इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

विस्‍थापित

कामिनी कायामनी

          मँह मँह करता केवड़े की मदमाती खुशबू से ओसारे से लेकर कमरे तक की हवा मदहोश सी होकर नृत्यरत हो गई थी। इस हिरण्यमयी कस्तूरी सुगंध को भरपोख अपने नथुनों में समेटती हुई छोटे बाब्ड बालों को ढकने के लिए सिर का पल्ला सहेजते हुए इस स्वर्गिक खुशबू के स्त्रोत को जानने की जिज्ञासा में जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा भीमशंकर ...एकदम सूटेड बूटेड होकर बाजार के लिए प्रस्थान कर रहे थे। बोक के चमचमाते जूते, लीकूपर के जीन्स, एलेनसोली के शर्ट,मैंगो के चश्मे,भौजी आपको भी कुछ मँगवाना हो तो बोलिए बाजार जा ही रहा हूँ। निर्लज्जता भरे चेहरे पर जड़े होठों से शब्द ऐसे फूटे थे मानो कहकहा लगाते हुए कह रहें हों कि आप लोगों की परवाह करता ही कौन है। सामने पड़ गईं इसलिए पूछ लिया। मैं तो रानी साहेब के करीब का आदमी। पल भर में वह खुशबू कार्बन मोनोक्साइड में बदल गया जैस - माधवी का दम घुटने लगा। उस जहरीली हवा से नजात पाने के लिए साड़ी का पल्ला नाक पर रखते हुए बड़े ही नाटकीय अंदाज में सिर हिलाकर मना करते हुए आंगन से होते हुए पिछवाड़े की खुली हवा में साँस लेने चली गई थी। धान कटनी शुरू हो गया था। आंगन के बीच में और पछवरिया ओसारे पर मिट्टी के चार चुल्हिया बनाए गए थे। कनस्तर भर भर कर धान चूल्हों पर चढ़ाए जा रहे थे। नीचे से खर पतवार की आग उबाल आ जाने पर वहीं बैठी मजदूर महिलायें अपने कार्य कुशल हाथों में कपड़े पकड़ तड़ातड़ उसे नीचे आंगन ओसारे में पलटती जा रही थी। उसना चावल के लिए धान का उबालना जरूरी होता है। इस बार धान भी कम ही हुआ है। चारों तरफ  बाढ़ ने तांडव जो मचा दिया था। मजदूर तो वैसे ही दूज के चाँद] अब वो भी दुर्लभ। जो पहले यहाँ रहते थे, अब वो वो नहीं, बदल गया सब कुछ। महानगरों की कमाई ने उन्हें भी सपने देखने के काबिल बना दिया। मात्र सपन दिवा स्वप्न,और कुछ नहीं। फुटपाथ के कपड़े और नकली कैसेट से उनके बस्तियों की रौनक देखते ही बनतीं थी। गयी रात तक पुरानी फिल्मों की वे गीतें जो कभी संपन्न छतों वाले घरों की शान हुआ करती थी। आज वहाँ से रूठ कर यहाँ इन बस्तियों में इठलाने लगी हैं। छू लेने दो नाजुक ।  गीत .. अभी बज ही रहा था कि बिजली चली गई थी। मगर संगीत थमने से गाँव की जिन्दगी नहीं थमती। सूरज की हल्की हल्की गरमी को सम्पूर्ण आत्मसात करने के लिए अपने अपने घरों से बाहर विभिन्न मुद्राओं में बैठे हुए लोग। कोई चारपाई पर लेटा। कोई चटाई पर। कुछ ने चौकी स्थायी रूप से बाहर धूप में रख दिये थे। कौन रोज रोज घर से निकालने रखने का जहमत मोल ले।
          बहुँए ऑगन में अपने - अपने घरों की छतों पर रसोई का काम निबटा नूबटा कर बैठने की चाहत लिए आ खड़ी होती मगर धूप तब तक उन्हें चकमा देकर दूर पास के ताड़ के पेड़ों के पीछे छुपता नीचे की ओर धीरे धीरे सरकने लगता, मानो कह रहा हो तुम्हारे काम खतम होने तक मैं भला कैसे अविचल खड़ा रह सकता हूँ।
