इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

सोमवार, 9 नवंबर 2015

सड़ांध

डॉ.संजीत कुमार
          प्राणायाम की पहली गहरी सुडकी कई कोमलांगाओं को गहरे तक भिगो गई, सुड़की इतनी भयावाह होगी उन्होनें सोचा भी नहीं था । ये क्या था जो अचानक इतनी भव्य सोसाइटी की फिजा को दोजख बना रहा था अचानक चपाँ, चमेली और अन्य मोसमी फूलो की महक से महकता सोसाइटी का प्रांगण आज अचानक इतना दुर्गन्धित क्यों हो गया था। यह दिल्ली की प्रोग्रेसिव सोसाइटी थी जो हर लिहाज से अपनी भव्यता से लोगो की ईर्ष्‍या विषय थी बड़े-बड़ेे लालाओ, बनियों और सिविल सोसाइटी का बड़ा खास तबका इसको अपनी ख्वाबगाह बनाने का सपना लिया करता है। प्रोगेसिव सोसाइटी और कई अन्य भव्य सोसाईटियां मिलकर इस इलाके को खास और पाश बनाती हैं। अगर आप हिन्दी के पाठक हैं तो ये इलाका आपके लिए खास है क्योंकि हिन्दी के अधिकांश सवर्ण और अमीर लेखकों की शरणस्थली भी यही इलाका है। फ्लैट खूब लम्बे चौड़े बनाए गए हैं। चाहत तो इनकी बंगलों की थी, पर नेताओं और बड़े बनियों ने इस महानगर के बंगलों को किसी और के लिए छोड़ा ही नहीं। सो मजबूरन इस वर्ग की कुण्ठाओ को ध्यान में रखते हुए अपार्टमेंटों के फ्लैटो का डिजाइन मिनी बंगले की तर्ज पर बनाया गया है। उच्च सरकारी अधिकारी, वरिष्ठ पत्रकार, जज, प्रोफेसर, संपादक आदि-आदि जिनसे आप जलन कर सकते है उनकी ख्वाबगाह यहाँ पर है। समाज के इस नाजुक वर्ग के फेंफड़े कुछ ज्यादा नाजुक होते हैं इसका ख्याल अपार्टमेंटों को बनाते वक्त रखा गया है ताकि नाजुक फेंफड़ो को शुद्ध आक्सीजन की निर्बाध सप्लाई होती रहे।
          सुबह-सुबह लगभग सभी घरों से घण्टियों की आवाजें आना एक अनिवार्य रस्म है, कोई न बजाने वाला आता भी है तो शुरूआती दिक्कतों के बाद वह भी इस प्रभातकालीन आयोजन में शामिल हो जाता है। मंगलवार शाम को एक पण्डित जी भी आते हैं, जो अपनी खरखराती आवाज में रामचरित मानस और सुन्दरकाण्ड का पाठ करते हैं। साल में दो बार जगराता भी होता है, सोसाइटी की कई भक्तिनों में माता भी आ जाती है और वे विक्षिप्तों की तरह नाचने लगती हैं। तब उनके पति समेत सोसाइटी के सभी लोग इन अधेड़ प्रेमिकानुमा माताओं से आर्शीवाद लेते हैं।
          पेड़ - पौधों की आस - पास कमी नहीं हैं। इतने हैं कि आदमी कम नजर आता है पेड़-पौधे ज्यादा नजर आते हैं। सोसाइटी के चारों ओर दस फुट ऊंची मजबूत चीन की दीवार जैसा घेरा बना हुआ है दीवार के टाप पर पूराने कांच के टुकड़े सुरक्षा के लिए लगाए गए है। चारों तरफ लम्बा चौड़ा मैदान विदेशी घास से सुसज्जित और मैेदान में एक वाकिंग टैªक भी है जिस पर अपार्टमेंटवासियों की स्थूल पत्नियां जीरो फिगर पाने के लिए चोटी का पसीना एड़ियों तक पहुंचाती हैं। बाबा रामदेव की ख्याति से अभिभूत होकर उनके संगठन में शामिल होने वालों की कमी नहीं हैं। हमारी इस सोसाइटी में भी मिसेज राय बाबा रामदेव की भक्त हो गई हैं और