इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बारिश

हरदीप बिरदी

देखो ना बारिश हो रही है,पर इक तेरी कमी है,
हवा है भीनी भीनी सी,पर मेरे लिए ये थमी है।

लोगों के लिए है ख़ुशी,सब के चेहरे पर रौनक,
मुझे देख हैं हैरान सब,इसको न जाने क्या गमी है।

सब हो गया है नया सा,पानी ने साफ़  कर दी धूल,
मेरा ही नहीं हुआ उद्धार,यादों की जो धूल जमी है।

रम गया है पानी जमीं में,प्यास बुझी धरती की,
सूखे मन पे न असर हुआ,तेरी याद जो रमी है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें