इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2015

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

अधभरी गगरी

        कमल मेरा नया - नया दोस्त बना है। दसवीं में तीन बार फेल है। बेकारी में घूम रहा है लेकिन शेखी बघारना उसकी फितरत है। कल मिला तो उसने बेझिझक होकर अपने नाना, दादा, मामा और चाचा के पुल बाँधने शुरू कर दिए। कहने लगा- दोस्त, मेरे नाना जी इतने सुन्दर थे कि अंग्रेज युवतियाँ गोपियों की तरह उनके आगे- पीछे डोलती फिरती थीं। जब उनका ब्याह हुआ था तो एक अंग्रेज युवती ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। मेरे दादा जी की योग्यता का कहना ही क्या! वह अंग्रेजी बोलते थे तो अंग्रेज वाह - वाह कह उठते थे। कई अंग्रेज उनके मित्र थे। सबका यही कहना था, अंग्रेजी बोलने में आपका जवाब नहीं है। अंग्रेज होते हुए भी हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते हैं। मेरे मामा जी तो रईस थे, रईस। कई राजे - महाराजे और नवाब उनका हुक्का भरते थे। उनसे मिलना जुलना वे अपना सौभाग्य समझते थे। मेरे चाचा जी ने अंग्रेजी, संस्कृत और इतिहास में तीन - तीन एम. ए. कर रखे थे। सरकारी विभाग में सीनियर एड्वाएज़र थे। पांच हजार उनकी मंथली इनकम थी। मैं तब की बात कर रहा हूँ जब भारत के दो टुकड़े नहीं हुए थे। पंजाब का गवर्नर उनकी योग्यता का सिक्का मानता था। मेरे दोस्त, मेरे नाना, दादा हों या मामा, चाचाए खूबियाँ ही खूबियाँ थी उनमें।
- बहुत खूब, कोई अपनी खूबी भी सुनाए मेरे दोस्त।
        मेरी बात सुनते ही कमल बहाना बना कर खिसक गया।

2 वक्‍त वक्‍त की बात
 
         सरिता अरोरा की देवेन्द्र साही से जान - पहचान कॉलेज के दिनों से है। कभी दोनो में एक - दूसरे के प्रति प्यार जागा था। आज देवेन्द्र साही का फिल्म उद्योग में बड़ा नाम है। उसने एक नहीं, तीन - तीन हिट फिल्में दी हैं। उसकी फिल्में साफ़. सुथरी होती हैं। सरिता अरोरा के मन में जागा कि क्यों न वह अपनी रूपवती बेटी अरुणा को हेरोइन बनाने की बात देवेन्द्र साही से कहे। मन में इच्छा जागते ही उसने मुम्बई का टिकेट लिया और जा पहुँची अपने पुराने मित्र के पास।
         देवेन्द्र साही सरिता अरोरा के मन की बात सुनकर बोला - ये फिल्म जगत है। इसके रंग - ढंग निराले हैं। सुनोगी तो दांतों तले उंगलियाँ दबा लोगी। यहाँ हर हेरोइन को पारदर्शी कपड़े पहनने पड़ते हैं।
कभी - कभी तो उसे निर्वस्त्र ........
- तो क्या हुआ, हम सभी कौन से वस्त्र पहन कर जन्मे थे? सभी इस संसार में नंगे ही तो आते हैं .......।
         सरिता अपनी बात कहे जा रही थी और देवेन्द्र साही सोचे जा रहा था कि यह वही सरिता अरोरा है जो अपने तन को पूरी तरह से ढक कर कॉलेज आया करती थी।
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Coventry, CV2 5EB, UK
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