उनके मंदिर में कई भगवानों के साथ ही बाबा रामदेव की मोहिनी तस्वीर भी दाखिल हो चुकी है। अगर आप ये सोच रहे हैं कि मिसेज राय अनपढ़ है तोे आप भूल कर रहें हैं वे बाकायदा एक स्वघोषित अंतराष्ट्रीय विश्‍वविद्यालय की स्नातक हैं जिसके नाम के पहले महात्मा गांधी भी लगा हुआ है और वे इसी सोसाइटी से बाबा के मिशन को पूरा करने में अपना योगदान भी दे रही हैं। सोसाइटी के मैदान में उनकी प्रातःकालीन योगा कक्षा का लाभ सोसाइटी की हीं नहीं बाहर की भद्र महिलाएं भी लाभ उठा रहीं हैं। आपको अगर ये लगता हो कि बाबा कामदेव अरे माफ करना बाबा रामदेव से इनकी भेंट भी हुई है कि नहीं तोे मैं आपकी जानकारी के लिए यह बता दूं कि पिछली बार जब बाबा दिल्ली में थे तो बाबा के लिए गाय के दूध का इंतजाम इन्हीं मोहतरमा ने किया था। और चांदी के कटोरे जिनमे बाबा जी दूध पीते है वह भी इन्हीं के सोजन्य से उपलब्ध हुए थे। यहां आपको शीला दीक्षित वाली ग्रीन दिल्ली का दावा सौ फीसदी सच लगेगा।
          हर रोज की तरह मैदान में चटाइयां बिछ चुकीं हैं। बीस के करीब योगाभ्यासिनें फेंटा बांधकर मोर्चा संभाल चुकी हैं। मोर्चा है उसी मोटापे के खिलाफ जिसने भूमण्डली विश्‍व को हजार करोड़ रूपए का नया बिजनेस दिया है। इन्ही बिजनेस वालों का किया धरा है कि सौन्दर्य के मानक बदल गए है अब जीरो फिगर और सिक्स और ऐट पैक के अलावा दूसरा फिगर आउटडेटेड है। जीरो फिगर के चक्कर में इलाके की कई लड़कियां को हस्पताल की हवा खानी पड़ी। हद तो तब हो गई जब एक लड़की कैश डाइटिंग के फेर में जान से हाथ धो बैठी, दरअसल उसे एक एड कंपनी ने स्लिमिंग कैप्सूल के ऐड के लिए सिलेक्ट किया था। पर उन्होंने एक शर्त भी रख दी थी कि पांच दिनों में पन्द्रह किलो वजन घटाना पड़ेगा। मिसेज राय सबके सामने अपनी चटाई पर खड़ी हैं। सभी योगाभ्यासिनें थोड़ी विचलित सी हैं तभी मिसेज राय ने कहा सभी अन्दर की तरफ जोर से सांस लेंगें और जैसे ही सबने जोर का सांस लिया तभी कक्षा की दो योगाभ्यासिनें कटे पेड़ की तरह गिर गई आज की कक्षा का समापन यहीं हो गया। मिसेज राय ने अन्य योगाभ्यासिनों की मदद से दोनों को उनके घर तक पहुंचाया। अमूमन सुबह सुबह मैदान में हवा बड़ी खुशग्वार होती है लेकिन आज फिजा कुछ बदली बदली सी महसूस हो रही थी। वो ताजगी जो आत्मा को तृप्त कर दिया करती थी आज नदारद थी। भयंकर किस्म की सड़ांध ने पूरे मेैेदान को अपने आगोश मे ले रक्खा था । सब चाह कर भी जी खोल कर सांस नहीं ले पा रहे थे। सांस लेने से पहले ही छोड़नी पड़ जाती थी। पिछले कुछ दिनों से अपार्टमेंटि जनों के फेंफड़ो को हवा में वो ताजगी महसूस नहीं हो रही है पर आज तो जैसे हद हो गई। मिसेज राय कक्षा का समापन कर घर पहुंची। आज मन कुछ उचाट हो रहा था उनके घर के सामने ठक्कर साहब का आशियाना था। मिसेज ठक्कर दरवाजे पर ही थीं उन्हें दरवाजे पर देख मिसेज राय ने मिसेज ठक्कर को कहा क्यूं मेडम जी कहीं कुछ गड़बड़ है क्या ?