अमराईयों से झाँकने लगी थी ठंढी - ठंढी अतीत। तब यह गाँव कुछ ज्यादा ही हरा भरा दिखता था। जब माधवी ब्याह कर आई थी। चारों तरफ  मुंड ही मुंड, नई नवेली बहू की गाड़ी घेरकर खड़ी। बाद में सुना था उसने- शहर की डिस्को कनियाँ बिना घूंघट के आ रही है और इस अप्रत्याशित दृश्य को बच्चे से लेकर वृद्ध तक अपनी आँखों से देखकर स्मृति पटल पर रेखांकित करने के लिए व्यग्र ... तो इस ख्वाहिश में... जैसे ही गोधुली बेला में गाड़ी की आवाज के साथ आनंदातिरेक में बच्चों की समवेत आवाजें गूँजी कनिया आ गई।  महिलाओं का उत्साह सीमा तोड़ गया था।  बड़की काकी लकड़ी के चूल्हे पर मछली तल रही थी। कड़ाही उतार जलती आग छोड़ दौड़ी दरवाजे की ओर। साहरवाली काकी अपने छोटे नाती को लोरी गा गा कर पालथा झूला झूला कर सुला रही थी। नाती चीख - चीख कर अपना गला फाड़ता रहा। नानी के पाँव में तो जैसे पहिए लग गए थे। लुढ़कते चले गए दरवाजे की ओर। बिमला पीसी पीतल के बड़े से थाल में सांझ का दीपक जलाने की तैयारी में लगी थी धूप बाती,तेल, माचिस,सब वैसे ही छोड़कर दौड़ पड़ी थी।
          इस अपरिचित अन्जान माहौल में गाड़ी में बैठी माधवी के कान में खूब तेज आवाज बंदूक की गोली की तरह चीरती हुई बड़े वेग से घुस गई थी - भायजी माँ कहलक चादरि से सौंसे गाड़ी के झाँपि दियौ। बाद में पता चला बड़ी वाली ननद थी। जब तक सासुमाँ आती गाड़ी से उतार रस्म रिवाज निभाने, तब तक कहीं उनकी नवेली बहु लोक समाज का व्यर्थ के मनोरंजन का कारण न बन जाय। माँजी अपने हाथ में पीतल के बड़े से लोटे में जल और एक मुठ्ठी में गुड़ लेकर पधार चुकी थी। मगर भीड़ थोड़ी निराश होकर छँटने लगी थी। जो सोचा सुना नहीं मिला। कनिया तो बित्ते भर की घूँघट में सहमी सिकुड़ी मुड़ी झुकाए हुए बैठी थी। दरअसल किसी ने उड़ा दिया था - शहर की है, गाड़ी के छत पर बिना घूँघट के नाच करती आयेगी। ससुर से अंग्रेजी में बात करेगी। यह अफवाह इसलिए उड़ गई थी - शादी के बाद बारात के सामने कनिया का मुँह दिखाई रस्म निभाते समय बड़ी दीदी ने उसके सिर पर बड़ा सा घूँघट नहीं खींचा था सिर्फ  माँग टीका तक पल्ल़ू और बाद में चिनगारी वहीं से उड़ती हुई ज्वाला बनकर गाँव में धधकने लगी थी। इतने बड़े अधिकारी की बेटी। इतना बड़ा सरकारी कोठी,क्या निभा पाएगी गाँव की मान मर्यादा।
           आज इतने साल बाद भी ससुराल के गाँव की सीमा पर आते ही उसके सिर का पल्लू एक बित्ते लंबे घूँघट में बदल जाती ह़ै। खैर, अब तो गाँव में भी कहाँ घूँघट और कौन सी मान मर्यादा। सास ससुराल वालों को बात - बात पर उनकी औकात बता कर पढ़े - लिखे होने का दर्प दिखाते हुए आधुनिकता के तराजू पर अपने को तौलती हैं। वे जिस दुनिया में जी रही हैं, वहीं सत्य है। यहाँ की लड़कियाँ अब घरेलू कार्य में कम ब्युटि पार्लर में ज्यादा रमी रहती हैं। आश्चर्य हुआ उसे यह देखकर कि जाँता चक्की पीसते समय जिन महिलाओं के मधुर संगीत से घर आंगन में एक नवीन ऊर्जा पैदा कर देती थी उनकी बेटियाँ काम काज से विमुख, आधुनिक पढ़ाई के नाम पर स्कूल कालेज के रजिस्टर पर बस एक नाम भर रह गई है। स्कूल का तो यदा कदा मुँह देख भी लिया मगर कालेज कहाँ। लेकिन सब की सब बी.ए. है। एम.ए. है कुछ के पास बी.एड की डिग्री भी है। ये मेहरबानी क्यों की गई,तो शोध करने से पता चला कि आजकल शादी विवाह में लोग दहेज के साथ कन्या की डिग्री भी चाहते है। ये कन्यायें पैरवी पैगाम के बाद जब कभी सरकारी स्कूलों में नौकरी पा जाती तो घर बैठे कमाई का एक जरिया अब बेरोजगार पुरूषों से पहले महिलाओं को नौकरी जो मिलने लगी है। भविष्य की चिन्ता से उन्मुक्त ये बालायें अंधेरे बंद कमरों में रखे टीवी सिरियलों में सास बहु सीरियल देखने में व्यस्त। हकीकत से बेहद दूर, कल्पना में मस्त।
