इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 29 अगस्त 2015

एक तोता और एक बूढ़ा बैगा

डॉ. विजय चौरसिया

        एक बूढ़ा बैगा अपनी बूढ़ी बैगीन पत्नी के साथ रहता था। उनकी एक भी संतान नहीं थी। उनका परिवार अत्यंत गरीब था। उनके पास खेत - बाड़ी जमीन कुछ भी नहीं था। एक दिन उस बूढ़े बैगा ने सुबह - सुबह अपने हाथ में कुल्हाड़ी रखी और लकड़ी काटने जॅगल की ओर गया। जॅगल में जाकर उसने दो पेड़ों को काटा तो वह थक गया और विश्राम करने के लिए उन्हीं पेड़ों की छाया में बैठ गया। उसी समय करीब एक लाख बॅदर उस बूढ़े बैगा के पास आकर एकत्र हो गये। बॅदरों ने आकर उस बढ़े से पूछा - क्यों दादा आप थक गए हो क्या? उस बूढ़े ने कहा हॉं मैं थक गया हूं।
        फिर बंदरों ने पूछा दादा- आप लकड़ी काट रहे थे क्या? बूढ़े ने कहा हां मैं लकड़ी काट रहा था। बंदरों ने पूछा- तुम लकड़ी क्यों काट रहे थे? तो बूढ़े ने कहा मेरा विचार खेत की बाड़ी तैयार करने का है। जब बंदरों ने बूढ़े बैगा की यह बात सुनी तो बंदरों ने उस बैगा की कुल्हाड़ी ली और जंगल की ओर भाग गए। कुछ समय बाद बंदरों ने ढेर सारी लकड़ी काट कर उस बैगा के पास लाकर रख दी। इसके बाद सभी बंदर जंगल की ओर भाग गये। बूढ़ा बैगा भी लकड़ियों को वहीं छोड़कर अपने घर की ओर चला गया।
        एक सप्ताह बाद जब सभी लकड़ियाँ सूख गई। तो एक दिन वह बूढ़ा अपने खेत में आया और उन लकड़ियों को छोटे - छोटे टुकड़ों में काटा और पूरे खेत में फैलाने लगा। काम करते - करते बूढ़ा बैगा थक गया और फिर वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया।
        कुछ समय बाद फिर से एक लाख बंदरों की फौज उस बूढ़े के पास आ गई और उसकी कुल्हाड़ी लेकर उन लकड़ियों के छोटे - छोटे टुकड़े कर दिये और उन लकड़ियों को पूरे खेत में फैला दिया।
        उस बूढ़े बैगा ने अपने खेत के पास उन पेड़ों से एक नागर बनाया। फिर वह कटी हुई लकड़ियों को पूरे खेत में फैलाने लगा। बूढ़े बैगा को ऐसा करते देख बंदरों ने भी लकड़ियाँ उठाई और पूरे खेत में फैलाने लगे। एक लाख बंदरों ने एक ही दिन में पूरे खेत को तैयार कर दिया। इसके बाद उस बूढ़े बैगा ने पूरे खेत में पड़ी सूखी लकड़ियों में आग लगा दी। इसके बाद सभी बंदर जंगल की ओर भाग गये और वह बूढ़ा बैगा अपने घर आ गया। जब बरसात आई तब पूरे खेत में पानी आ गया। फिर एक दिन वह बूढ़ा बैगा एक टोकनी में धान के बीज रखकर अपने खेत में आया और उसने पूरे खेत की राख में धान के बीज बो दिये। कुछ दिनों बाद उसके खेत में पड़े धान के बीजों में अंकुर निकल आये। तब एक दिन बूढ़ा बैगा अपने खेत में आया और उसने अपने खेत के चारों ओर ऊपर नीचे कटीले काँटों की बाड़ी बना दी। बूढ़े बैगा ने अपने खेत को चारों तरफ से ऐसा घेरा कि कहीं से भी एक चूहा या चिड़िया भी खेत के अंदर न प्रवेश कर सके। इतना करके वह अपने घर वापस आ गया।
