इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 9 नवंबर 2015

छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास '' दिन बहुरिस '' म लोक संस्‍कृति के बानी

समीक्षा :  देवचंद बंजारे

          छत्तीसगढ़ महतारी ह गजब सुघ्घर हरियर हरियर चारों कोती सोनहा लुगरा पहिरे हे। एकर मया ह समुन्दर जइसे गउहरी हे अउ समुन्दर म हीरा मोती कस ऐखर कोरा म कई ठन लोक गाथा ह माड़े हे। जेला लोक संस्कृति के खजाना घलो कहिथे। इंहा के लोक संस्कृति ह माटी के सुगंध (महक) घलो दूबराज चांउर असन देश परदेश म महकत हे। अइसन मया पीरा के लोक गाथा,किस्सा ल सुने बर नोहर होवत हे। विदेशी गीत ल सुनके डड़ाइया चढ़े कस कूदत नाचत हे। एकरे सेती हमर छत्तीसगढी साहित्यकार मन ह जुन्ना ल नवा अउ नवा ल सोनहा सुरूज कस जगजग ल सब्बो किस्म के साहित्य रच के परकाशन करावत हे। भासा म छत्तीसगढ़ के संस्कृति परम्परा अउ मानता ह पहचान होथे दुनिया के सब्बो भासा बोली (भाखा) उप बोली ले छत्तीसगढ़ के लोक कला लोक साहित्य अउ लोक गीत ह सब ने अव्वल हे।
          ''दिन बहुरिस'' छत्तीसगढ़ उपन्यास के लेखक भाई अशोक सिंह ठाकुर अर्जुन्दा दुर्ग के कृति पढ़े ल मिलिस। लोक संस्कृति लोक गाथा म रचे बसे अउ जन जीवन के रहन सहन रिति रिवाज ल बड़ सुघ्घर दिन बहुरिस म लिखे हवय। मनखे ह मनखे के लोकगाथा ल मीठ - मीठ गीत गा के सुनाथे अउ गुरतुर गीत ल सुने बर मन ह ललचा जथे। जम्मों लोकगीत मा थोरको न थोरको(चुटकी भर)लोक गाथा ह समाये रहिथे। इहां लोक म गाय सुआ, करमा, ददरिया, देवगीत, पंडवानी, आल्हा अउ लोरिक चंदा(चदैनी),ढोला-मारू, रहिमन रानी, केवला रानी म लोकगाथा ह भरे हवय। वइसने हमर लोक संस्कृति के तीज तिहार हरेली,राखी, कमरछठ,आठे,पोरा तिजा,पितर,नवरात्रि,दशहरा देवारी,मड़ई,छेरछेरा गुरू घासीदास जयंती अउ गिरौदपुरी मेला,होली,धूर रामनवमी,अकती तिहार ल बड़ सुघ्घर मनाये के परम्परा संस्कृति ''दिन बहुरिस''उपन्यास म समाये हे। ए उपन्यास ल ''बांस गीत'' घोसन बबा के कथा से शुरू करे हे अउ भाषा सरल,सरस,मनभावन,हिरदय ला गुद गुदाने वाले भासा परयोग करे हे। एमा सुघ्घर पति पत्नी के संग उपजे आपसी परेम ला परमुख बताय हे अउ देश परेम की भाव ला कहिथे - ''ए बइया''अभी ले मत पसर एक तो दिन भर काम म जाय रहिथस, तोर बिना मोला बड़ उदास लागथे, बने बोल बता तब सुतबे ''। का बताव उर्मिला । हमर देश कब आजाद हो ही, एखरे बारे म सोचत रेहेव अउ एखरे बारे मा दुकालू कका संग गोठियावत रेहेंव। बने काहत हस राउत। हमर देश आजाद हो ही, तब हमरो दिन बहुरहि न।''