          बिजली यहाँ दिन भर आती जाती रहती है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में तो सरकार खेती बाड़ी के नाम पर कम लागत में बिजली मुहैया करने का वादा करती रही है। माधवी के जिज्ञासु प्रवृति को शांत करते हुए पवनजी ने बताया था - भौजी, सरकार तो बिजली देती भी है,मगर बेरोजगारी पता है न आवश्यकता आविष्कार की माता। गाँव के कुछ नौजवान, जो महानगरों की झुग्गियों फूटपाथों की गरम - गरम हवा खाकर लौटे हैं। वे अपने साथ घर बैठे कमाने का कुछ सौ प्रतिशत कामयाब धंधा भी हाथ में लेकर आये हैं। संध्या ठीक छै बजे तक ये लोग बिजली का लाईन काट देते हैं। और अपना जेनेरेटर का धंधा चालू करते हैं। एक बल्ब नब्बे रूपए महीना। लाइट आती है रात के ग्यारह बजे दिन में कभी पूरे कभी अधूरे। माधवी पवनजी का मुँह ताकती रह गई थी। भोले - भाले निर्दोष लोग समय के हाथ कितने मक्कार हो गए हैं। सर्र - सर्र चलती सरसों के पीले फूलों से सजी खेतों के धान और गेहूँ के स्वर्णिम बालियों को झुलाती हुई हवा तो अभी भी विषाक्त नहीं हुई थी, मगर काले धंधों की महिमा से लोग अच्छी तरह वाकिफ  होने लगे थे।
          वैसे धक्कम - धक्का,धूऑ तेज रफ्तार बिजली और पानी के साथ एक अदद छत की किल्लत वाले शहर से घूमकर वापस गाँव का सीधा सरल रास्ता अख्तियार करने बहुत कम ही लोग जाते हैं। मगर जो आ जाते हैं उनकी तो चाँदी है। सिंहासन खाली है। आओ, राज करो। थोड़ी सी बुद्धि लगाओ, फिर देख तमाशा। अकेलेपन का दंश झेल रहे वृद्धों के लिए यही क्या कम है कि पाँच में सात में कोई एक तो इनके पास आ गया रहने के लिए। गंगा की उपजाऊ मिट्टी ने ऊपजना थोड़े ही छोड़ दिया है। फसलें देखरेख के अभाव में भले ही कम हों पर होती तो हैं।आम लीची के मौसम में बौरा - बौरा कर चारों ओर अपनी सुरभि फैला कर पेड़ फलते हैं। अब जो वहाँ हैं उन्हें ही इसके रसास्वादन का मौका मिलेगा न।
          इतने बड़े घर में अब माँजी अकेली रह गई हैं। सांझ होते ही पिछवाड़े के ताड़ वृक्ष से लुढ़कता हुआ भयानक सन्नाटा झपटने के लिए दौड़ता है। दिन तो टोल महल्ले खेत खलिहान,बाग - बगीचा, पशु - पाखी के साथ फुर्र - फुर्रर् उड़ता हुआ जीवन पथ को सुगम बना जाता,मगर रातें .... दर्द से भरे सहस्त्रों पोथा खोले हुए। कितने - कितने रिश्तों का हिसाब किताब। अतीत के पिटारे से शोर मचाती हुई परछाईया, अठ्ठहास करती विडंबना, चारों ओर थिरकने लगती। मन घायल - घायल होकर भीषण आर्त्तनाद करने लगता। प्रलय के समान हो जाते समय कितनी रातें आँखों में कट जाती,मगर वक्त की सूई पीछे नहीं मोड़ी जा सकती। असाध्य गठिया रोग सर्दियों में जान तो नहीं लेता था मगर काश कि जान ही ले लेता। कभी चापाकल के पास गिर पड़ती। कभी आंगन में तब कामवाली के कंधों पर सिर रखकर बिलख - बिलख कर अपने दुर्दान्त अकेलेपन का रोना रो लेती।
          वैसे तो हाथ में मोबाईल फोन था। दिन में दस बार बच्चे फोन कर लेते। महिने दो महिने पर कोई न कोई संतान ऑफिस से छुट्टी लेकर माँ को देखने आ ही जाता। ऐसा कोई भी पर्व त्योहार नहीं जब उनके घर में कोई मौजूद न हो। आसपास रहने वाले रिश्तेदार, भाई - बहन भी अक्सर ही आते ही रहते थे। मगर इतने बड़े भरे पूरे परिवार में पचासों वर्ष जीवन व्यतीत करते - करते अचानक बाबूजी के साथ छोड़ दिये जाने से माँजी नितांत अकेली हो उठी थीं। हालांकि गठिया के अलावा और कोई बीमारी नहीं थी। लंबी - चौड़ी काया ठसकेदार आवाज। पैंसठ की होकर भी पैंतालिस से ज्यादा की नहीं लगतीं। एकदम काले बाल में अब कहीं - कहीं से सफेदी झलकने लगी थी।