‘‘अरे इस उम्र में कैसी गड़बड़ मैनें तो आपरेशन करवा लिया है‘‘।
‘‘अरे मैं उस गड़बड़ की बात नहीं कर रही हूं, जरा ध्यान लगाकर सांस लो बाबा रामदेव की तरह, फिर महसूस करो‘‘।
‘‘नहीं बहन बाबा रामदेव की तरह तो बाबा रामदेव ही ले सकते है, मैं उनके चक्कर में नहीं पड़ती, वैसे भी मेरे पति जबसे रामदेव के कैंप से आए हैं पता नहीं क्या-क्या करते रहते हैं, वैसेे भी उनसे होता जाता तो कुछ है नहीं। एक बार ऐसा आसन लगाया की टांगें गर्दन में अटक गईं पता नहीं क्या उटपटांग नाम बता रहे थे उस आसन का। बड़ी मुश्‍किल से हरबू की मदद से उनकी टांगें गर्दन से निकाल पाई। फिर भी मैं कोशिश करती हूं ‘‘।
‘‘कुछ महसूस हुआ‘‘? प्रश्‍नवाचक मुद्रा में
‘‘हां कुछ सड़न तो महसूस हो रही है, लगता है कि जैसे कहीं कुछ सड़ रहा है‘‘।
‘‘अरे वही तो मैं आपको बताना चाह रही थी आज योगा क्लास में मिसेज बिष्ट और मिसेज मेहरा प्राणायाम करते वक्त चक्कर खा कर गिर गईं क्लास को वहीं समाप्त करना पड़ा। भगवान जाने क्या सड़ रहा है‘‘। सड़ांध अब धीरे-धीरे अपने यौेवन पर आ गई थी पूरी सोसाइटी उसकी जद में आ चुकी थी। लगभग सभी के हाथ में रूम फ्रेशनर थे जो कि खाली हो चुके थे। सड़ांध थी कि उसका अन्त होता नजर नहीं आ रहा था। मिसेज योगी तो चक्कर खा कर गिर गई और मि0 योगी उन्हें तुरन्त पास के नर्सिगहोम में ले गए। डा0 ने उन्हें सलाह दी अगर दुबारा इन्हे सोसाइटी ले जाओगे तो इनका जिन्दा बचना मुश्‍किल हो जाएगा सड़ांध ने इनके दिमाग पर बहुत गहरा असर डाला है। अच्छा हुआ आप इन्हें वक्त रहते यहां ले आए‘‘। मिसेज योगी की तो सप्ताह भर की बुकिंग पक्की हो गई थी।
          मिसेज शर्मा की राय थी कि शायद कहीं कोई चूहां मर गया है और वह भयानक तरह से सड़ रहा है ।
मिसेज गोडबोले की निगाहों में किसी हत्याकांड की तस्वीरें तेरने लगीं ’’सनसनी’’ उनके यहां प्रिय कार्यक्रम है जहां गुंडानुमा एंकर आपराधिक खबरें दिखाकर लोगों के आपराधिक ज्ञान में अभिवृद्धि करता रहता है। इस एंकर ने गब्बर को रिप्लेस कर दिया है जब उनके बच्चे सोते नहीं तो वो गब्बर की जगह उसी एंकर के नाम से डराकर सुलाती है। उनकी सलाह थी कि जल्द से जल्द पुलिस को सूचित किया जाए। उन्होंने याद दिलाया कि किस प्रकार आरुषि मर्डर केस के हेमराज की लाष छत पर सड़ती रही और पुलिस को पता भी नहीं चला।
            खैर छोड़ो अब हाल यह है सोसाइटी में सांस लेना भारी हो गया है और लगने लगा है कि यह कोई जैन मुनियों की सोसाइटी हो, बच्चे, बूढ़े, औरतें सभी ने जैन साधुओं टाइप कपडे़ की पट्टियां बांध ली हैं, महावीर भगवान और उनके अनुयायियों ने सोचा भी नहीं होगा की उनकी धार्मिक क्रिया का ऐसा भी उपयोग हो सकेगा।
          सीतादेइ जो कि सोसाइटी में झाड़ू कटके का काम करती है हमेशा से सोसाइटी की इस प्रकार की समस्याओं की तारणहार रहीं हैं, पिछले साल अकेले रहने वाले वर्मा जी के पलंग के नीचे बिल्ली मर गई थी बिल्ली क्या थी साहब बड़ी ही भरी-पूरी बिल्लो थी भूरे बाल थे कंजी-कजी आंखे थी बड़ी ही शरीफ बिल्ली थी, तो सीतादेइ ने ही अदम्य साहस का परिचय देकर बिल्ली को पलंग के नीचे से लहूलुहान हालांकि शरीर पर हथियार के प्रहार का कोई निषान नहीं था निकाला था और उसको पास के खाली प्लाट में विधिपूर्वक दफनाया था। आज तक बिल्ली के मरने के कारणों का पता नहीं चल सका है । हालांकि कुछ लोगो ने तो इसमें वर्मा जी का हाथ होने का संदेह व्यक्त किया था अब ये तो उपर वाला जाने कि हाथ था या कुछ और।