          ए उपन्यास म गांव के गुजर बसर ला सम्पूूरन झांकी कस फुटू बना के खीचे हवय। अउ कथा वस्तु ह गंवई गांव के सामाजिक जन जीवन चरवाहा ''प्रथा'' पानी भराइया जनाना ''रउताईन'' काम करइया परम्परा ला हूबा हूब उतारे हे। जेमा नायक अउ नायिका ला सिधवा भोला-भाला आपसी परेम ला सुघ्घर लिखे हे ।
उपन्यास मा कथावस्तु:
          ''त भइया। जइसे ही संवरी के पूजवन ल कुंवर हा दिस रागी। तब का होईस घोसन बबा? तब कर के रूख हरियागे, ओतकी बेर कंठी ठेठवार, जे हा कई बच्छर ले नंदागे रिहिस ते हा अपन घर मा आइस रागी। वोला देख के कंठी ठेठवार के घरवाली फुल कैना गजब खुश होइस अउ खुश होत - होत अचानक ओखर आंखी ले आंसू निकलगे। ''आंसु ये पाय के अइस, के कुंवर हा संवरी ले बिहाव करे रिहिस, तेखर वो हा बर के रूख मा पुजवन दे दिस। कुंवर,संवरी में अइसन मया करे, संगवारी जइसे आंखी के पुतरी। तेखर पुजवन दे के कंठी ठेठवार के घर मा एक तरफ  सुख चैन छागे त दूसर संवरी के बलिदान के बहु के सुख से वंचित होगे। ते ला सोच सोच के फुलकैना हा रोवन लागिस। आज के बांस गीत ल उही कना खतम करथन चलो अपन अपन घर बियारी के बेरा होगे हे।''
          ऐ उपन्यास म 37 भाग म बटे हे। पहिली भाग म पति पत्नी के संग आपसी परेम, हरेली तिहार मनाने हांका अंग्रेजनीन टूरी एलिजा आय के बारे अउ गांव म छुआछूत के करलई ल बताय हे। उपन्यास म ..... एक दिन बड़का पटेल काहत रिहिस - कुहू भी होय रे समारू। ते बाई बड़ सुन्दर पाय हस। हमर जात म तो अकाल पड़गे हे, झार, चेपटी, बिलई मिलथे। तब समारू बड़ गरब से पटेल के गोड़ ल धरथे - बस पटेल जी। आपके आर्शीवाद हे। आपे मोर माई बाप हो। आपके डेहरी के महा कुकुर हरों।
          भाग 2 मा  छत्तीसगढ़ के तीर्थराज, राजिम के कथा के महत्त्म अउ भाग 3 म  छत्तीसगढ़ राज पहिली तिहार हरेली के पूजा पाठ,गेंड़ी दउड़, अंग्रेजनीन टूरी ऐजिला आके डाक बंगला मा रूकथे तेखर घटना लिखे हे । उपन्यास तिवारी मास्टर के पोटा कांप जाथे,तभो ले हिम्मत करके जाथे। नमस्ते जी, मेरा नाम राकेश तिवारी है। तिवारी हाथ जोड़थे। ओ ..... हमारा नाम मिस एलिजा लारेंस हाय। आप से मिलकर हम बहुत खुश हाय,एलिजा हाथ मिलाय बर अपन हाथ आगू बढ़ाथे। तिवारी डर्रावत डर्रावत हाथ मिलाथे,वोला साहस होथे त ले दे के बक्का फुट थे मुझे आश्चर्य हो रहा है कि आप जैसी पढ़ी लिखी लड़की इस गांव में? तिवारी जी मुझे  छत्तीसगढ़ के रीति रिवाज और रहन सहन के ऊपर सोध करना हाय। इसका लिए मुझे आपसे हेल्प चाहिए।
ए उपन्यास म जीवन के घटे घटना ल घलो जघा जघा मा सुघ्घर गुरतुर लहजा(भासा) मा लिखे हे ''रामदयाल बइगा, तिवारी मास्टर बर भड़क जथे - ''वो पड़री अंग्रेजनीन टूरी, जे ह डाक बंगला म रहिथे तेला सांप चाब दे हे।''
          ''हव विही ला फूंकना हे तोला .... । मास्टर बिनती करथे। ''मे ह नई जांव रे।''बइगा बबा नानचुक उत्तर देथे।
''काबर गा?''
