इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 29 अगस्त 2015

सुधर जाओ परसाई

शशिकांत सिंह शशि

        विचारों के उत्तर बंदूकों से दिये जा रहे हैं। सिद्धांतों की जगह संगीनें काम कर रही हैं। कलम को कंूद करने की कोशिश की जा रही है। सुधर जाओ परसाई। दूसरा कोई धंधा कर लो। कौन से लाल लगे हैं कलमगीरी में। मातादीन चांद पर गया क्या हो गया? भोलाराम के जीव को पेंशन मिली? नहीं न। मध्यवर्गीय कुत्तों ने तुम्हें ही काट लिया। बेकार दूसरों के फट्टे में टांग क्यो अड़ाते रहते हो।
        धर्म को मार्क्स ने अफीम कहा था। भूल गये। अफीम खाना अच्छी बात है क्या? अफीम से तौबा करो। व्यंग्य वुअंग लिखने की खुजली हो रही हो तो नेता, अभिनेता, जीजा, साली, पति - पत्नी टाईप लिख मारो। हर्रै लगे न फिटकरी और रंग चोखा। संसार भाड़ की ओर प्रस्थान कर रहा है। पेरिस को गुमान था कि वह शांति और सभ्यता का प्रतीक है। उसका गुमान भी इन काटूर्नोनिस्टों और व्यंग्यकारों ने तोड़ दिया। भाई लोगों ने उन्हें समझाया था कि हमसे पंगा मत लो। मजहब हमें सिखाता आपस में बैर रखना। कलम का गुरूर माने ही  नहीं। स्याही की ठसक भी बंदे का दिमाग कूंद कर देती है।
        एक दर्जन तो गोली से मारे गये। उनके आश्रित जीवन भर धीरे - धीरे मरेंगे। युग के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल गई है। आज यदि बुद्ध, नानक,कबीर या गलिब होते तो उनकी लाशें नहीं मिलतीं। कंपकपाती ठंड में, पिता की दवाई लाने, बेटा जाये न जाये लेकिन पीके फिल्म के पोस्टर फाड़ने दूने उत्साह से निकल पड़ा। फटा पोस्टर निकले चार सौ करोड़। धर्मांतरण पर दो टीमें काम कर रही हैं। एक मूक दूसरी वाचाल। वाचाल टीम बोलेगी। यदि औकात से अधिक बोल गई तो मूक टीम उस पर चूना फेर देगी। साधु - संत बच्चे मांग रहे हैं। महात्मा साक्षी हैं कि आदमी को चूहों की तरह बच्चे पैदा करना चाहिए। विवाह करने से पूर्व एप्रुवल लेना होगा नहीं तो आधे हिन्दू और आधे मुसलमान की फोटो भाई लोग छाप देंगे। केवल हिन्दू - मुसलमान की बात हो तो दुकानदारी चमकाने का पुराना धंधा मानकर एक दो व्यंग्य लिख लो कोई बात नहीं। मन की खुजली मिट जायेगी।
        मान्यवर यहां तो सांई और शंकर का मामला भी कांशी की अदालत में है। वही बैठे - बैठे बाबा पूरे हिन्दू समाज को हांक रहे हैं। गाय और गीता के दिन फिर गये। लोग बाग अफीम खा रहे हैं। बांट रहे हैं। बेच रहे हैं। आप कौन होते हैं, सरपंची करने वाले? कलमगीरी का शौक है तो माशुका के तीर - कमान सी भौहों पर भांजिये। होठों और गालों पर स्याही इन्वेस्ट कीजिये। आम के आम और गुठली के दाम। बहुत ही जोर की खुजली है तो दीवारों पर नारे लिखिये। मुहल्ले में जुलूश निकालिये। सांड को लाल कपड़ा दिखाने का युग नहीं रहा। सांड अब हमेशा सींग में तेल लगाकर ही घूमते हैं। विचारों का युग सम्पन्न हो गया। अब तो भाई साब कच्छप नीति ही सर्वोत्तम नीति हैं। अपनी खोल में छुपे रहो। भूख लगे तो गर्दन बाहर। गप्प से माल भीतर। आग लगे बस्ती में आप रहो मस्ती मे। ठिठुरते गणतंत्र पर कम ध्यान दो। श्रद्धा विकलांग है तो रहे दूसरी टांग बचाओ।

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