          सीतादेइ की खुशी का ठिकाना न था, बरबस उनके मुंह से गाना निकल पड़ा चढ़ गया उपर रे, अटरिया पे लोटन कबूतर रे, गुंटर-गुंटर, गुंटर-गुंटर। यह गाना अक्सर सीतादेइ तभी गाती थी जब वो बहुत खुश होती थी। आखिर उन्होंनें समस्या का पचास प्रतिशत समाधान तो कर ही दिया था। कहानी का सड़ा हुआ पात्र मिल गया है जिसने सबकी नाक में दम किया हुआ है। यह महाशय कुत्ते जी हैं जो की सोसाइटी की पिछली दिवार के पास स्वर्गवासी हो गए हैं, मरने के बाद आत्मा तो यमराज के काले सांड की सवारी का मुफ्त मे लुत्फ उठा रही है और षरीर ने सोसाइटी वासियों को नर्कवासी बनाया हुआ है।
          सीतादेइ उत्साह में अपनी मालकिन मिसेज गोडबोले से- ‘‘बीबी जी यह सड़ाध दीवार के पीछे मरे हुए कुत्ते से आ रही है, जो बुरी तरह सड़ रहा है। उसमें कीड़े पड़ गए है‘‘।
‘‘ओह्ह ओ,,,,,,, मिसेज गोडबोले काफी पी रही थी, सारी की सारी बिना ब्रेक के बाहर आ गर्इ्र्र, अभी अभी फर्श पर पोंछा लगवाया था चल अब इसे जल्दी से साफ कर दे । सीतादेई चुपचाप निर्वाक हो गई थी अरे देख तो लिया कर कहीं भी कुछ भी बोल देती है, सारा मूण्ड खराब कर दिया मिसेज गोडबोले ने अपना सिर को पकडते हुए कहती है। ,,, खैर मैं जानती थी कि यह काम तुम ही कर सकती हो, तभी इतनी सड़ांध हो रही है ,अब प्लीज इसे जल्दी से इसे ठिकाने भी लगा दें, इस सोसाइटी पर तेरा बड़ा उपकार होगा। यहां तो जीना मुहाल हो गया है। कलेजा मुंह की तरफ आ रहा है। अगर इसे जल्दी नहीं हटाया गया तो हमें हरिद्वार जाना पड़ेगा‘‘। मिसेज गोडबोले ने सीतादेई से थोड़े चिरौरी भरे अंदाज ने कहा, मिसेज गोडबोले मोके की नजाकत देख व्यवहार बदलने में माहिर हैं ।
          लेकिन अपनी सीतादेई भी कुछ कम नहीं तुरन्त अपनी असमर्थता जता दी ‘‘नही बीबी जी मुझसे अब यह न होगा, आजकल नवरात्रे चल रहे हैं, मेनें पूरे नौ व्रत रखे हैं, ढूंढ दिया है यह भी कोई कम है, में ही जानती हू मुझ पर क्या बीती थी जब मैनें वह भयानक दृश्‍य देखा‘‘ ......... ‘‘अच्छा अच्छा अब बस कर बहाने न बना खूब जानती हूँ में तुझे अच्छा चल बाहर गेट से सुरेन्द्र चौहान को तो बुला दे उसे बुलाने में तो तेरा व्रत नहीं टूटेगा‘‘। सुरेन्द्र चोहान का नाम सुनतें ही सीतादेइ थोड़ी सकपका गई क्योंकि वह आते जाते उसे बड़ी घटिया नजरों से तौलता रहता है। विशेषकर जब वह आगे निकल जाती थी तो चोहान की आंखे उसे बहुत दूर तक छोड़ कर आती थी, एक दिन तो सीतादेई ने उससे पूछ ही लिया था कि क्या देख रहा हैं सुरेन्द्र चौहान बोला क्या धारा 144 लगी हुई है । अगर इतना ही नाज है अपने हुश्‍न पर तो घर में ही रहा कर ना घर घर क्यों बर्तन माँजती घूमती है। सीतादेई ने गरजाकर कहा तो क्या हुआ बैठी - बैठी हराम का तो नहीं खाती तू तो इतना कमीना है कि गरीब फेरी वालो को भी नहीं छोड़ता अब ज्यादा न बोलियों वरना (बीप) में झाडू डालकर मोर बना दूंगी लेकिन यह बात मालिक लोगो को नही पता क्योंकि उनके सामने तो वह बड़ा ही भोलाशंकर नजर आता है लेकिन पीछे से मदनावतार बन जाता है।
          थोड़ी ही देर बाद द्वारपाल मेरा मतलब आज की जबान के मल्टीपरपज सिक्युरिटी गार्ड अपनी रौबदार मूछों के साथ हाजिर हो जाते हैं। मिसेज गोडबोले जो कि यहां की सोसाइटी की अध्यक्षा भी हैं गार्ड को इस कुत्ते को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लेने को कहती हैं‘‘। गार्ड सुनते ही उछल पड़ता है ‘‘अरे मेडम आप भी कैेसी बात करती हैं। भले ही हम सिक्युरिटी गार्ड है लेकिन है तो राजपूत कोई भंगी-चमार थोड़े ही हैं। हम यह काम कैसे कर सकते हैं! यह काम तो आप समझती ही हैं न किन लोगो का होता होता आप इस काम के लिए तो उन्हें ही पकड़े।
