इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

सोमवार, 31 अगस्त 2015

का हम छत्‍तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये खातिर ईमानदार हन

        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये के उदिम म महूं सामिल हो गेंव। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये सेती दू ठन बड़का - बड़का आयोजन करे रिहीस। एक रायपुर म अउ दूसर भिलई म। ये आयोजन म सामिल होय के घलोक मोला नेवता मिले रिहीस पर पहुंच नइ पायव। तीसर बड़का  आयोजन बिलासपुर म आयोजित करे गीस तिहां महूं संगी - संगवारी मन संग पहुंच गेंव।
        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये बर हमर भासनबाज नेता किसम के कलमकार अउ सासन सत्ता म बइठे नेता मन कतका ईमानदार हवे, मंय इही ल परखना चाहत रहेंव। पहिली तो मन म अइस कि दू दिन के भूंके म का वास्तव म छत्तीसगढ़ी राजकाज के भासा बन जाही। पर सिरिफ दू दिन के आयोजन के बात तब मोला समझ म अइस जब बिलासपुर म देखेंव कि छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर सकलाये लोगन मन कइसे सरकारी पइसा के धुर्रा उड़ावत हवै। जिंहा तक मंय समझथौं , ये दू दिन म जतका रुपिया बोहाये गीस ओतका रुपिया म कम से कम तीन ठन बेटी के बिहाव हो जातीस। छत्तीसगढ़ी के पन्‍द्रह - बीस ठन किताब छप जतिस।
        बिकसस तभे संभव होथे जब मुंहूं म पैरा गोंज के काम करे जाथे पर मंय देखेंव, छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर जुरयाये लोगन मन कार्यक्रम के जघा म बकर करिन, ठोसलगहा पेट भरिन, उचहा लाज म रुकिन, थैली भरिन अउ बिन डकार मारे लहुंट गे।
        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नई रिहीन। उन हर छत्तीसगढ़ अइन अउ छत्तीसगढ़ ल देख के उन ल लगीस होही कि छत्तीसगढ़ म बिकास के अपार संभावना हवै। उन हर तभे छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के नीयत बना लीन। उंकर नीति अउ नीयत साफ रहै के परिणाम, जइसे उन देश के प्रधानमंत्री बनीन, छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के घोषणा कर दीन। आज छत्तीसगढ़ म जउन बिकास अउ छत्तीसगढ़ के लोगन म बदलाव के रुप दिखत हवै ओहर सिरफ अउ सिरफ माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन आवै।
        जब छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के बेरा ये नइ देखे गीस कि कते क्षेत्र म साल - सागौन होथे। कते क्षेत्र म कोइला के भंडार हवै। कते मेर धान अउ कोदो - कूटकी होथे। सिरिफ इही देखे गीस कि कतिहा ले कतिहा तक छत्तीसगढ़ी बोलइया, समझइया मन बगरे हवै। इही ल निरधान करिन अउ उहें तक ल छत्तीसगढ़ राज म सामिल कर ले गीस।
        मतलब साफ हवै - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली के निरधान होइस फेर छत्तीसगढ़ राज बर क्षेत्र के निरधान करे गीस। अतका सब कुछ होय के बाद भी हम मन ल आज छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा देवाये खातिर काबर आयोजन करे के जरुरत होवत हवै? हमला आत्ममंथन करे ल पड़ही,आत्मचिंतन करे ल परही का हमर नीति अउ नीयत साफ हवै या फेर हमर नीति अउ नीयत म खोंट हवै?
        आज छत्तीसगढ़ के बड़का - बड़का पद म ओमन बिराजमान हवै जउन मन के खानदान न कभू छत्तीसगढ़ी पढ़े होही, न लीखे होही मंय तो कहिथौं कतको झन के खानदान छत्तीसगढ़ी बोले घलक नइ होही? अइसन मन काबर छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनन दीही? कहूं अइसन आयोजन उंकरे मन के खेल तो नोहय?
गांव म खेल देखाये सेती मदारी आथे। डमरु बजाथे। गाँव वाले मन जुरिया जाथे। मदारी खेल देखाथे। गाँव वाले मन तारी पीटथे। रुपिया दू रुपिया सकेल के मदारी चले जाथे। कहूं हम मन घलक अइनेच तो नइ करत हवन? हम मन ल सोचे ल परही, गुने ल परही ....। 
सम्‍पादक

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