इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

दो गजलें : इब्राहीम कुरैशी

1
कहाँ जा रहे हो, अकेले अकेले
हैं हम भी अकेेले, हमें भी साथ ले ले।
हैं एक ही मंजिल, तो साथ चलें हम
न मैं तुझसे आगे, न तू मुझसे पहले।
ये जगमग महफिल, ये दिलकश नज़ारे
छलते हैं लोगों को दुनियाँ के मेले।
जग में जब आया , तो मासूम था मैं
फिर मैं था तन्हा, और लाखों झमेले।
जीवन सभी को, कुछ ऐसे मिला है
भोगा किसी ने, किसी ने है झेले
मोहब्बत की कोई, हद तुम बता दो
कि जन्मे कहाँ, और कहाँ तक वो फैले।
जुल्म को जब भी, ललकारा मैंने
अक्सर कहा सबने, चुपचाप सहले।


हालात है खराब, खुदा खैर करे आज
उठने को है नकाब, खुदा खैर करे आज
जैसे भी कट गई, कल तक ये जिन्दगी
अब आएगा इंकिलाब, खुदा खैर करे आज
हर ओर उठ रहे हैं, सवालात बेशुमार
क्या देंगे वो जवाब, खुदा खैर करे आज
शोलों की दोस्ती का, कुछ ऐसा हुआ असर
शबनम बनी है आग, खुदा खैर करे आज
महफिल में सब मिले, अफसोस न मिल सके
कोई शर्म न हिज़ाब, खुदा खैर करे आज
दुनियां से मय के बादल, कुछ इस तरह उठे
अब बरसेगी बस शराब, खुदा खैर करे आज
लुटने का काम रहबर, अंजाम दे रहे हैं
और मुहाफिज बना कस्साब खुदा खैर करे आज
ऐ आवाम तूने उसको पैदा किया तो क्या
नेता तुझसे है नाराज़, खुदा खैर करे आज
उम्र भर सज्द़े किए, और इनाम की घड़ी में
मिलने को है अज़ाब, खुदा खैर करे आज
बड़े शौक से किए थेे, तेरी रहगुजर को रौशन
अब बुझ रहे चिराग,खुदा खैर करे आज

पता
स्टेशन रोड, महासमुन्द ( छ.ग.)
पिन : 493445 मो. 08982733227

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