''वो मन हमर देश के दुश्मन हरे, वो सारा मन हमर उपर राज करत हे, तेला फुंके ला जांहंूॅ रे ...... नई जांव। ''
गांव मा काकरो घर नवा बहु आही त टूरा मन निच्चट निहारत रहिथे अउ बेल बेल्हा टूरा मन ताना मारत रहिथे। ऊपर तो आंखी फुटत रहिथे अइसने उपन्यास हवय .....ते,नई जानस राउत। पानी भरे ल कुंआ डाहर जाथों आथों त रोगहा टुरा मन,मोला टुकुर - टुकुर देखथे,अऊ वो रोगहा कनटेटरा नाऊ त मोला देखेच ल नई भाय। कनवा हे रोगहा हा तभो ले .....।''
          पटेल अऊ नाऊ के चरित्र चित्रण ला सुघ्घर फोटो खींचे हे। गांव व समाज म भले उजागर नई होवय फेर अपराधी चरित्र ल परगट करे हे - अउ पात्रों के परिचय ल सूत्रधार घोसन बबा ह किस्सा के संग मा लावत गेहे। भाग 26 म नारी उत्पीड़न के उजागर हे - कुरिया के भीतर मा उर्मिला पलंग ऊपर बेसुध नींद मा सोय रहिथे। जेर कारन लुगरा ऐती वोती सरक जाय रहिथे। ''बस इही बेरा हे सरकार .....। ''जल्दी कर बे''। कनटेटरा नाऊ अपन हाथ ल कपाट के बीच के सेंध म बुलका के संकरी ल खोलथे। संकरी ह ठन ले बाज जथे। दूनों मन देख थे जागगिस का जब नई जागिस त भीतर म धीरे से खुसरथे। बड़ बेरा ले उर्मिला ल दूनों देखथे। कनटेटरा पटेल ला इशारा करथे। पटेल नाऊ ल इशारा करथे, नाऊ चिमनी जलत रहिथे तेला फूंक देथे। चिमनी बूझे के बजाय भभक जथे। थोरेचकुन म चिमनी बुझागे। कमरा म घूप अंधियार होगे। उर्मिला के मजबूरी के फायदा उठाके देह शोषण पटेल करथे। अपन बदनामी ल डरके नई चिल्ला सकिस फेर उर्मिला हा उगल डारिस - अपन पति समारू ला बताथे -
          दूसर दिन रात म जब उर्मिला ले नई रेहेगिस त समारू कना बोट बोटाय आंखी म कथे - एक बात कांहव राउत।'' बोल न उर्मिला,का बात हे ।''तेहा नाराज त नई होबे न।''उर्मिला मुड़ी ल गड़िया के कथे। तोर कोई बात ले,आज नाराज होय,हंव पगली। बोल न का बात हे ''समारू के धुक धुकी बढ़ जथे, मने मा सोचथे, कोई न कोई गंभीर बात जरूर हे। ''पटेलिन ल धरके ते दिन गांव गेरेहेस विही रात म बड़का पटेल मोर इज्जत ....।''बस....बस। उर्मिला मैं समझगेंव ओखर चाल ल, ओखर नीयत तोर बर बहुत दिन ले खराब रिहिस।''
भाग चार म महेन्द्र बाबू अउ शबनम के परेम के आगी सुलगाथे। भाग 5 म छुआछूत अऊ भेदभाव का दर्दनाक चित्र ल दिखये हे -''ऐ काके भीड़ हरे।'' तुमन काबर ये मन ल मारत पीटत लाय हो?''भीड़ चिल्लाथे -ये साले हरिजन मन,हमर तरिया म नहा के असुद्ध कर दिस।''सबले पहिली तुमन दूरिहा हटो।''भीड़ पाछू हट जाथे।''तूमन मोर कना आव रे।''चारो झन पटेल के गोड़ तरी बइठ जथे। तब पटेल जोर से भड़किस - तुमन ल तरिया म नहाय बर मना करे रेहेव न रे? तब एक झन हरिजन कथे - ''हमन कहां नहाबों ददा। दू महिना हो गेहे,हमर परवार ल नहाय। बिना नहाय त मर जबो ददा।''
          भाग6 म डोंगरगढ़ के मेला अउ बम्लेश्वरी माता के कथा के संग कामसेन राजा ल बताये हे। हमर  छत्तीसगढ़़ी लोक संस्कृति अउ परम्परा ला ताना बाना बुने हे । सातवां भाग म कुष्ठ रोगी से एलिजा से होय अउ मास्टर तिवारी एलिजा के (प्रेम) परेम कहानी शुरू होथे। आठवां भाग म सावन म नागपंचमी के तिहार अउ एलिजा ल सांप कांटे के उपचार बइगा करथे। नौवा भाग म राखी के तिहार मनाथे। बहिनी अपन भाई के कलाई म राखी बांधथे। ए उपन्यास म ...... ''आज का बात हे। तें बहुत उदास हस ... समारू भइया।'' समारू, पटेलिन के मुंह ले भाई शब्द सुनथे, त ओखर आंखी ह डबडबा जथे। तोरो आंखी हा तो घलो लाल दिखत हे पटेलिन दीदी,अउ ते हा मोला पुछथस।''