कुछ दिनों बाद जब धान की फसल तैयार हो गई। तब एक दिन बूढ़ा बैगा अपने खेत से खरपतवार निकालने के लिये गया। वह जैसे ही खेत में पहुंचा तो उसने देखा कि उसके खेत में धान का एक भी दाना नहीं है। एक दिन उसके खेत में करीब दो लाख तोतों का झुंड आया और उसके खेत के छप्पर में एक छेदा बनाया और सभी तोता खेत के अंदर प्रवेश कर गये और उसके खेत की पूरी धान को कुतर डाला और धान के अंदर के चांवल को खा कर भाग गये। जब उस बूढ़े बैगा ने अपने खेत की यह दशा देखी तो वह रोने लगा। उसने अपने खेत के चारों ओर घूम कर देखा की तोता कैसे उसकी धान को ले उड़े। तब उसने देखा की तोतों का एक बड़ा झुंड उसकी धान को लेकर उड़ गये थे, जिसके कारण रास्ते भर में उस धान का भूसा बिखरा पड़ा था।
        बूढ़ा बैगा उसी रास्ते पर चल दिया जिस रास्ते से तोतों का झुंड़ गया था। कुछ देर बाद बूढ़ा बैगा उस स्थान पर पहुंच गया जहाँ पर तोतों का झुंड़ निवास करता था। बूढ़े बैगा ने देखा की तोतों का झुंड़ जंगल में बहुत बड़े बरगद के पेड़ पर निवास कर रहा था। ऐसा देखकर बूढ़ा बैगा अपने घर की ओर चला गया,घर पहुॅचकर बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी बूढ़ी बैगीन को अपने खेत के समाचार बताए। यह सुनकर बूढ़ी बैगीन रोने लगी। तब उस बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी से एक बहुत बड़ी पाँच हाथ लम्बी और पाँच हाथ चौड़ी रोटी बनाने को कहा तथा एक मिट्टी के मटके में दस - पंद्रह किलो रमतिला का तेल भरने को कहा। बूढ़ा बैगा बहुत ही शक्तिशाली था। उसकी जो कुल्हाड़ी थी। उसको उठाने के लिये हमारे तुम्हारे जैसे करीब बीस लोगों की जरुरत पड़ेगी और उसका हॅसिया इतना वजनदार था कि उसको पकड़ने में हमारे तुम्हारे जैसे बीस आदमी लगते थे। उसने उस रोटी को और तेल वाले मटके को एक चादर के सहारे अपनी कमर में लपेट कर गठान बॉध ली।
        इसके बाद वह बूढ़ा बैगा जंगल की ओर गया। वहा पर उसने थुआ के अनेकों पेड़ों को काटकर उसका ढेर सारा दूध निकाला और उस थुआ के दूध को अपने साथ में ला रमतिला के तेल में मिला दिया। जिससे उस बूढ़े बैगा ने पक्षियों को पकड़ने के लिए चौप तैयार कर लिया। इसके बाद बूढ़ा बैगा उसी विशाल बरगद के पेड़ के पास गया! जहॉ पर तोतों का बसेरा था। उस समय उस बरगद पर एक भी तोता नहीं था। सभी तोते आसपास के खेतों में आनाज चुगने गए थे। बूढ़े बैगा ने यह अच्छा अवसर देखा और वह उस बरगद के पेड़ पर चढ़ गया और बरगद की टहनियों में चौप लगा दिया। बूढ़ा बैगा पेड़ से उतरकर नीचे आया और पास के पेड़ों में जाकर छुपकर बैठ गया। शाम के समय तोतों का झुंड दाना चुगकर अपने बसेरा में लौटने लगे। सभी तोते बरगद के पेड़ के ऊपर आकर बैठने लगे। वे जैसे ही पेड़ की डंगालों पर बैठते उसी समय उनके पंख और पैर उन डगालों से चिपक जाते। थोड़ी ही देर में दो लाख तोते उस बरगद के पेड़ पर बैठे और चिपक कर लटक गये और कुछ देर बाद वे जमीन पर आ कर गिर गये।
         कुछ समय बात उन तोतों का राजा बुद्वसेन उस बरगद के पास उड़ते - उड़ते आया और जैसे ही वह अपने घौसले में जाकर बैठा उसी समय उसके पंख और पैर उस चौप में चिपक गये। अब तोतों का राजा बुद्वसेन जोर - जोर से चिल्लाने लगा। वह रो - रोकर तड़फने लगा। जिससे उसके सभी तोता साथियों को पता चल गया की उसका राजा भी चौप में फँस गया है। जिससे सभी तोते सर्तक हो गये और धीरे - धीरे वे जमीन में लुढ़कते हुए वहां से भाग गये। कुछ देर बाद राजा बुद्वसेन फड़फड़ाता हुआ जमीन पर गिर गया।