          बातचीत के बीच में ही सोसाइटी का बाकी का महिला मंडल भी आ पहुंचा था , सभी के चेहरों पर चिन्ता की लकीरों को आसानी से देखा जा सकता था। उन्हे कोई रास्ता नजर नही आ रहा था कि क्या किया जाए। मिसेज गोडबोले समेत सभी दुबारा सीतादेई की तरफ देखने लगती हैं, क्योंकि वह इस प्रकार की क्राइसिस को अच्छी तरह मेनेज करना जानती है, सीतादेई इस देखने के अर्थ को समझती है और मन ही मन सोचती है कि कौेन उपयुक्त होगा इसके लिए? सहसा उसे जूजू का ख्याल आता है। जूजू इस काम के लिए उसे मुफीद लगता है ।
          जूंजूं कर आशियाना सोसाइटी से कुछ ही दूरी पर बसी झोपड़पट्टी में था, बड़ी-बड़ी सोसाइटियों के आस-पास अनिवार्य रुप से ऐसी बस्तियां होती हैं जहां से इन सोसाइटियों में रहने वाले सो काल्ड भद्र जनों के नौकरों की आपूर्ति निर्बाध चलती रहती है। क्योंकि ‘‘रस्ते का माल सस्ते में‘‘ की पंरपरा का पालन कभी बंद नहीं होता। झाड़ू वाली, बर्तनवाली, कपड़े वाली, स्वीपर, मोची, ड्राइवर सब यहीं से उपलब्ध हो जाते हैं। वो भी सस्ते में तो बुराई क्या है ऐसी झुग्गी बस्ती के होने में।
           तो हमारे जूूजू जी यहीं इसी बस्ती में लल्लनटाप पल बढ़ रहे है, मां-बाप और शादी लायक बड़ी बहन के साथ, अमीरी से कभी वास्ता ही नहीं पड़ा इनके लिए अगर दो वक्त की रोटी हो जाए तो वही अमीरी, बेटे-बेटियों के लिए आई0आई0टी0 आई0 आई0एम0 का सपना नहीं है। वे जानते ही नहीं है, उन्हे तो बस इतना ही पता है, पढ़ाई लिखाई तो बड़े साहब लोगो के बच्चो के लिए है, उनके बच्चे तो उन्हीं राजकीय स्कूल की रौनक बढ़ाते है जहां अध्यापिकाएं पढ़ाई कम और स्वेटर बुनने में ज्यादा रुचि लेती हैं। और वक्त मिला तो बालिका-वधु और कहानी घर घर की तों है न, ऐसे ही राजकीय स्कूल का प्राडक्ट है हमारा जूजू, सरकारी स्कूल से निकाला गया क्योंकि पढ़ाने वाली मेडम की जातिसूचक गाली का जवाब उसने उनके सिर को फाड़ कर दिया। प्रिंसपल मैडम ने तब कहा था इन लोगों से और उम्मीद की क्या की जा सकती है, गंदगी में रहते हैं, गंदा खाते है तो इनसे अच्छे व्यवहार की उम्मीद ही कैसे की जा सकती है। लेकिन प्रिंसिंपल और अध्यापिका शिक्षा के मूल मंत्र को भुला बैठी थी कि प्यार बांटने से प्यार बढ़ता है और नफरत से नफरत, क्रिया की ही प्रतिक्रिया होती है, तो साहब हमारे जूजू को स्कूल से निकाला गया तो दोस्तों ने कहा तू फ्रिक न कर हम दीवार टाप कर तुझसे मिलने आ जाएंगे।
          बापू को घर तक पंहुचने का सब्र नहीं था। स्कूल में ही बड़ी बेरहमी से बापू ने जूजू का रिमांड लेना चालू किया, ऐसी मार मारी की चोर की भी रुह फनां हो जाए। अध्यापिकाओं ने कहा यहां मत मारिए बेकार में हम फंस जाऐंगे , मीडिया वैसे ही बड़ा तेज हो गया है, सो रास्ते भर जम कर जूजू की रंगाई हुई, अगली पिछली सब कसर बापू ने निकाल ली थी, जूजू अच्छी तरह से समझ रहा था की पिटाई के पीछे शिक्षा क्रान्ति कम और पड़ोसवाली शांति ज्यादा थी क्योंकि जूजू ने बापू के साथ शांति को अशांति मचाते हुए देख लिया था। वो रात जूजू ने कोप भवन में काटी, लेकिन फिर सब कुछ सामान्य हो गया, जूजू की अपनी दुनिया हो गई स्लम बस्ती के बच्चों का नायक हो गया। राजकीय स्कूल की सबसे कू्रर मैडम का सिर जो खोल दिया था, वर्ना तो आए दिन यही खबरें आम थी कि फलां बच्ची या बच्चे की शिक्षका द्वारा पिटाई से मौत।