          बाबूजी का पेंशन ,शहर के मकान का किराया। बढ़िया उपजा बाड़़ी। उनके पास भला संबंधियों की क्या कमी रहती। बाबूजी के समय में ही, जब सभी बच्चे अपने पाँव पर खड़े होने शहर की ओर पलायन कर गए थे,मौसी अपने बड़े - बेटे भीमशंकर को लाकर माँजी के चरणों में समर्पित कर दिया था - इसको भी मनुख बना दो। इतना क्रोध झाड़ पात नोंचने लगता है। भाला बरछी निकाल लेता है। बाप को तो देखना नहीं चाहता है। गाँव भर में खिस्सा बाप बेटा में उठापटक पिता ने जहर खा लिया। वो तो मौसी का तकदीर ठीक था कि समय पर पास के अस्पताल ले जाने से बच गए।
          तो चौदह बरस के भीमशंकर अपने मौसा के घर में टहल टिकोरा करते हुए,दो चार बार वहाँ से भागने के पश्चात भी किसी तरह खींच तान कर प्राइवेट से बी. ए. पास कहलाने लगे थे। स्वभाव तो क्या बदलता क्रोध को दबाने के लिए- बोली व्यवहार सिखाने के लिए टोल के लोग के साथ गाँव के लोग भी शामिल हो गए थे। माँजी ने डपट कर कहा था एना जे रस्ता पेड़ा क्रोध करबही लोक जुत्ता सँ मारबे करतै नै। भागना तो वह इस बार भी चाहा था मगर कलकत्ता से छटनीग्रस्त होकर बरसों से बेरोजगार पिता के पास नित्य प्रति दूध मलाईं खाने के लिए बाजार घूमने के लिए मन वांछित पैसे कहाँ से मिलती। झगड़ा लड़ाई से परिपूर्ण जिन्दगी उसके व्यर्थ के स्वाभिमान पर ठंढा पानी डाल देता। बिना अनुशासन के दूसरा भाई भी अपने गाँव का दादा बन रहा था। मौसी अक्सर अपनी बड़ी बहन से मिलने आती खीर पूड़ी के साथ - साथ अपने दुखनामे का गठरी भर - भर के लाती। उनके बड़े बेटे को देखकर ढर - ढर बहते आँखों को आँचल से पोंछते - पोंछते विलाप करती रहती - मौसे के लगा दही नौकरी, रे बऊआ। कई बार उनकी नौकरी भी लगाई गई थी मगर उनके खून में वर्षो का रचा बसा यूनियन बाजी का अड़ियल क्रोधी रवैया,वापस उन्हें अपने गाँव पहुँचा देता। खेती थी मगर नदी के डूब वाले भाग में। बाढ़ का प्रकोप भी उन्हें त्राहि त्राहि कर देता।
          ऐसे में पता नहीं, भीमशंकर अपने मौसा का रोज सरसों तेल से मालिश करते - करते उनसे मैट्रिक पास करवाने का वचन ले लिया था,जो उसके लिए नितांत दुसाध्य था फिर तो कालेज का रास्ता उसने अपने लिए अन्य तरीकों से सुगम बना लिया था।
          मंझले देवर ने एक तरह से उसे अपना जासूस बना रखा था। कपड़े लत्तों के साथ - साथ उसके सपने भी वही बुनते थे। लंबाई - चौड़ाई के आधार पर पुलिसिया नौकरी का ख्वाब दिखाया गया। सुनने में आया कितने सालों से दारोगा लेबल का फॉर्म भरता लेकिन परीक्षा की तैयारी के बजाय यह ढूँढना शुरू कर देता कि कौन इसमें पैरवी से वैतरणी पार करा सकता है। कभी दौड़ने में छँटता,कभी लिखने में। मौसी आकर बाबूजी के सामने भर - भर कटोरा आँसू बहा कर गिड़गिड़ाती - कत्तो नौकरी चाकरी लगा दैतियै त, घरक हालत किछु सुधैरतै। बाप त एहने निकम्मा छै। साली के दुख से परेशान बाबूजी सिर्फ  आश्वासन ही नहीं दे रहे थे अपने स्तर पर भरपूर प्रयास भी कर रहे थे। मगर किस्मत दौड़ने में ही नहीं पास होता है तो चोर के पीछे क्या खाक भागेगा। अब किसी फैक्टरी में लगवाने की सोच रहे थे कि काल ने उनका कार्यकाल समाप्त घोषित कर दिया था।
          अब भीमशंकर सच में अनाथ था। मौसा के कोप को झेल कर भी उसे एक स्वर्णिम भविष्य की झलक दिखाई दे जाती थी। अब वह भी गया। मगर माँजी ने अपनी कड़कती हुई आवाज में कहा था - जखन तक हम जीबैत छी चिन्ता करय के कोनो काज नै। फिर तो वह पनप उठा था। उसके चेहरे की हरियाली चीख - चीख कर बयान करने लगी थी - सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का।