          ''मंय का बताव भइया... मोर अंतस के पीरा ल,मोर एको झन भाई नइये।''मोरो एकोझन बहिनी नइ हे, तेकर सेती आज अब्बड़ उदास लागत हे।''डबडबाय आंखी मा पटेलिन कथे - मंय तोला राखी बांधहूं भइया।''समारू बोट बोटा जथे - मंंय हा बड़ गरीब अउ छोटे आदमी हरों दीदी।''पटेलिन समझाथे भाई बहिनी के परेम ह, छोटे बड़े नइ देखे चल मंय हा पूजा के आरती सजावत हंव, घर डाहर आ ...। '' दसवां भाग म लोरिक चंदा किस्सा, परेम पसंग उड़रिया भागने अउ ग्यारहवां भाग म एलिजा के हरिजन अत्याचार लिखे खबर विश्वमित्र छपे हे। कमरछठ अउ आठे तिहार  छत्तीसगढ़़ म मनाये परथा ल लिखे हे। बारवां भाग म सुघ्घर पोरा तिहार मानत रहिथे। उपन्यास -''पोरा के दिन गांव म सब तिहार मानत रहिथे। उर्मिला नंदिया बइला के पूजा करके, हुम धूप के दे, सोहारी, बरा अउ तसमइ के भोग लगाथे अउ शिव भगवान के सवारी नन्दी के पांव परथे।''
          तेरहवां भाग म उर्मिला के भाई ईश्वर तीजा लेगे बर आथे। चौदहवां भाग म गणेश चतुर्थी अउ खड़ी साज वाले नाचा रात मा होथे। इही भाग म पीतर मानने (मनाने)अउ पटेल घर जंवारा बइठथे। भाग पन्द्रह से बीस तक दशहरा,देवारी अउ मोहंदी मड़ई ला बड़ सुघ्घर छेर - छेरा पुन्नी के तिहार बड़ मजादार लिखे हे।
छेरी के छेरा, छेर बरकनिन छेर छेरा .... ।
माई कोठी के धान ला हेर... हेरा।
जब बड़ देरी हो जथे अउ धान देवइया ह नई दिखे त काहत हे -
अरन बरन कोदो दरन... जभ्भे देबे तभ्भे टरन।
छेर छेरा.....।
          हर साल फागुन के पंचमी से अष्टमी तक गिरौदपुरी मा गुरू घासीदास के जन्म स्थली मा मेला भारथे- उपन्यास म भौरा खेलत खेलत एक झन लइका के ध्यान घोसन बबा के गीत म बंट जथे त कथे 'आगी, पानी के बिना जेवन कइसे बनही बबा ? ओ बेटा । सत् में अतेक बड़े ताकत हे, के बिना आगी पानी के जेवन बन जथे।''दूसर संगवारी कथे ''अइसे सत् के धनी कोन हरे बबा? जेहर बिना आगी पानी के जेवन बन जथे'' घोसन बबा सात आठ झन लइका मन खेलत रहिथे तेला बलाथे - '' आव रे बेटा हो। तुम्मन सब जा सत् के धनी महापुरूष घासीदास जी के बारे मा बतावत हंव।''21/22 वां भाग म बसंत ऋतु के खुशबू कवि सम्मेलन म महकत हे। प्रकृति हा सुघ्घर हरियर हरियर, डारा, पाना अउ रंग बिरंगी फूल म लदागे हे। होली तिहार म मनखे हा पगला कस नाचत हे। सबो जाति, के मनखे मन हा होली मिलन दिवस मनाये बर हरिजन पारा म (होली खेलेबर)पहुंचगे हे। उपन्यास म बदरी बिशाल के बसंत गीत -
मात गेहे सरसों के फूल - गंधिरवा मात गे हे रे ....
मात गे हे आमा, अऊ मातगे हे कउहा......
मात गेहे आमा मउर, गंधिरवा मात गेहे रे...
अरसी के फूल माते, गेहूं के झूल माते....
तिवरा के लजा गेहे रे ......
कुहकत के कोयल कारी....
मधुबन फूले जा फुलवारी....
महर महर पूरवाहि मात गेहे रे ......