        बूढ़े बैगा ने तोतों के राजा बुद्वसेन को जमीन में फड़फड़ाते देखा तो उसने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और उसके पीछे भागा और उसको पकड़ लिया। इसके बाद उस बूढ़े बैगा ने राजा बुद्वसेन से पूछा - तुमने अपने साथियों के साथ मेरे धान के खेत की पूरी धान क्यों खा ली। इसकी सजा यह है कि मैं तुमको मृत्यु दंड दूंगा। तब बुद्वसेन ने कहा - बैगा बाबा तुम मुझे मत मारो मैं तुम्हारे घर की रखवाली करुॅगा।
        बूढ़े बैगा ने उस तोते के राजा की बात मान ली और उसे अपने घर लेकर आ गया। जब बूढ़ा बैगा घर में आया तो उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या तुमने एक ही तोता को मारा है दूसरे तोते कहां गये? बूढ़े बैगा ने कहा- हां, एक ही तोता पकड़ पाया दूसरे तोते उड़ गये। बूढ़ी बैगीन बोली - मैं इस तोता को मार डालूंगी। इसने हमारे खेतों को बरबाद कर दिया है। इसके कारण हम लोग दाना - दाना को मोहताज हो गये हैं।
        तोतों का राजा बुद्वसेन उस बूढ़ी बैगीन से क्षमायाचना करके कहा-  दादी मुझे मत मारो। मैं तुम्हारे घर की रखवाली करुंगा। तब उस बूढ़ी बैगीन ने सोचा मेरे तो बाल - बच्चे नहीं हैं। क्यों ना मैं इसका अपने बच्चे की तरह पालन पोषण करु। फिर बूढ़े बैगा ने तोतों के राजा बुद्वसेन के लिए एक पिंजरा बनवाया और उसमें तोता को रख दिया बूढ़ी बैगीन रोज उस तोते को सुबह- शाम खाने के लिए चना की दाल और अच्छा - अच्छा खाना देने लगी। तोतों का राजा बुद्वसेन सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
        इस प्रकार तोतों का राजा बुद्वसेन को बूढ़े बैगा के पास रहते हुए दस वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन तोता ने अपने मालिक बूढ़े बैगा से कहा-  बाबा मुझे इस प्रकार से पिंजरा में रखने से आपको कोई फायदा नहीं। आप मुझे किसी शहर में ले जाकर बेच दो जिससे आपको धन प्राप्त होगा। तब बूढ़े बैगा ने कहा - बुद्वसेन तुमने तो बहुत अच्छी बात कही है। उसी समय बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी से पांच हाथ लंबी और पांच हाथ मोटी एक रोटी बनाने को कहा। उसकी पत्नी ने एक बड़ी रोटी तैयार कर दी। इसके बाद बूढ़े बैगा ने उस रोटी को एक कंबल में रखकर अपनी कमर में लपेट लिया तथा तोता के पिंजरा को अपने हाथ में रखकर शहर की ओर चला गया। रास्ते में उसको एक गाय चराने वाला अहीर मिला। जब उसने बूढ़े बैगा को सुआ ले लो, सुआ ले लो! कहते सुना तो उसने बूढ़े बैगा को अपने पास बुलाया और कहा - बैगा बाबा, यहां आना मुझको तुम्हारा सुआ खरीदना है। बूढ़ा बैगा तुरंत उस गाय चराने वाले अहीर के पास चला गया। अहीर ने कहा- बाबा इस तोता की कीमत क्या है। तुम इसको कितने में बेचोगे? तब बूढ़े बैगा ने कहा -मैं मोल भाव करना नहीं जानता तुम तोता से ही पूछ लो। उसकी कीमत। अहीर ने तोता से पूछा -क्यों तोता जी, आपकी कीमत क्या है? तो तोता ने कहा- मेरी कीमत पूरे एक लाख रुपया है। तब अहीर ने कहा - मेरे गृह में दरियाई घोड़े,गाय,बैल,भैंस और हजारों बकरियाँ हैं। उन सभी की कीमत भी जोड़ी जाये तो एक लाख रुपया नहीं होंगे। इसलिए मैं तुमको नहीं खरीद सकता। ऐसा सुनते ही बूढ़ा बैगा सुआ ले लो सुआ! बोलने वाला सुआ ले लो! कहते हुये आगे बढ़ गया।
