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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बारिश

हरदीप बिरदी

देखो ना बारिश हो रही है,पर इक तेरी कमी है,
हवा है भीनी भीनी सी,पर मेरे लिए ये थमी है।

लोगों के लिए है ख़ुशी,सब के चेहरे पर रौनक,
मुझे देख हैं हैरान सब,इसको न जाने क्या गमी है।

सब हो गया है नया सा,पानी ने साफ़  कर दी धूल,
मेरा ही नहीं हुआ उद्धार,यादों की जो धूल जमी है।

रम गया है पानी जमीं में,प्यास बुझी धरती की,
सूखे मन पे न असर हुआ,तेरी याद जो रमी है।


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