          पंडितों के साथ कुछ श्लोक वगैरह सीखकर वह भी अपने आपके किसी भी विद्वान से कम नहीं मानने लगा था। शहरों का आकर्षण गाँवों को बौद्धिक रूप से भी खाली करता गया और इसी खालीपन का लाभ उठाने के लिए भीमशंकर मचलने लगा अपना पैत्रिक कर्म छोड़कऱ अन्य सभी के लिए पाव फैलाता। उसे थोड़ा बहुत दुर्गासप्तशदी आता था वह भी पुस्तक देखकर। सत्यनारायण भगवान की पोथी,गृहप्रवेश,वसंत पंचमी वगैरह - वगैरह की पुस्तिका आस - पास बाजार हाट जहाँ कहीं देखता उठा लाता। सुनने में आया था - तीन चार हजार की कमाई होने लगी थी। इज्जत भी मिलने लगी थी। मगर फिर वही खुद से बड़ा उसका अहंकार और क्रोध। पंडित को यजमान से कैसे शांतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। यह बातें उसके प्रगति के रास्ते में बहुत बड़ा अवरोधक बन जाया करती। ज्योतिष के रहस्यमय अथाह सागर में भी डुबकी लगाने की कोशिश किया गणित तो थोड़ा बहुत रट लिया मगर फलित के लिए उचित ज्ञान कहाँ। मगर उस गाँव में बचा ही कौन विद्वान था जो उसकी गलती को पकड़ पाता शायद समय भी नहीं था। हाथ आए पंडित को नाराज करने का।
          सुबह उठने के साथ नहा धोकर थोड़ा सा पूजा पाठ कर लेता। घंटा भर योगा के बाद एक लिटर गाय का दूध,बादाम,अंकुरित चना वगैरह का नाश्ता करने के पश्चात सायकिल लेकर एक चक्कर खेत खलिहान बाग बागीचों का लगा लेता। बारह बजे तक उसके भोजन की व्यवस्था माँजी को करके रखनी पड़ती थी। जीभ का पतला है, अरहर की दाल के अलावा किसी दाल में हाथ डालता ही नहीं हैं। चार पाँच हरी सब्जी होनी ही चाहिए। मलाई वाला दही उसे पसंद है। मछली तो बनाने की वजह से नहीं खाता। माँजी तो छूती भी नहीं। अब तो पनीर गाँव की छोटी दुकान में भी बिकने लगा था तो भीमशंकर के लिए राहत की बात थी।
          भीम शंकर के लाटसाहब बनने पर भी मौसी खुश नहीं थी। उनका वर्तमान जस का तस पड़ा था। दो कमरे का घर जो दूर से खंडहर की तरह दिखता था। अब तक अपना नसीब नहीं बदल पाया था। छोटा भाई गाँव में ही छोटी मोटी दलाली वगैरह करता। अब भीम शंकर के तीन चार हजार से घर बनता या सत्तर अस्सी हजार का कर्ज जो बेटी के ब्याह का था चुकाया जाता।
          मौसी अपने अत्यंत दीन - हीन परिधान में आकर माँजी के सामने अपना रोना रोतीं बौआ के कही कत्तौ नौकरी लगा देतै। और दस पन्दरह दिन रहकर माँजी की अटैची में बहुओं की नई - नई साड़ियाँ चादर, तौलिया भर भर कर अपने गाँव ले जाती। पता नहीं क्या करती थी उनका। मगर तीसरे चौथे महिने फिर अपने उन्हीं कपड़ों में हाजिर।
          घर की बहु बेटियाँ भी समझने लगी थी मौसी की इस चालाकी को मगर सब चुप आखिर बोले तो क्या और कैसे।
          बड़ा बेटा जब भी माँजी का हाल चाल लेने के लिए फोन करता वह तुरत आह भरने लगती। हाल चाल की रहतै भीमबा के कत्तो नौकरी। हार कर फरीदाबाद के एक कंपनी में सुपरवाईजर के रूप में काम लगवा दिया गया। अन्य भाईयों ने चेतावनी दी - अपना मुँह ठोर वश में रखना। अपना क्रोध दिखाओगे तो यहाँ लोग पीस कर चटनी बना देंगे।
          उधर भीमा के प्रस्थान और नौकरी से माँजी कुछ दिन तो शांत रहीं ब्रह्यस्थान जाकर लाल साटन का अँचरी भगवती को चढ़ा आई।