          तो साहब अब लब्बोलुआब यह है कि सीतादेई आनन फानन में जूजू को बुला लाती है, जो आज के दिन इस प्रकार की विपदाओं का एक्सपर्ट हो चुका है। कोई पांच एक फिट का दुबला-पतला, श्‍याम तन, लबे केंश वाला एवं गन्दी जिन्स जो कि कमर में ढीली है जीन्स को कमर पर रोकने के लिए सुतली बांधी है मटमैली टिशर्ट, पांव में पुरानी हवाई चप्पल है जिनकी ऐेड़ी में छेद हो रखे है। कन्धे पर छह सात फिट लंबी रस्सी झूल रही है और सीधे हाथ में तीन एक फिट का डंडा लिए हुए शिवजी की बारात का बराती लगने के कारण जूजू को सोसाइटी के गेट पर रोक दिया गया है। महिला मंडली बात कर रहीं है बड़ा हीरो बना हुआ है कर भी लेगा यह काम मिसेज गोडबोले ‘‘अरे रुको में बात करती हूं इस हनी सिंह से सबको चुप करा खुद ही मोर्चा संभालती हैं।            सभी गोडबोले के पीछे संभावित घटनास्थल की और मुंह पर रुमाल रख कर दूर से हाथ के इशारे करते हुए कहा ’’हां भइया देखो उधर दीवार के पास एक कुत्ता सड़ रहा है, दिख रहा है न’’ जूजू ने थोड़ा ध्यान देते हुए कहा ’’ हां कुछ पड़ तो हुआ है’’ । ’’हां जो भी है भैय्या देखो तुम उसे यहां से कहीं बाहर फेेंक दो इसकी वजह से यहां सबका जीना मुष्किल हो गया है’’ मिसेज गोडबोले ने पीड़ा के साथ कहा।
          जूंजूं - हां हो जाएगा, अपना तो काम ही है ये, लेकिन पैसे थोड़े ज्यादा लगेंगे। क्योंकि काम काफी मेहनत का है, बदबू से लग रहा है कि जानवर बुरी तरह से सड़ गया है।
           ऐसे जवाब की आशा उन्हें नहीं थी ’’हां हां ले लेना लेकिन पहले इस मुसीबत को यहां से हटाओ तो फिर बात कर लेंगें’’।
          जूंजूं ने कंधों से रस्सी हाथ में ली और डंडे को संभाला जो किसी कुत्ते की श्‍मशान या़त्रा के लिए काफी थी। जूजू कुत्ते के शव की तरफ जा रहा था। सोसाइटी वाले उसे दूर से देख रहे थे। सभी ने मुंह पर रूमाल लगा रखे थे। जूंजूं जैसे जैसे शव की तरफ जा रहा था वैसे वैसे बदबू सघन होती जा रही थी। उसे लग रहा था जैसे करोड़ो बदबूदार कीड़े उसकी ओर आ रहे हो , सघनता इतनी थी कि वह आगे नहीं बढ़ पा रहा थां । बदबू से बचने के लिए उसने सांस रोके रखी थी उसका मन उबकाई को हो रहा था लेकिन फिर भी वह न चाहते हुए भी आगे बढ़ता रहा। अवचेतन में कभी कभी उसे मिलने वाले मेहनताने के सौ सवा सौ रूपए आ जाते थे सोच रहा था इससे कम क्या देंगें इतने बड़े बड़े लोग है सौ सवा सौ इनके लिए आखिर हैं ही क्या। जूजू कुत्ते के शव के नजदीक पंहुच गया, जो कि बुरी तरह से फूल गया था और भयानक रूप से सड़ रहा था। कुत्ते का रंग काला था शव के अन्दर बडे़-बड़े कीड़े बिलबिला रहे थे। कुत्ते की दोनों आंखों में कींड़ो का गुच्छा निकल आया था। जबान दांतो से बाहर निकल पसरी पड़ी थीं। उसकी नाक से गाढ़ा-गाढ़ा मवाद निकल रहा था। सेंकंड़ो की संख्या में मक्खियां शव पर भनभना रही थीं, कव्वे शव का पोस्टमार्टम कर रहे थे जूजू ने ज्यों ही सड़े हुए शव को देखा उसे उल्टी हो गई। लेकिन उसने अपने आप को संभाला, उसे याद था कि अगर यहां से पैसे नहीं मिले तो आज की दिहाड़ी मारी जाएगी। सांस रोक कर उसने एक हाथ में डंडे से कुत्ते की गर्दन उठाने की कोशिश करने लगा दूसरे हाथ में रस्सी का फंदा तैयार था, इस प्रक्रिया को वह