काला कबे बांच गेहे रे ..... गंधिरवा.....
होली के रंग मा रंगे
          उहां ले निकल के वोमन हा हरिजन पारा मा होली खेले ल पहुंचगे। हरिजन मन तिवारी अउ एलिजा ल अपन बीच पाके गजब खुशी मनावत हे। सब कोई उनला इज्ज्त से बइठार के रोटी पीठा खवावत हे। एलिजा के खुशी के ठिकाना नई हे वो ह भारी खुश हे। होली के ग्यारवा दिन धूर तिहार मनाथे। एकर घटना बहादुर कलारिन ह अपन बेटा के बलिदान करके खुद आप पेट म कटारी मार के अपन इहलीला ल समाप्त कर दिस।'' ऐखर किस्सा सरहरगढ़, करही भादर (गुरूर) गांव म शिकार करके खैरागढ़ के राजा हा पहुंचिन अउ इखर आदर सत्कार करिस। बहादुर कलारिन हा राजा के तरफ से गर्भधारण म रिहिस। कलारिन हा सुन्दर बेटा जन्म दिस। फेर कभू राजा हा वापस नइ गिस ऐखर किस्सा हा बड़ सुघ्घर लगथे। आगू कोती रामनवमीं अउ बैसाख तिहार अकती तिहार पुतरा पुतरी के बिहाव सुघ्घर ढंग ल लिखे हे। भाग 27 वां म समारू के भाई जगेसर सेना ल भाग के आय काबर ओहर एकझन अंग्रेज सूबेदार ल मार के आय रहिथे। अठाइसवां भाग म 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन ल सुघ्घर लिखे हे। जेमा दुरूग जिला के स्वतंत्रता सेनानी मन के नाम घलो हे ''हमर दुरूग क्षेत्र म आन्दोलन अपन अति चरम सीमा म रिहिस। अगस्त म रामरतन गुप्ता, रामकुमार सिंगरौल,अमरचंद वर्मा बंदी बना लिये गिस। आमसभा करे के कारण नरेन्द्र कटारे,गंगूलाल, बंशीलाल एवं भगबली गिरफ्तार होइस।''
          चौतिसवां अउ पैतीसवां भाग म भारत देश 15 अगस्त 1947 को आजाद होइस। गांव -गांव म उत्सव के रूप म मनाइस। अंग्रेज शासन हा भारत देश ला दू कुटका मा बांट दिस, तेखर दुख हा तनमा समागे। हमर राष्ट्रपिता महातमा गांधी के 30 जनवरी 1948 म नाथूराम गोडसे हा गोली मार के हत्या करदिस। उपन्यास म नौजवान साथी मन देश भक्ति गीत गावत हे -
खेलव कूदन नाचव गावव,घूमव जम्मो रात
आजादी के जश्न मनावव, भारत मां के जय बोलाव
कतको लउठी गोली खाके, कतको अपन जान गंवाके
भारत मां के लाज बचाके, नेता होगे महान
रे संगी गांधी होगे महान........
          मास्टर राकेश तिवारी अउ एलिजा के प्रेम प्रसंग हा गढ़ागे रिहिस। कुछ दिन के बाद एलिजा लंदन चलदिस। तिवारी मास्टर हा विदा करिस अइसन दुख के बेला हा करूण हो जथे। ''मास्टर ह सुसकत सुसकत सब ला समझाथे - हम सब ल एलिजा ल हंसी खुशी से बिदा करना हे नहीं त एलिजा ल बहुत दुख होही।''ओखर बाद म एलिजा ह छोटे बड़े सब संग गला मिलथे। समारू अउ उर्मिला से मिल के एलिजा भारी रोथे। रही रही के तिवारी जी अपन आंसु ल पोछथे ।'' मास्टर राकेश तिवारी जी मिडिल स्कूल अर्जुनी म रहि के पूरा दुरूग जिला ला प्रथम ला दिस ऐखर सेती राष्ट्रपति पुरूस्कार मिलथे जेखर खुशी म गांव गांव के मुखिया मन हा कार्यक्रम म सरीक होथे । 36/37 वां भाग म भिलाई म लोहा के कारखाना खुलगे। समारू अऊ उर्मिला ह पटेल घर के नौकरी छोड़के कारखाना म भरती होगे। अइसन जम्मों नौकरी वाले मन अपन सगा सोदर ल भिलाई के कारखाना म भरती करवा डरिस कारखाना म दूसर परदेश के मनखे मन हा नौकरी करत हे। घोसन बबा आखिरी म कंठी ठेठवार के किस्सा ल बाँस गीत म सुनाथे। कलमी दइहान मा राजा बिझवार बड़ परतापी राजा रिहिस। ऐखर किस्सा ल सुघ्घर ढंग ल बताये हे। कण्ठी ठेठवार संवरी के बलिदान देथे तब कंठी ठेठवार के परिवार सुख से रहिथे। ततकी बेर माता सेवा के बाजा बाजत रहिथे -