          कभी - कभार भीमशंकर बड़े भैया से मिलने आता तो माधवी उसे समझाती - अब मौसी का सपना साकार कीजिए, साल भर के भीतर नहीं तो दो साल में घर बनवा लीजिए। वह हाँ - हूँ कह कर रह जाता। एक बार माधवी ने कहा था कि अपने माता पिता को तीर्थाटन करवा दीजिए कितना दूआ देंगें आपको आखिर आप उन्हीं के बेटे हैं। उसने माधवी की बातें ऐसे सुनी थी मानों उनके घर आया था तो क्या करता।
          उसके बाद से उसने वहाँ आना भी छोड़ दिया था। पति ने भी कहा- तुम्हें क्या पड़ी थी मोरल एडुकेशन देने की। माधवी को लगा था यह कहना नितांत गलत है कि सभी मनुष्य एक समान होते हैं। शारीरिक तौर पर भले सही हो। मानसिक तौर पर तो कदापि नहीं। मस्तिष्क के दुर्दांत जंगल में कौन कहाँ भटक रहा है, कितना खूंखार है क्या पता। स्वाभिमान भी कोई चीज होती है मगर लालच के दलदल में सिर से पाँव तक सराबोर व्यक्ति के लिए कैसी नैतिकता और कैसा स्वाभिमान।
          दबंग माँजी वहाँ गाँव में अकेले पन से बौखलाने लगी। बहुओं को फोन पर ही जली कटी सुनाने लगती - जेना हमरा छोड़ने छी अहूँ सबके बेटा पुतौह अहिना छोड़ देत। दुखी से मलिन चेहरा लिए माधवी पति से कहती - आप बड़े हैं माँजी को देखना आपका ही फर्ज है। ये भी प्रतिदिन फोन पर बात कर लेते थे। वो यहाँ आकर रहने के लिए तैयार नहीं और बहुए बच्चों की पढ़ाई - लिखाई छोड़वा कर भला कैसे वहाँ रहती। एक उपाय यह भी सोच लिया गया कि पड़ोस की ही परशुराम बाबा की पोती को अपने साथ रख लेती और उसकी शादी ब्याह का खर्च दे दिया जाता मगर माँजी को उसकी दादी से पुरानी रंजिश की वजह से यह सार्थक नहीं हो पाया।
एक दिन सुबह - सुबह फोन आया। भीमशंकर को नौकरी से निकाल दिया गया। वह गाजियाबाद मँझले भाई के घर पहुँच गया था। कसम खाया बार बार मंैने कोई फसाद नहीं किया था। दो महिने बैठा रहा बड़े भैया ने मैंनेजमेंट से बात की वह फिर से रखने के लिए तैयार था मगर ये अड़ गए की अब वहाँ नौकरी करेंगे ही नहीं। बड़ी तेजी से ऐसी नौकरी ढूँढी जा रही थी जिसमें बुद्वि की जरा भी जरूरत न हो। उधर मँझले भैया उसके सामने लुभावने प्रस्ताव रख चुके थे - यदि तुम गाँव जाकर माँ के पास रहो और तुम्हें पाँच हजार महीना दिया जाए तो? उसके सूखे शरीर बुझी - बुझी आँखों में अजीब सी चमक आ गई थी बिना इथ उथ के तैयार। वहाँ गाव में जब माँजी को इस बात की खबर मिली वे बिना पानी की मछली की तरह छटपटा उठी थी। बड़े को फोन मिलाकर अपनी व्यथा कथा भाव विह्यवल हो कर कहने लगी कि अब इस बूढ़ी काया में इतनी शक्ति नहीं है कि उसके नाज नखरे उठाए। बौआ रे हमरा एतेक काबू नै अछि जे नीक नुकुत बना क। खु,बओ लड़तै,जहर माहूर खेतै भागतै के संभारतै। इधर भीमशंकर घर जाने के लिए एकदम अड़ा हुआ। माँजी को समझाया गया कुछ दिन में फिर उसे बुला लेंगे।
          दूर पास के सूत्रों से पता चला कि अड़ोस पड़ोस से लड़कर आंगन में आकर मांजी से उनकी झूठी शिकायत करके उनके विचार को अपने पक्ष में मोड़ लेता था एक बार आम के फसल को बेचते समय कमल कका उसके पास से गुजर रहे थे। भीम का पीठ उनकी ओर था। व्यापारी से कुछ पैसे लेकर चुपचाप अपने पाकेट में रख रहा था। उनको क्या पता क्या गोरखधंधा ह,ै हँसते हुए कहा - मौसा के संपत्ति के आब तू ही देखभाल करै छै।
