इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2015

रामसिंह की मौत

हनुमान मुक्‍त

        सारे नगर में खबर फैल गई कि राष्ट्रपति अवार्ड प्राप्त रामसिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। खबर सुनकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिसे राष्ट्रपति अवार्ड प्राप्त हो चुका है, उस पर हाथ डालने की पुलिस ने हिम्मत कैसे दिखा दी। खबर से उन लोगों में भी दहशत फैल गई जिन्हें पूर्व में अवार्ड प्राप्त हो चुका था और वे भी दहशत में आ गए जो स्वयं के प्रोटेक्शन के लिए अवार्ड लेने की जुगत बैठा रहे थे।
        नगर के अच्छे व बुरे आदमी सभी घबरा गए। अच्छे इसलिए कि जिनको सरकार ने प्रमाण - पत्र देकर अच्छा व्यक्ति घोषित कर रखा है उसे ही पुलिस ने नहीं बख्शा तो बुरे आदमी जिन पर अभी किसी का वरदहस्त नहीं है, वे कैसे महफूज रह सकते हैं। आम व्यक्ति जो अच्छी व बुरी दोनों ही श्रेणियों में नहीं आता है वह सबसे अधिक भयभीत था। जब पुलिस अपने हमजोलियों के साथ ही ऐसा व्यवहार कर सकती है तो वे किस खेत की मूली हैं।
        पुलिस द्वारा गिरफ्तारी कोई सामान्य स्थिति में नहीं की गई। सारी परिस्थिति को नाटकीय बनाया गया। रामसिंह को नौकरी दिलाने से लेकर अवार्ड दिलाने तक में उसका पूरा योगदान रहा। रामसिंह का भी पीठ पीछा है। उसने कभी किसी से वादा - खिलाफी नहीं की। सबका हिस्सा सही समय पर पहुंचाता रहा है। जब ऊपर तक वह टाइम से पहुंचाता है तो नीचे वालों से भी टाइम से मिलने की अपेक्षा तो करनी ही पड़ती है, इसमें उसका क्या दोष? नीचे वाले समय पर मंथली नहीं पहुंचाएंगे तो सारा सिस्टम ही बिगड़ जाएगा। उसने सिस्टम को बिगड़ने से बचाने के लिए थोड़ी सक्ती क्या बरती कि आ गया झपेटे में। बेचारा रामसिंह।
       उसे जब राष्ट्रपति अवार्ड मिला था तब लोग लिफाफोंं से लेकर अटेचियों में भर -भरकर बधाई देकर गए थे। तब से लोगों को बधाई देने की और उसे लेने की आदत पड़ गई। दोनों हाथों से तालियां बज रही थी। इस हाथ ले उस हाथ दे, वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही थी। परिणामत: रामसिंह के पास अरबों की संख्या में बधाईयां हो गई। इसी का परिणाम था कि लोग ईर्ष्या से जल उठे और पुलिस को भरमा दिया। एक ईमानदार व्यक्ति सरकार की गलत नीतियों की भेंट चढ़ गया।
        मैं रामसिंह का सबसे बड़ा शुभचिंतक हूं। रामसिंह ने मेरे छोटे से लेकर बड़े तक बहुत से काम करवाए हैं। मैं रामसिंह को इस तरह बदनाम होते नहीं देख सकता था। मैंने अखबार में रामसिंह की तारीफ छपवा दी। तारीफ  का मजमून मैंने नगर के जाने - माने विद्वान खण्डेलवाल साहब से तैयार करवाया था। मैं जानता था कि बारह साल बाद घूरे के दिन भी फिरते हैं। रामसिंह के हालात भी हमेशा एक से नहीं रहेंगे।
        सुबह अखबार में छपा, मैं रामसिंह से मिलने थाने की ओर चल पड़ा। रास्ते में पुलिस की गाड़ी तेजी से थाने की ओर से आती हुई दिखाई दी। पीछे - पीछे एंबुलेंस आ रही थी। मैं तेजी से सड़क के एक ओर हटा। पास ही चाय की दुकान पर बैठे हरी काका से मैंने पूछा -  काका क्या बात है? पुलिस इतनी तेजी से कहां जा रही है। काका साश्चर्य मेरी ओर देखकर बोले - रामसिंह को अचानक दिल का दौरा पड़ा है, उसे अस्पताल ले गए हैं।
मैंने कहा - लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया?
काका बोले - तुम्हें नहीं पता, तुमने जो तारीफ  आज के अखबार में छपवाई है, उसके कारण रामसिंह को दिल का दौरा पड़ा है।
- काका मुझे बात समझ में नहीं आई कि रामसिंह को तारीफ  के कारण दौरा पड़ा है।
काका बोले - अखबार में उसकी तारीफ  को पढ़कर एक पुलिस वाले ने जाकर रामसिंह से कहा - रामसिंह,अखबार में तुम्हारी तारीफ छपी है। रामसिंह इसे सुनते ही बेहोश हो गया। हो सकता है उसने तारीफ का मतलब अपने उन कारनामों को समझ लिया, जिनके छपने से वह अब तक डर रहा था। वह छप गई।
मैं अपने - आपको रामसिंह का बड़ा गुनहगार मान रहा था। मेरे ही कारण रामसिंह की ऐसी हालत हुई है। मैं उसकी तारीफ  नहीं छपवाता तो उसकी ऐसी हालत नहीं होती। मैं दौड़ा - दौड़ा अस्पताल पहुंचा।
        वहां जाकर देखा कि रामसिंह के बीबी - बच्चे डॉक्टर से बार - बार पूछ रहे थे कि सर बचने के कोई चांसेज है क्या? उनके चेहरे को देखकर बिल्कुल भी नहीं लग रहा था कि वे चाहते हों कि रामसिंह जिंदा रहे। मैंने काका से पूछा - काका यह क्या माजरा है? काका बोले - बेवकूफ इतना भी नहीं समझता, रामसिंह मर जाएगा तो बीबी - बच्चों के शुभ दिन आ जाएंगे। बच्चों को नौकरी मिल जाएगी और सारी जायदाद के वे अकेले मालिक हो जाएंगे। वैसे भी मरे आदमी की ज्यादा जांच नहीं होती।
        इतने में डॉक्टर ने सूचना दी कि रामसिंह मर गया। सभी के चेहरों पर खुशी की लहर छा गई। घर वाले अंत्येष्टि की तैयारी करने लगे और मैं अपने को रामसिंह का हत्यारा मानते हुए वहां से मुंह छिपाकर खिसक लिया।
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