इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 9 नवंबर 2015

मुक्‍तक : पं. गिरिमोहन गुरू ' नगरश्री '

पं. गिरिमोहन गुरु '' नगरश्री''

मिलन के लिए स्मरण भी जरूरी
बिरह की अनोखी जलन भी जरूरी
मुझे एक दिन दार्शनिक ने बताया
जनम के लिए है मरण भी जरूरी
*
हर हवा के साथ लहराता रहा हूं
हर घटा के साथ ही गाता रहा हूं
ठोकरों ने हौसला मेरा बढ़ाया
मुश्किलों में मुस्कराता ही रहा हूं
*
सूर्य की आग में जलकर देखा
चाँद की छाँव में पलकर देखा
कहीं आराम न मिला पल भर
जाम के साथ में ढल कर देखा
*
दर्द दिल में मगर गाता है
न जबीं पर ही शिकन लाता है
वही इंसान जिया है जग में
चोट खाकर जो मुस्कराता है
*
गुन गुन करते रहते भ्रमर नहीं थकते
पिउ पिउ करते चातक मगर नहीं थकते
रोते रहने से आँखें दुखने लगती है
कितना ही मुस्काओं अधर नहीं थकते
*
शामे गम को सहर किया मैंने
पत्थरों को भी जर किया मैंने
लोग अमृत के लिए मरते हैं
जिन्दगी का जहर पिया मैंने

नर्मदा मंदिरम गृह निर्माण कालोनी
होशंगाबाद म.प्र.

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