          बस चालाक भीमशंकर नमक तेल मसाला मिला कर बात को खूब तीखा बनाकर माँजी के सामने परोसा - कका कह रहे थे। आन गामक लोक आब एतय आबि क मालिक भ लूटि रहल छै संपत्ति। बस फिर क्या था माँजी ने दियाद पर अपना सारा क्रोध उतारते हुए आंगन से ही लक्षणा और व्यंजना के माध्यम से वो सब कहकर जो किसी भी खूनी क्रान्ति का कारण बन सकता था जता दिया कि भीमशंकर कोई गैर नहीं और उससे उलझने वालों की खैर नहीं। बाद में पछताती जब वही आँखें दिखाता था या और लोग अलग कहानी सुनाते। इस बार की दिल्ली वापसी से सुना गया उसके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया था। माँजी बताती थी - क्रोध समेटकर उनकी सेवा करने लगा था। भोजन भी खुद बना लेता। बस सूत्र वाक्य की तरह एक ही रट  - आब दिल्ली नै अहि जगह रहि क,कोनो काज करब।
          शाम के सन्नाटे से डरती माँजी के लिए भी यह एक सुखद अनुभूति थी। स्वभाव भी सुधर गया है, खाने के लिए कितना खायेगा। पास में एक आदमी तो भरोसे का है।
          छठ के पुनीत अवसर पर जब माधवी गाँव आई तो उसने अपने दिव्य चक्षु से उस विशाल घर पर भीमशंकर का साम्राज्य स्थापित होते देख लिया था। गैस पर बड़ा बरतन चढ़ा कर कलछुल से हिला हिला कर दूध का राबड़ी बनाया जाता जिसे भीमशंकर बड़े चाव से खाता। शीशे के मर्त्तबान में रखे काजू किसमिस बादाम जो माँजी के पूजा पाठ व्रतादि फलाहारी के लिए रखा रहता था, भीमशंकर के लिए अलभ्य नहीं था बाहर जाते समय आलमारी खोलकर पसंदीदा मेवा निकाल कर अपने पैंट की जेबी में रख लेता। जब वह उसे चबाते हुए माधवी के सामने से निकलता तो उसका खून सौ डिग्री फारेनहाईट को पार कर जाता,मगर कर क्या सकती थी माँजी के करीब का आदमी। खुद गुस्सा होने पर कह भी देती भाड़े का आदमी है, कैसा रहेगा। मगर बहुओं का एक शब्द भी बोलना उन्हें बरदाश्त नहीं था - अहा सब स बढ़िया छै, सेवा त करैय। हालांकि दिल्ली के एक काफी प्रतिष्ठित अस्पताल में बड़े बेटे ने ई लाज करवाना शुरू कर दिया था। साल में तीन चक्कर वहाँ का लग ही जाता। हवाई जहाज से कई बार लाया गया उन्हें बच्चे बहु सभी दासोदास फिर भी उन्हें लगता सब अपने में मस्त है। और उन्हें कोई पूछता नहीं। बेटियों से फोन पर बातें करती तब पता चलता यहाँ तो वे और भी जेल में बंद महसूस करती हैं,और यही कड़ुआहट उनके व्यक्तित्व को और भी कर्कश कठोर बनाता जा रहा था।
          किसी ग्रामीण को गाड़ी चलाते देखकर एक बार यह सपना भी उसके मस्तिष्क में जबरदस्त अंगड़ाई लेने लगा थी कि उसकी भी अपनी गाड़ी हो। रात दिन परेशान माँजी को भोला की गाड़ी के फायदे गिनवाता शादी ब्याह में भाड़े पर लगा कर अच्छी कमाई कर लेता है,परिवार के लोगों को भी कहीं आना जाना हो तो अपनी गाड़ी की बात ही कुछ और होती है इज्जत प्रतिष्ठा भी समाज में बढ़ता है। जब माँजी से बात नहीं बनी तब छोटे भाई को पकड़ा। छोटका अपने माहिर खिलाड़ी नहले पर दहला फेंकते हुए कहा था - पाँच लाख की गाड़ी तुम्हारे जैसे क्रोधी सिरफिरा के हवाले कर क्या मैं रोज कोर्ट कचहरी करता हुआ जीवन बिताऊँगा। उस दिन से वो चुप। दाल कहीं गल नहीं रही। मेहनत करने की आदत नहीं। पूर्ण रूप से परजीवि पर मुड़ी फलाहार मगर अहंकार की मारती हिलकोरे उसे किसी का मातहती करने के लिए राजी नहीं रहने देता।
          वर्ल्ड बैंक के किसी प्रोजेक्ट के तहत काफी सुपरवाईजरों की बहाली हो रही है, बी. ए.चाहिए। नौ हजार र्स्टाटिंग में देगा। नौकरी के लिए बातचीत चल रही है। लोक सब लगे हैं। दिल्ली से वापसी के बाद असंख्य प्रश्नवाचक चिन्हों से भरे आँखों की शांति के लिए उसने यह बढ़िया सा फार्मूला गढ़ लिया था। महीने दो महिने लोगों ने इंतजार किया,माँजी भी आश्वस्त थी। कि आसपास में नौकरी हो जाने से कम से कम उन्हें तो अकेलेपन का चुभती बबूल के काँटों जैसी जिन्दगी तो नहीं जीनी पड़ेगी। यहीं से अपना आयेगा जायेगा।