        बूढ़ा बैगा शाम के समय उस राज्य के राजमहल के सामने से गुजरा। उस राज्य के राजा ने बैगा की आवाज सुनी तो उसने बैगा को अपने पास बुलाया और उस बैगा से पूछा - बैगा बाबा आपने इस पिंजरा में तोता रखा है क्या? बूढ़े बैगा ने कहा- महाराज जी, इसमें तोता ही है। तब राजा ने उस तोता की कीमत पूछी तो बूढ़े बैगा ने कहा - राजा जी, मैं इसकी कीमत नहीं जानता। आप इस तोते से ही उसकी कीमत पूछ लें। राजा ने तोता से पूछा- तोता राम आपकी कितनी कीमत है ? तो तोता ने कहा- राजा जी, मेरी कीमत पूरे एक लाख रुपया है।
        राजा जी ने उस बूढ़े बैगा को तुरंत एक लाख रुपया दे दिया। तब बूढ़े बैगा ने एक लाख रुपया अपनी कमर में लपेटने के लिए कंबल को खोला तो उसमें से रोटी गायब हो गई थी। क्योंकि बूढ़े बैगा ने उस रोटी को रास्ते में ही खा लिया था। तब उसने कंबल को खोला और उसमें रुपयों को रखकर उस कंबल को अपनी पीठ में बांध लिया और अपने घर की ओर चल दिया। बूढ़े बैगा ने उन एक लाख रुपयों से गाय,बैल,भैंस,बकरियाँ और घोड़े सहित बहुत सारा समान खरीदा और अपने घर वापस आ गया। अब वह बूढ़ा बैगा बड़ा आदमी बन गया था। पहले गाँव के लोग उसे भूमिया बैगा कहकर बुलाते थे पर उसके पास पैसा आने के बाद गाँव के लोग उसे पटैल और गाँव का मुकद्दम कहकर बुलाने लगे।
        तोतों का राजा बुद्वसेन राजमहल में एक लोहे के पिंजरे में रहने लगा। उस राजा की सात रानियाँ थी। राजा ने अपनी सातों रानियों को आदेश दिया कि प्रतिदिन एक रानी तोता को खाना देंगी। उस राजा की सातों रानियों में से छ: रानियों का स्वभाव अच्छा नहीं था! मात्र सबसे छोटी रानी का स्वभाव सबसे अच्छा था। तोता सभी रानियों के स्वभाव से परिचित हो गया था। इसलिये वह मात्र सबसे छोटी रानी के हाथ से ही खाना खाता था। वह खराब स्वभाव वाली छयों रानियों के हाथ से खाना नहीं खाता था। जब छयों रानियों ने देखा कि तोता सिर्फ  छोटी रानी के ही हाथ से खाना खाता है और बाकी रानियों के हाथ से रखा हुआ खाना को छूता भी नहीं है। तो रानियां उस तोता के ऊपर नाराज हो गई और छोटी रानी से जलने लगीं।
        राजा की छह रानियों ने नाराज होकर खाना- पीना छोड़ दिया और बीमारी का बहाना बनाकर अपने - अपने बिस्तरों में जाकर सो गई। रानियों ने राजा से अपना इलाज कराने के लिये गुनिया,पंड़ा और वैद्य बुलाने के लिए कहा। परंतु राजा यह जानता था कि तोता उन रानियों के हाथ से खाना - पीना नहीं करता! इसलिये वे नाराज होकर सो गई हैं। इसलिये राजा ने किसी गुनिया या वैद्य को नहीं बुलाया। रात को सभी छह रानियों ने तोता को मार डालने का विचार किया। जब सुबह हुई तो वे रानियां राजा के पास जाकर अपना इलाज कराने के लिये कहने गई। तब राजा ने उन रानियों से पूछा तुम लोग किस प्रकार की दवा से ठीक होगी। तब उन रानियों ने कहा- राजा जी, यदि हम लोगों को उस तोता का कलेजा और उसकी दो आँखें मिल जायेंगी! तो हम लोग स्वस्थ हो जायेंगी और हम लोग खाना भी खाने लगेंगी।
