इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 9 नवंबर 2015

उसकी अतलांत गहराईयों में

रोजलीन

जिससे
करती हूं प्रेम
टूट - टूट कर
लगता है
कि जैसे
उससे प्रेम नहीं करती
जिसके लिए
तड़प कर
रो पड़ती हूं
किसी भी क्षण
कई बार
लगता उससे प्रेम नहीं करती
जिसे नजर
देखने भर के लिए
कितनी ही नदियां
कितने ही प्रांत
कितने ही देश - द्वीप
कर सकती हूं पार
लगता है कि जैसे -
उसी के निकट बैठ
हो जाती हूं
रिक्त
एकांत
और
खो जाता है वही
फिर मुझसे
जिसके लिए उठाए इतने जतन
कि वो
बन जाता है मेरे लिए
एक अनदेखी - अनछुई
अदभुत, अपूर्व
कोई विराट दुनिया
जिसके भीतर
बिना यह सोचे
पूरी ताकत से कूद जाती हूं मैं
कि मुझे
तैरना भी आता है
कि नहीं ...
मैं खोजती हूं
उसकी अतलांत गइराईयों में
उसके ही अस्तित्व का
एक निर्मल कोना
जहां बैठकर लेनी है मुझे
चैन की एक लंबी नींद

पता
13 बी, एच.ए.पी. मधुबन
करनाल (हरियाणा)132037
मोबा. 09467011918 

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