इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 24 अगस्त 2015

खादी के टोपी

कोदूराम दलित

पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे
खादी के उज्जर टोपी ये
गाँधी जी के ताज हे ।
    आजादी के लड़िन लड़ाई
    पहिरिन ये ला वीर मन
    गोरा मन के टोप झुकाइन
    बलिदानी रणधीर मन ।

भइस देश आजाद बनिस
बंचक खातिर गाज ये
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे...
    सब्बो टोपी ले उज्जर
    सुग्घर सिर के सिंगार ये
    ये ला अपनाओ सब झिन देथे
    सुख शांति अपार ये ।

आधा गज कपड़ा खादी के
हमर बचाइस लाज ये
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे...
    बन जाथे कनटोप इही हर
    बन जाथे सुग्घर थैली
    नानुक साबुन मा धो डारो
    जब ये हो जावय मैली ।

येकर महिमा बता दिहिस
हम ला गाँधी महराज हे
पहिनो खादी टोपी भइया !
अब तो तुम्हरे राज हे...
    येकर उज्जर पन हमार मन के
    मन उज्जर कर देथय
    येकर निरमलता हमार मन मा
    निरमलता भर देथय ।

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