहे। नहीं तो अपने मायके चली जाये। राम और श्याम को माँ की यह बात अच्छी नहीं लगी। वे माँ को घूरते हुए अपने कमरे में चले गए।
        समय के साथ - साथ माँ और पिताजी से राम और श्याम की दूरियां बढ़ने लगी। यह दूरी कब खाई में तब्दील हो गई पता ही नहीं चला।
        आये दिन दोनों अपने माँ और पिताजी से झगड़ते तो उनकी माँ और पिताजी अपना मकान दूसरों को लिख देने की बात करते।
        किन्तु किसी के माता - पिता ऐसा नहीं करते हैं। पुत्र भले ही कुपुत्र हो जाये किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती है न ही पिता कुपित होता है।
        धीरे - धीरे राम और श्याम में भी झगड़ा - झंझट होने लगा। और दोनों में बँटवारा हो गया। कौशिल्या और स्वामीजी की तबीयत भी अक्सर खराब रहने लगी। दोनों बेटो ने मिलकर अपने माँ और पिताजी को बाँट लिया वह भी पन्द्रह - पंद्रह दिन के लिए। घर के बीचों बीच दीवार खींच गई। वर्षों से साथ - साथ रहने वाले माता - पिता को जब एक - दूसरे की अधिक आवश्यकता थी तब उनके कुपुत्रो ने उन्हें अलग- थलग कर दिया। वे भी साथ - साथ रहने की जिद नहीं कर पाये।
        भोर हुई श्याम जब नित्यक्रिया से खाली हुआ। तब याद आया कि माँ ने रात में पानी माँगा था। वह पानी लाया।
- '' माँ उठो पानी पी लो।'' श्याम ने कहा।
        किन्तु माँ तो चिरनिद्रा में जा चुकी थी ... जब यह खबर स्वामी जी को मिली तो उठाकर जोर से बोले - मैं भी आ रहा हूँ कौशिल्या ...'' तभी तपाक से गिर पड़े। ऐसे गिरे की दुबारा न उठ पाये।
बरसठी जौनपुर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें