इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2015

मिल कर रहना और मुस्‍कुराना

प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव

        आखिर जिस बात का अंदेशा था वही हुआ। रमाकांत की मृत्यु के बाद उनके दोनों बेटों में ठन गई। माँ रेवती के लाख समझाने पर भी राधाकांत पिताजी की जायदाद के बँटवारे की बात करने लगा। छोटा बेटा कृष्णकांत वैसे तो खुलकर कुछ नहीं कह रहा था परंतु बड़े भाई के व्यवहार से दुखी होकर उसने भी बँटवारे के लिये हामी भर दी। मकान का बँटवारा हो गया चार - चार कमरे दोनों के हिस्से में आये। पीछे के आँगन के बीचों - बीच दीवाल खड़ी होने लगी। सामने के बरामदे को भी दो हिस्सों में बाँटने के लिये मिस्त्री काम पर लगा दिया गया। ऊपर का एक कमरा जो रमाकांत का स्टेडी रूम था, बँटने के लिये शेष रह गया था। दोनों भाई ऊपर पहुंचे,जहां दो अलमारियां रखी थीं। अलमारियों और उस कमरे का बँटवारा कैसे हो इस पर विचार हो रहा था। कृष्णकांत ने देखा कि पिताजी की एक अलमारी पर लिखा था मिलो और दूसरी पर लिखा था मुस्कराओ। उसे कुछ अजीब सा लगा। इसका मतलब क्या है वह सोचने लगा। वैसे तो बचपन से ही दोनों भाईयों में आपस में बहुत स्नेह था किंतु जैसे कि आजकल आम बात हो गई कि विवाह के बाद परिवारों में फूट पड़ जाती है,रमाकांत के बेटों के विवाह के बाद उनके परिवार को भी किसी आसुरी शक्ति की नजर लग गई थी। रोज कलह होने लगी। मनमुटाव बढ़ने लगा,जो चाय की प्याली में तूफान की तरह था। पिताजी के रहते तक अंगारे राख में दबे रहे किंतु उनके जाने के बाद लावा फूट पड़ा था।
        कृष्णकांत बोला- भैया मैं मिलो वाली अलमारी लूंगा।''
- ठीक है तो मैं मुस्कराओ वाली ले लेता हूं। '' राधाकांत कुछ सोचते हुये और मुस्कराते हुये बोला
- बहुत दिन बाद आपके चेहरे पर मुस्कान देख रहा हूं भैया,कितने अच्छे लग रहे हैं आप मुस्कराते हुये।'' कृष्णकांत ने हँसते हुये कहा।
        राधाकांत को हंसी आ गई। पिताजी ने अलमारियों पर यह क्यों लिखवाया। समझ में नहीं आया। वह कुछ सोचते हुये बोला '' मिलकर रहेंगे तभी तो मुस्करायेंगे। यही तो मतलब हुआ।'' कृष्णकांत जोर से खिलखिलाकर हंसने लगा और बड़े भाई के गले लग गया। राधाकांत भी मोम की तरह पिघल गया।
- '' पिताजी के विचार कितने ऊंचे थे।'' वह इतना ही कह सका। आंगन और बरामदे की आधी बन चुकी दीवारों को गिरा दिया गया है।

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