        तब राजा ने तुरंत एक सिपाही को बुलाया और उसे आदेश दिया कि तुम अभी जाओ और तोता को मारकर उसका कलेजा और दोनों आँखें लाकर रानियों को दे दो। सिपाही ने तोता का पिंजरा उठाया और उनकी आज्ञा का पालन करते हुए उस तोते के पिंजरा को बगीचा में लाया और तोता को बाहर निकालकर उसकी गर्दन दबाने लगा। उसी समय तोता ने सिपाही से अपने जीवन की रक्षा के लिए विनती की और कहा- सिपाही जी, आप मुझे जान से मत मारो। कभी राजा को फिर से मेरी जरुरत पड़ी तो तुम मुझे कहाँ से लाओगे? मैं तोतों का राजा हूँ! यदि तुमने मुझे मार दिया तो संसार के सभी तोते मर जायेंगे। तब सिपाही ने कहा - आप भी राजा हो, और वो भी राजा हैं! मैं किसका कहना मानूॅ। अब आप ही बताइये मैं क्या करुॅ! मैं अपने राजा की आज्ञा को कैसे पूरा करुॅ? तब तोता ने कहा- यह तो सबसे सरल बात है, तुम शहर में जाओ और वहां की प्रजा से कहो कि राजा ने प्रजा से पांच मुर्गो का इंतजाम करने के लिए कहा है। इसके बाद तुम पांच मुर्गों का शिकार करके खा लेना और एक मुर्गा की दो आँखें और उसका कलेजा निकालकर राजा को दे देना। राजा समझेगा की वह तोता का कलेजा और आँखें हैं। राजा उस कलेजा और आँखों को रानियों को खिला देगा। तोता का सुझाव सिपाही के समझ में आ गया।
         उस सिपाही ने बगीचा के एक बड़े पेड़ के ऊपर चढ ़कर पिंजरा को एक डंगाल में लटका दिया और पिंजरा का दरवाजा खोल दिया! जिससे तोता निकलकर पेड़ की एक डंगाल पर बैठ गया। तब सिपाही ने तोता से पूछा -क्यों तोता राम जी, जब राजा तुमको बुलायेंगे तब तुम वापस आ जाओगे की नहीं? तब तोता ने कसम खाकर कहा सिपाही जी,जिस दिन भी राजा मेरे को बुलायेंगे,उसी दिन मैं लौटकर आ जाऊँगा। इतना कहकर तोता उस पेड़ के ऊपर से उड़ कर आकाश की सैर करने लगा।
        वह सिपाही महल से निकलकर अपने दो साथियों के साथ शहर में आ गया। शहर में आकर उन सिपाहियों ने प्रजा के लोगों को एकत्र किया और कहा - राजा जी को पाँच मुर्गों की जरुरत है, आप लोग तुरंत पाँच मुर्गा लाकर दे दो। प्रजा ने जैसे ही यह आदेश सुना उन्होंने उन सिपाहियों को पाँच मुर्गा लाकर दे दिया। सिपाहियों ने अपने घर जाकर चार मुर्गों को पकाया और छक कर भोजन किया। इसके बाद पाँचवें मुर्गे का कलेजा और दो आँखें निकालकर एक पत्ता में रखकर राजमहल की ओर चल दिये।
        सिपाही जैसे ही राजमहल पहुँचा राजा ने पूछा - तुमने उस तोते को मार डाला कि नहीं? तब सिपाही ने कहा जी, महाराज मैंने उस तोते को मार डाला है,यह रहीं उसकी दोनों आँखें और कलेजा! राजा ने दोनों आँखें और कलेजा ले जाकर उन छयों रानी को दे दिया। छोटी रानी ने जैसे ही सुना की छयों दुष्ट रानियों ने तोता की हत्या करवा दी है। तो उसे बहुत दुख हुआ और दुख के कारण वह रोने लगी। परंतु छयों रानियाँ बहुत खुशी मना रहीं थीं।
          जबसे राजा ने तोता को महल से बाहर किया था। तबसे राजा के ऊपर मुसीबतें आने लगीं। कुछ दिनों में राजा बहुत गरीब हो गया। राजमहल के बाग - बगीचा सूख गये। उसके राजमहल का तालाब सूख गया। राजा ने अपनी रानियों की सुख सुविधा के लिए हीरा -  जवाहरात,सोना - चाँदी राज्य के सेठों को बेच दिये। एक दिन जब राजा बिलकुल गरीब हो गया और उसके पास खाने तक को आनाज नहीं था। तब एक दिन एक ब्राम्हण उसके पास आया और राजा से भिक्षा माँगने लगा,राजा ने कहा - महराज, मेरे पास तो खुद ही खाने का एक दाना नहीं है। मैं आपको भिक्षा कहाँ से दू? तब उस ब्राम्हण ने कहा- ऐसा कैसे हो सकता है, आप इतने बड़े राजा हो और आपके यहाँ खाने को नहीं है। यह सब कैसे हो गया? राजा ने कहा- मुझे खुद नहीं मालूम कि मैं अचानक इतना गरीब कैसे हो गया। उस ब्राम्हण ने अपनी पोथी निकाली! जिसमें भूत - भविष्य की जानकारी थी।
