इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

गजल : जगन्‍नाथ ' विश्‍व '

जगन्‍नाथ '' विश्‍व''
1. होना चाहिए था
जो कुछ हुआ नहीं होना चाहिए था
हुआ उसके बाद रोना चाहिए था
यूं भी भीड़ भाड़ में कर रहे क्या
आपको मंच पर होना चाहिए था
भिक्षा के बहाने बुन रहे छल छंद
कटोरा हाथ में होना चाहिए था
जग में जैसी करनी वैसी भरनी
दामन लगे दाग, धोना चाहिए था
मुर्दे की बपौती बटोरने के लिए
थोड़ा तो रोना - ढोना चाहिए था
बिस्तर से उठकर लो खड़े हो गये
हुआ है वही जो होना चाहिए था

2 . मालुम था

आहिस्ते आहिस्ते रिझाओगे, मालुम था
नित नई कामनाएँ जगाओगे, मालुम था
किसे चाहत नहीं होती ऊँचे अरमान की
पंख निकलते ही फड़फड़ाओगे, मालुम था
निर्भिक गर्वीले गौरवशाली तो थे, फिर भी
तुम उपभोक्ता वस्तु बन जाओगे, मालुम था
झूठी मृगतृष्णां के चक्कर में क्षत - विक्षत
देख खुद घबरा जाओगे, मालुम था
अबोध उड़ाते रहे तुम्हें पतंग की तरह
एक न एक दिन कटके गिर जाओगे, मालुम था
नौ दिन चले ढाई कोस, रहे वहां के वहां
जर्जर कश्ती में डूब जाओगे, मालुम था

पता
'' मनोबल'' , 25, एम आई जी
हनुमान नगर, नागदा जं. म.प्र. - 456335
मो. 09425986386,07366241336

jagannathvishwa@gmail.com
www.jagannthvishwa.com

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