           एक दिन दरवाजे पर जहाँ टोले की अन्य स्त्रियों केसाथ माताजीदरबार लगाए बैठी थीं। अपनी सायकिल खड़ी करके जोर - जोर से साँस खींचते हुए खड़ा था। पाकेट से रुमाल निकाल कर मुँह पोंछते हुए बोला - नौकरी के लेल गप त भ गेल कागज सेहो द देने रहै गाम गाम म जा के काज देखके पड़तै। मोटर साइकिल   एकदम जरुरी छै।
          अब हम कत्त सँ आनबै साठ सत्तर हजार एही लै मना करि देलियै ओ नौकरी के। मन मसोसती हुई माँजी उसका मुँह देखती रह गई थी। उन्हें उसके इस बात पर इक्ष्वाकू कुल की सत्यता नजर आई थी। अच्छा भगवान कोनो और रास्ता देथिन्ह। कहकर उसे सांत्वना देती खाने पीने के इंतजाम में घर के अन्दर चली गई थी।
           उन्हीं दिनों छोटे भैया किसी की शादी में शामिल होने के लिए गाँव आए भीमशंकर के नखरे आसमान से उतार कर खजूर में अटके पड़े थे। जब तक नया कुरता पैजामा खरीद कर नहीं आयेगा बाजार से वह बारात में नहीं जायेगा। आखिर उसकी भी कोई इज्जत है कि नहीं। औेर बारात में झक सफेद कुर्त्ता पैजामा पहने वह दूर से ही झलक रहा था। छोटे भैया को भी उस दिन उसकी ये फरमाइश विलासिता लगने लगी थी। मैं कमाता हूँ, फिर भी पुराने कपड़ों में ही बारात में गया,लेकिन। मगर माँजी का सांय सांय करता अकेलापन और उसका फायदा उठाता हुआ भीमशंकर। इसीलिए सबने उधर से आँखें बंद कर ली थी,लेकिन भीतर ही भीतर सबकी परेशानी का सबब तो बनता ही जा रहा था।
          कुछ दिनों से उसके एक और महत्वकांक्षी योजना अंगड़ाई लेने लगे थे दिन रात वह उसी को साकार करने में लगा रहता था। माँजी को भी लगा- चलो इस बहाने तो यह हमारे करीब रहेगा। शहर के मकान से किराएदार निकाल दिया गया। कुछ ठीक - ठाक कराकर उसे विवाह भवन बना दिया गया। सुनने में आया कि काफी अच्छी कमाई होने लगी। अब पैसे का मालिक तो भीमशंकर ही था। क्या पता माँजी को क्या देता था। वे भी कभी खुलकर बताई नहीं।
          छोटे भैया ने बाबूजी के दिन को याद करते हुए कहा जो उन्होंने माँ को बताई थी - यह परजीवी किसी शहर महानगर में टिकने वाला नहीं हैं। इसी गाँव में,इसी घर में आकर दिन गुजारेगा ये। जिस वक्त ये बातें हो रही थी भीम शंकर उस समय लैंड लाईन पर एस टी डी काल कर रहा था। भाईयों का नाम लेकर न जाने किस - किस से बातें करता रहता। माधवी के कान अतीत में चले गए थे। बाबूजी के समय जब दलान से अचानक वे आंगन में आते तो किसी भी बहु को फोन पर बातें करते हुए देख कर पूछ लेते थे - फोन एले यै कि जा रहल छै। माताजी उनके परम मितव्ययी स्वभाव को जानते हुए बोल उठती थी - नैहर से एले है। हाँ वही बिल बहुत ज्यादा आ जाता है जरा होशियारी से। बात को जानबूझ कर अधूरा छोड़कर चले जाते थे। और आज उन्हीं के तिनके तिनके जुटाए संपत्ति का धड़ल्ले से भीमशंकर प्रयोग कर रहा है।
          छठ के बाद वापस शहर जाते हुए माधवी ने सोचा- बड़े - बड़े राजघराने तक पर परायों का आधिपत्य हो चुका है। यह तो मामूली सा एक गृहस्थ परिवार है। प्रकृति में कुछ भी चीज खाली नहीं रहती। हवा वहाँ विभिन्न रूपों में प्रवेश कर ही जाती है। कभी आत्मा के रूप में कभी प्राणी के रूप में, इसमें नई बात क्या । हाँ माँजी अकेली हैं यह बात अब उसे दिन रात व्यथित नहीं करेगा। और वह ट्रेन की बढ़ती हुई गति के साथ ही बर्थ पर लेट कर सोने की तैयारी करने लगी।

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