इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 31 अगस्त 2015

का हम छत्‍तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये खातिर ईमानदार हन

        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये के उदिम म महूं सामिल हो गेंव। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये सेती दू ठन बड़का - बड़का आयोजन करे रिहीस। एक रायपुर म अउ दूसर भिलई म। ये आयोजन म सामिल होय के घलोक मोला नेवता मिले रिहीस पर पहुंच नइ पायव। तीसर बड़का  आयोजन बिलासपुर म आयोजित करे गीस तिहां महूं संगी - संगवारी मन संग पहुंच गेंव।
        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये बर हमर भासनबाज नेता किसम के कलमकार अउ सासन सत्ता म बइठे नेता मन कतका ईमानदार हवे, मंय इही ल परखना चाहत रहेंव। पहिली तो मन म अइस कि दू दिन के भूंके म का वास्तव म छत्तीसगढ़ी राजकाज के भासा बन जाही। पर सिरिफ दू दिन के आयोजन के बात तब मोला समझ म अइस जब बिलासपुर म देखेंव कि छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर सकलाये लोगन मन कइसे सरकारी पइसा के धुर्रा उड़ावत हवै। जिंहा तक मंय समझथौं , ये दू दिन म जतका रुपिया बोहाये गीस ओतका रुपिया म कम से कम तीन ठन बेटी के बिहाव हो जातीस। छत्तीसगढ़ी के पन्‍द्रह - बीस ठन किताब छप जतिस।
        बिकसस तभे संभव होथे जब मुंहूं म पैरा गोंज के काम करे जाथे पर मंय देखेंव, छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर जुरयाये लोगन मन कार्यक्रम के जघा म बकर करिन, ठोसलगहा पेट भरिन, उचहा लाज म रुकिन, थैली भरिन अउ बिन डकार मारे लहुंट गे।
        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नई रिहीन। उन हर छत्तीसगढ़ अइन अउ छत्तीसगढ़ ल देख के उन ल लगीस होही कि छत्तीसगढ़ म बिकास के अपार संभावना हवै। उन हर तभे छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के नीयत बना लीन। उंकर नीति अउ नीयत साफ रहै के परिणाम, जइसे उन देश के प्रधानमंत्री बनीन, छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के घोषणा कर दीन। आज छत्तीसगढ़ म जउन बिकास अउ छत्तीसगढ़ के लोगन म बदलाव के रुप दिखत हवै ओहर सिरफ अउ सिरफ माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन आवै।
        जब छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के बेरा ये नइ देखे गीस कि कते क्षेत्र म साल - सागौन होथे। कते क्षेत्र म कोइला के भंडार हवै। कते मेर धान अउ कोदो - कूटकी होथे। सिरिफ इही देखे गीस कि कतिहा ले कतिहा तक छत्तीसगढ़ी बोलइया, समझइया मन बगरे हवै। इही ल निरधान करिन अउ उहें तक ल छत्तीसगढ़ राज म सामिल कर ले गीस।
        मतलब साफ हवै - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली के निरधान होइस फेर छत्तीसगढ़ राज बर क्षेत्र के निरधान करे गीस। अतका सब कुछ होय के बाद भी हम मन ल आज छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा देवाये खातिर काबर आयोजन करे के जरुरत होवत हवै? हमला आत्ममंथन करे ल पड़ही,आत्मचिंतन करे ल परही का हमर नीति अउ नीयत साफ हवै या फेर हमर नीति अउ नीयत म खोंट हवै?
        आज छत्तीसगढ़ के बड़का - बड़का पद म ओमन बिराजमान हवै जउन मन के खानदान न कभू छत्तीसगढ़ी पढ़े होही, न लीखे होही मंय तो कहिथौं कतको झन के खानदान छत्तीसगढ़ी बोले घलक नइ होही? अइसन मन काबर छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनन दीही? कहूं अइसन आयोजन उंकरे मन के खेल तो नोहय?
गांव म खेल देखाये सेती मदारी आथे। डमरु बजाथे। गाँव वाले मन जुरिया जाथे। मदारी खेल देखाथे। गाँव वाले मन तारी पीटथे। रुपिया दू रुपिया सकेल के मदारी चले जाथे। कहूं हम मन घलक अइनेच तो नइ करत हवन? हम मन ल सोचे ल परही, गुने ल परही ....। 
सम्‍पादक

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