''का पुजवन लेबे बरम देव, का पुजवन लेबे दाई ।''
          ततकी बेर कुंवर देवता चढ़थे अऊ फरसा उठाके, संवरी के गला ल धड़ से अलग कर देथे अउ पूरा खून लबर के ठूंठ म चढ़ा देथे। जइसे संवरी के खून बर के ठूंठ ल मिलथे। बर के ठूंठ हरिया जथे। कुछ दिन बाद कंठी ठेठवार अपन घर आ जथे ।''
          ''दिन बहुरिस'' उपन्यास ल ठेठ  छत्तीसगढ़़ी भासा म लिखे गेहे। कोनो जघा म हिन्दी अउ अंग्रेजी शब्द ल परयोग करे हे। भासा सरल सरस गुरतुर शैली म धारा प्रवाह लिखे हे। आम मनखे मन के भासा,लोक संस्कृति,गाथा,रहन सहन,खान पान अउ उखर बोली बचन एकक ठन चित्र हा आंखी म झूलथे।  छत्तीसगढ़़ी भासा अउ संस्कृति के गुरतुर बानी ल बुने हे। गांव मा परचलित हवे, बुजा कनटेटरा, रोगहा, सारा शब्द ल घलो गारी के रूप म परयोग म लाये हे। इहां के जम्मों तिज तिहार बढ़ सुघ्घर मनभावन मनाथे लोकगाथा ल संघरा लिखे हे।  छत्तीसगढ़़ी व्यंजन ठेठरी, खुरमा कटवा अइरसा, फरा चुकी, बरा, सोहारी, मुठिया रोटी ह लोक संस्कृति के पहचान आवय।
          लेखक हा उपन्यास के उद्देश्य उपन्यास तत्व ल अउ देशकाल परिस्थिति ल सामिल करके गंवई गांव के परिवेश ल दिखाये हे। देश प्रेम की भावना,आजादी के लड़ाई म योगदान,अउ आजादी मिलन के बाद  छत्तीसगढ़ म बड़ काम करना हे जेखर जिम्मेदारी ल सुरता कराये हे। देश काल परिस्थिति म छुआछूत, भेदभाव अंधविश्वास, बलात्कार, जादू टोना (टोनही)अनपढ़ जइसे समस्या ला उजागर करे हे। हरिजन के दशा ल दिखाय बर बढ़ाचढ़ा कर लिखे हे जइसे उपन्यास म हमन कहां नहाबों ददा। दू महिना होगे हे हमर परवार ल नहाय बिना नहाय त मर जाबो ददा''। बलि प्रथा म नर बलि चढ़ाये के कथा हवय। जेमा देवी देवता म बलि (हिंसा) चढ़ाय के चलागन रिहिस हे। जम्मों मनखे अंधविश्वास के चिखला म चोरो बोरो सनाय हवय।  छत्तीसगढ़़ी तिज तिहार ल सुघ्घर गोंदा के माला कस एकेठन सूत म गूंथे हे। दुसर कोती गांव के अनपढ़ मनखे कानून ल हाथ म लेके अपराध जइसन काम ल बिना सोचे समझे घलो कर डरथे। अंग्रेजी राज के पोल पट्टी ह खुल्ला होगे जेन म अन्याय अत्याचार के परचम ह बाढ़त रिहिस। मनखे के दाम ह पानी के मोल होगे रिहिस ।

पता
रामनगर वार्ड नं. 07,राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. - 9755140183

1 टिप्पणी:

  1. बड़ भागमानी आवन जे हमन छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म जनम ले हन; अउ सुघ्घर लोरी कस छत्तीसगढ़ी भाखा ला गोठियावत अउ सुनत हन। आप के सुघ्घर लेख ला पढ़के मन हरिया गे। गाड़ा गाड़ा बधाई.....

    उत्तर देंहटाएं