जल्द से जल्द निपटा लेना चाहता था, पर जैसे उस पर किस्मत मेहरबान नहीं थी, वह डंडे से कुत्ते के सिर को उठाता और जैसे फंदा फंसाने की कोशिश करता निर्जिव सर जमीन पर लुढ़क जाता। वह पेट को कसे हुए था ताकि सांस न ले पाए, पर ज्यादा देर वह सांस को रोक कर रख नहीं सका और न चाहते हुए भी सांस को अन्दर ले गया। जूजू वहां खड़ा न रह सका और तेजी से विपरीत दिशा की ओर भागा। अगर नहीं भागता तो सड़ांध उसका दम घोंट देती। जिन्दगी में इतना बुरा केस उसके पास नहीं आया था। यह तो सार्वजनिक शौचालय के गटर में घुसकर बाल्टी भर भर के शौच निकालने से भी बुरा था । उसने वहां से भाग जाना चाहा पर इतना सब होने पर उसे वहां से बिना दिहाड़ी जाना नागवार लगा आखिर अब दूसरी दिहाड़ी मिलने की कोई संभावना नहीं थी। उसने फिर से हिम्मत बांधी और इस बार किस्मत ने उसका साथ दिया, ऐसा उसे लगा। फंदा फंस गया था, जूजू ने रस्सी को खींचा रस्सी तन गई दूसरे सिरे पर कुत्ते का शव था जिसे अंतिम यात्रा उसे ही करानी थी। वह अपने साथ रिक्षा भी लाया था, जिस पर उसे शव की साधना करनी थी। जूजू रिक्‍शे पर चढ़ गया और कुत्ते के शव को रिक्‍शे पर लाद दिया। वह सरपट पैडल मार रहा था वह ताकि जल्द से जल्द इस नर्कीय सड़ांध से पीछा छुड़ा सके। काफी दूर जाने पर सुनसान में नाले के पास जूजू ने शव को फेंक दिया जैसे पहाड़ सा बोझ उतर गया था। काफी दूर वापस आने पर जूजू ने एक गहरी सांस ली उसे लगा जैसे कितने सालो बाद उसने सांस ली हों। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सड़ांध अब भी उसके बदन से चिपकी हो , गला बुरी तरह सूख रहा था।
          जू जू प्रोगेसिव सोसाइटी के गेट पर आ चुका था, दरबान रामचन्दर चौहान अपनी रौबदार मूंछो के साथ उसे घूर रहा था। जूजू: ‘‘अरे भाई साहब ये सब लोग कहां चले गए’’?
दरबान- ‘‘चले गए जंहा जाना था। उसने लापरवाही के साथ कहा‘‘। जूजू को घूरकर फिर कहा ‘‘क्यों तुम्हारी आरती करने के लिए रुकना था‘‘ ? सभी लोग मिसेज गोडबोले के यहां है, वह सामने वाला फलैट उन्ही का है ; गार्ड ने इशारा कर बताया जाओ कर लो भरत मिलाप।
          जू जू बुझे मन से गार्ड के बताए फ्लैट की तरफ बड़ा, एक बड़ा सुन्दर सागवान की लकड़ी का दरवाजा अन्दर की तरफ खुला हुआ था जिस पर गणेश का कटा सिर लटका हुआ था। अन्दर वे सभी लोग इक्टठा थे जो उसे बाहर मिले थे। माहोल हल्का फुल्का था। जूजू दरवाजे पर जाकर खड़ा हुआ वह कुछ कह पाता इससे पहले सभी की नजर उस पर पड़ गयी। सभी के चेहरो पर अजीब से भाव आ गए। मिसेज गोडबोले समेत सभी लोग चिल्लाए,  जैसे सड़े कुत्ते का शव उनके सामने आ गया हो - ‘‘तुम अन्दर कैसे चले आए ? बाहर चलों, यहां से । गार्ड ने तुम्हे रोका क्यों नही?‘‘ गार्ड की भी शामत आ गई। मिसेज गोडबोले ने कहा ‘‘तुम्हे जरा भी तमीज नहीं तुम्हे किस लिए नौकरी पर रखा हुआ है। इसे अंदर कैसे आने दिया। घर तक का पता तुमने बताया, धर्म भ्रष्ट कर दिया। आज के बाद ऐसी गलती की तो वापस बिहार भेज देंगें।
          गार्ड भी कोमा में पंहुच गया और जूजू को घूर कर देखने लगा। ‘‘अब घूर क्या रहे हो जाओं उससे कहो कि बाहर गैट पर पंहुचे इसका हिसाब वहीं करेगें‘‘। गार्ड ने जूजू को आंखों से बाहर निकलने का इशारा किया। जूजू स्तंभित था वह धीरे-धीरे गेट के बाहर अपमानित सा चल दिया। सोच रहा था जो अभी कुछ देर पहले तक लगभग गिड़गिड़ा रहे थे उनकी आवाज में कितनी खनक आ गई थी।
