इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

सोमवार, 9 नवंबर 2015

अशोक ' अंजुम' की पांच गज़लें

1
हादसों की महरबानी कम नहीं
हौंसलों में भी रवानी कम नहीं
मेरे बाजू हैं मुसलसल काम पर
यूँ समन्दर में भी पानी कम नहीं
साथ तेरे जो गुजारी है कभी
चार दिन की जि़न्दगानी कम नहीं
हम अँधेरों की कहानी क्यों कहें
साथ में यादें सुहानी कम नहीं

2
तुमको पा कर खुशबू - खुशबू
हो जाए घर खुशबू - खुशबू
साथ तुम्हारा इतना प्यारा
हर इक मंज़र खुशबू खुशबू
तुम मुसका दो तुम हँस दो गर
रचें सुखनवर खुशबू - खुशबू
एक तुम्हारा खत ही दिलकश
दूजे उस पर खुशबू - खुशबू

3
कभी रिश्ता बदलती है, कभी चेहरा बदलती है,
अभी तो देखिए ये जि़न्दगी क्या क्या बदलती है
अरी ओ धूप ! रुक, ऐसे न आ चोरों - सी कमरे में
यहाँ पर स्याह सच्चाई अभी कपड़ा बदलती है
सियासत! क्या कहें तुझसे कि तू वो नर्स है जो कुछ
हरे कागज़ के टुकड़ों पर कभी बच्चा बदलती है
तुम्हारी ही तरह से ये खुशी भी खूब है यारो
जिधर से भी मैं निकलता हूँ वही रास्ता बदलती है
खड़े हो गर बुलन्दी पर तो मत इतराइये अंजुम
समय की इक ज़रा सी ठेस भी रुतबा बदलती है

4
कदम जब डगमगाएं रोशनी में
बहुत तुम याद आए रोशनी में
तुम्हारी याद की कौंधी यूँ बिजली
हर अरसे तक नहाए रोशनी में
अँधेरों का चलन उनको यूँ भाया
बुलाया, पर न आए रोशनी में
जरुरत थी वहाँ कोई न पहुँचा
दिए तुमने जलाए रोशनी में
खजाने उनके आगे सब थे मिट्टी
वो सिक्के जो कमाए रोशनी में
वो रातों को बने अपना सहारा
जो नगमें गुनगुनाए रोशनी में

5
दर्द सीने का पिघलकर गिर पड़ा
आँख से आँसू निकलकर गिर पड़ा
एक नन्हा हौसला फिर धम्म से
कुछ $कदम रस्ते पे चल कर गिर पड़ा
तेरे - मेरे बीच का रिश्ता भी क्या
थोड़ा सम्भला और सम्भलकर गिर पड़ा
सच मेरा फौलाद के मानिन्द था
कल ज़रा रस्ता बदल कर गिर पड़ा
क्या कहूँ इस खोखले विश्वास को
फिर नये साँचे में ढलकर गिर पड़ा

पता
संपादक
अभिनव प्रयास त्रैमासिक
स्ट्रीट 2, चन्द्रविहार कालोनी,
नागला डालचन्द, क्वारसी बाईपास,
अलीगढ़ 202002 उ.प्र.
मो. 09258779744,09358218907

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