ब्राम्हण उस पोथी को पढ़ने लगा। कुछ देर बाद ब्राम्हण ने बताया कि राजा जी, आपके घर में एक तोता था। जिस दिन से वह घर से बाहर गया है। उस दिन से आपको गरीबी ने आकर घेर लिया है। आप अपने उस तोता को फिर से बुला लो तो आपके दिन फिर से पहले जैसे हो जायेंगे। परंतु आपकी रानियों का स्वभाव बहुत खराब है! सिर्फ  आपकी सबसे छोटी रानी का स्वभाव सबसे अच्छा है।
         राजा ने तुरंत अपने उसी सिपाही को बुलाया और कहा - तुम कहीं से भी उस तोता को लेकर आओ जिस को महल से ले गये। सिपाही ने कहा - महाराज मैं तोता को कहाँ से वापस लेकर आऊँ। आपने तो उसे मरवा डाला है। तब राजा ने कहा- मैं कुछ नहीं जानता, तुम कहीं से भी उस तोते को वापस लेकर आओ। मुझे उस तोते की बहुत जरुरत है,यदि तुमने उस तोते को वापस नहीं लाया तो मैं दंड स्वरुप तुमको फाँसी में चढ़वाकर अंधे कुआँ में फिकवा दूंगा। सिपाही ने जब राजा के यह वचन सुने तो वह घबड़ा गया और राजमहल के बगीचा के उस पेड़ के पास गया जहाँ पर उसने तोता का पिंजरा रखा था। जब सिपाही उस पिंजरा के पास गया तो उसने देखा कि वह पिंजरा तो खाली था। तोता खेतों में दाना चुगने कहीं चला गया था। सिपाही उसी पेड़ के नीचे बैठ गया और तोता की राह देखने लगा। वह एक माह तक तोता की राह देखता रहा पूरे एक माह बाद तोता उस पिंजरे के पास आया। सिपाही ने तोता को देखा और कहा तोता राम जी, आपको हमारे राजा जी ने याद किया है। तुम अभी इस पिंजरा में आ जाओ? जैसा तुमने मुझसे वायदा किया था।
        तोता ने कहा मैं पिंजरा में नहीं आता! राजा मुझे मार डालेगा। तब सिपाही ने कहा- तुम पिंजरा में आ जाओ, मैं वायदा करता हूँ कि तुमको कोई भी नहीं मारेगा। सिपाही ने बड़ी मुश्किल से तोता को पिंजरा में आने के लिए राजी किया। सिपाही पेड़ के ऊपर चढ़ा और जैसे ही तोता ने पिंजरा के अंदर प्रवेश किया सिपाही ने पिंजरा का दरवाजा बंद कर दिया और उस पिंजरा को पेड़ से नीचे उतार लिया। सिपाही तोता को लेकर जिस रास्ते से जा रहा था। उस रास्ते के तालाबों में पानी भर गया,उस राज्य के कुँआ पानी से लबालब भर गये। बगीचों में आम के वृक्ष हरे हो गये। सिपाही जब राजा के महल के पास पहुँचा उसके पहले ही रानियों के हीरा जवाहरात,सोना,चाँदी,रुपया - पैसा जो राजा ने खाना- पानी के लिये बेच दिये थे सभी राजमहल में आ गया। सिपाही ने तोता वाले पिंजरा को लाकर राजा के सामने रख दिया।
        राजा तोता को देखकर बहुत खुश हो गया। उसने तोता को अपने महल में जीवन भर के लिये रख लिया। राजा ने अपनी पाँचों दुष्ट रानियों को मरवा दिया। केवल सबसे छोटी रानी को जीवन दान मिला क्योंकि उसका स्वभाव सबसे अच्छा था।

गाड़ासरई,
जिला ड़िड़ौरी(म.प्र.)

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