प्रतिनिधी गोडबोले अपनी चार पांच मैडमो के साथ आई और बोली- ‘‘हां भाई बोलो क्या हिसाब किताब है तुम्हारा‘‘।
‘‘100 तो कम से कम होने चाहिए , आप तो जानते है कि कुत्ता बुरी तरह से सड़ चुका था। मैं ही जानता हूं कि कैसे उसे यहां से हटाया है । जूजू ने अपनी जायज केफियत दी‘‘।
- 100 रूपए।'' मिसेज गोडबोले के गणित से ज्यादा बैठ रहे थे। वह तुनककर बोली ‘‘ ऐसा क्या तुमने पहाड़ उखाड़ा है ? एक मरे कुत्ते को ही तो उठा कर फेंका है कोई सांड - वांड थोड़े ही हटाया है तुमने जो इतना ज्यादा मुंह फाड़ रहे हो‘‘।
           अब जूजू का धेर्य जवाब दे चुका था। बड़ी देर से गुस्से को पीता आ रहा था उसने हकलातेे हुए कहा अगर पहाड़ नहीं उखाड़ा है तो आपने खुद हीं क्यों नहीं हटा लिया मुझे क्यों बुलाया था। तब तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाता अब नाजायज करने पर तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं होगा‘‘। मिसेज गोडबोल पूरी तरह हिसाब किताब लगा कर बैठी थी ‘‘हम तो बीस हीे देगें, इससे ज्यादा की आशा मत रखना- समझें ! देखो कितना मक्कार है ? बिलांद भर का तो है नहीं बाते कितनी बड़ी करता है‘‘।
          दस रुपए तो रिकशे वाला अपने किराए के ले लेगा फिर मुझे क्या मिलेगा। कितने दिन का सड़ा हुआ कुत्ता था। कुछ तो सोचना चाहिए। ये ठीक नहीं है‘‘। जूजू ने कहा।
‘‘तो तुम कौेन सा ठीक कर रहे हो , जरा से काम के सौ रूपए मांग रहे हो आखिर कुछ तो शर्म करों पड़ोस का कुछ तो ख्याल करो, डायन भी सात घर छोड़ देती है‘‘। औेर ऐसा कहकर बीस रूपए बतोर मेहनताने के जूजू की तरफ उछाल दिए जाते हैं। जूजू चुपचाप कभी रुपयों को कभी अपार्टमेंटियों को देख रहा है। मन में बहुत कुछ था लेकिन कुछ न करने की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही थी। मिसेज गोडबोले ने फिर उसे हड़काते हुए कहा ‘‘यहां पैसे पेड़ पर नहीं उगते, जो दे रहे है वह बिलकुल सही दे रहे है‘‘ अचानक जूजू पलटता है और तेज कदमों से वापस लौट जाता है ।
          सभी लगभग निर्वाक जूजू को देख रहे हैं, तभी मिसेज गोडबोले चुप्पी का क्रम तोड़ती है जाने दे बड़ा आया लाट साहब, भंगी कहीं का, मिजाज तो देखो इसके जैसे कहीं का राजा हो। अभी आएगा दुबारा चप्पलें चटकाता हुआ। हुंह चल जल्दी से पाइप ले कर बरामदा साफ कर‘‘ मेहरी जैसे पहले से ही जानती थी, पाइप आ गया काफी देर तक गोडबोले के बरामदे का शुद्धीकरण होता रहा।
          अब सभी आश्‍वस्त हो गए थे कि विपदा टल चुकी है.... सभी रूम फ्रेशनर छिड़क कर सोने की जुगत में थे । ........
          रात के लगभग बारह बजे है सोसाइटी में सन्नाटा पसरा हुआ आज चांद भी जैसे कुछ डरा डरा सा बादलों मे दुबका हुआ है दूर से कभी - कभी कुत्तो के भोंकने की आवाजे सुनाई दे जाती है झींगुर टिरटिरा रहे है । सोसाईटी के कुछ घरो की जो बत्तियां अभी भी जल रही थी वे भी अब बंद हो चली है। सन्नाटा लगभग अपने पांव पसार चुका था। हवा आज कुछ डरी डरी सी है, खिड़कियां भी डरते डरते कभी - कभी चूं - चूं कर उठती है। कोई ऐसी चीज थी जो दीवारे , खिड़कियों दरवाजे भेदकर सभी को अपने आगोश में ले रही थी। सभी के नथूनें धीरे - धीरे फूलने लगे थे। और अंधेरे में एक परछाई सोसाइटी से दूर जा रही थी। मिसेज राय सबसे पहले चिल्लाई । और यह सपना नहीं था।
पता
5/345, त्रिलोकपुरी, दिल्‍ली
मोबाईल : 08882999518, 08800805614
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